Saturday, November 28, 2015

डॉ. आंबेडकर को सुविधानुसार चुनते हैं नेता

आज संविधान दिवस पर संसद के दोनो हाउसेस में जबरजस्ट बहस देखने को मिली।  इसलिए लगातार दोनों सदनो के भाषण मैं बारी बारी से सुनता रहा।  वैसे आज प्रधानमंत्री भी प्रधानमंत्री की तरह बोले।  आज के उनके भाषण की मैं तारीफ़ करता हूँ।  प्रधानमंत्री ने भी आज कहा कि अल्पमत पर बहुमत नहीं थोपा जाएगा। सेकुलर शब्द शायद इसी भाव की तलाश का एक मार्ग है। कई बार यह बहस डॉक्टर आंबेडकर पर दावेदारी की होड़ में बदलती रही । सबने अपने अपने हिसाब से डॉक्टर आंबेडकर के कथनों का चुनाव किया, और ज्यादातर मौके पर उनका इस्तेमाल दूसरे पर हमला करने में किया गया। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने कभी नहीं सोचा कि भारत में हमारी उपेक्षा हुई है, भारत में मुझे समय समय पर अपमान झेलना पड़ा है, तिरस्कार झेलना पड़ा है, मैं भारत छोड़कर दुनिया के कहीं दूसरे देशों में चला जाऊंगा। शायद गृहमंत्री आमिर खान के संदर्भ में कह रहे थे। पर क्या यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि क्या डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने कभी सोचा होगा कि उनके बनाए संविधान के तहत चुनकर आने वाले सांसद अपने विरोधियों को पाकिस्तान भेजने की बात करेंगे। आप इन चेहरों को जानते होंगे जिन्होंने कभी राजनीतिक विरोध तो कभी खान पान के आधार पर विरोधी से लेकर समुदाय विशेष को पाकिस्तान भेजने की बात करते रहे हैं।
(यह लाइन रविश कुमार के प्राइमटाइम से ली गई है। ) 
क्या डॉक्टर आंबेडकर कभी ऐसा कहते। सोशल मीडिया में तो लोग अभियान चलाने लगे कि आमिर ख़ान की फिल्में नहीं देखेंगे और वे जिस कंपनी के ब्रांड अंबेसडर हैं उसका मोबाइल ऐप अपने फोन से हटा देंगे। यह वही छूआछूत है जो समाज में दलितों को चलने के लिए अलग रास्ता तय करता है और दलित दुल्हे को घोड़ी से उतार देता है। क्या डॉक्टर आंबेडकर छूआछूत की इस नई प्रवृत्ति का कभी समर्थन करते। डॉक्टर आंबेडकर को पढ़ना चाहिए। वे भावुकता, व्यक्ति पूजा से ऊपर उठकर तार्किकता पर ज़ोर देते थे। उनकी यही खूबी थी जिसके कारण उन्होंने हिन्दू धर्म तो छोड़ दिया मगर देश नहीं छोड़ा। डॉक्टर आंबेडकर को समझना और उनका नाम लेकर राजनीतिक नारे लगाना दोनों दो चीज़ें हैं। अगर आंबेडकर के रास्ते पर चलने का दावा सब कर ही रहे हैं, तो फिर ऐसा क्यों हैं कि एक साल में दलितों के प्रति हिंसा 19 फीसदी बढ़ जाती है। दलित हिंसा के मूल में जातिगत प्रभुत्व और नफरत की बड़ी भूमिका है। जिन वक्ताओं ने यह कहा कि डॉक्टर आंबेडकर ने बहुत अपमान झेले उन्होंने यह सवाल क्यों नहीं उठाए कि आज भी दलितों को इस तरह से अपमान क्यों झेलने पड़ते हैं। क्या किसी बड़े वक्ता ने जातिवाद पर हमला बोला। प्रधानमंत्री ने सही कहा कि किसी को आरोप लगाना हो तो डॉक्टर आंबेडकर की बातों का इस्तेमाल कर रहा है और किसी को बचाव करना हो तो डॉक्टर आंबेडकर की बातों का सहारा लेता है। राजनीति में भक्ति को लेकर डॉक्टर आंबेडकर ने कहा था कि भारत में, भक्ति या जिसे हम समर्पण का मार्ग या नायक पूजा कहते हैं का राजनीति में रोल होता है। दुनिया के किसी हिस्से में इस कदर नहीं होता जितना भारत में होता है। धर्म में भक्ति हो सकता है आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो लेकिन राजनीति में भक्ति या नायक पूजा पतन और तानाशाही की ओर ले जाती है।  
राजनाथ सिंह जी ने कहा क़ि शायद  बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने इसलिए सोशलिज्म और सैकुलरिज्म, इन शब्दों का प्रयोग नहीं किया था कि वे मानकर चलते थे कि यह भारत की जो मूल प्रकृति में निहित है, भारत का जो मूल स्वभाव है, उसमें ही यह समाहित है, अलग से इसका उल्लेख करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आज की राजनीति में सर्वाधिक दुरुपयोग यदि किसी शब्द का हो रहा है। यह दुरुपयोग रुकना चाहिए।  सेक्युलर शब्द का जो औपचारिक अनुवाद है वह है पंथनिरपेक्ष,धर्मनिरपेक्ष नहीं। इस हकीकत को भी वह समझते थे। आप ही बतायें बिहार के चुनाव में बीजेपी का गौ मांस का मुद्दा उठाना या मतदान से एक दिन पहले अखबारों में गाय का विज्ञापन देना सेकुलरिज्म है या सिकुलर कामा है। यह तस्वीर बंगाल की है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जमीयत उलेमा हिंद की रैली में हिस्सा लेना सेकुलरिज्म है या सिकुरज़्म है। टोपी उतार देना सेकुलर है या मंदिर में जाकर चंदन दान कर देना। हमारे नेता धर्म और राजनीतिक को मिक्स करते रहे हैं। कोई भी नेता आज जातिवाद पर बोलता हुआ बिल्कुल नहीं दिखाई दिया, सिवाय शरद यादव के।  शरद यादव ने जातिवाद के उपर जिस तरह से आज के दौर को लेकर बहुत अच्छी बातें कहीं।  लेकिन मुझे दुख इस बात को लेकर है क़ि लोग अंबेडकर साहब के सेकुलर शब्द ना प्रयोग करने को लेकर तो बातें कर रहे हैं, लेकिन उसकी व्याख्या अपने अपने तरीके से कर रहे हैं।  कोई भी उनके विचारों पर नहीं जाने की कोशिश करता है।  तभी मैं कहता हूँ कि अंबेडकर को सही से पढ़ना चाहिए इन नेताओं को भी।  उन्होने कितना कुछ लिखा है सेकूलरिज़्म के बारे में मुझे ताज्जुब होता है।  डॉ अंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में दिए अपने भाषण में भारतीय लोकतंत्र के लिए तीन बड़े खतरे बताए थे और ताज्जुब की बात है कि ये सभी परिस्थितियां अतीत में देश देख चुका है।  वर्तमान में भी इसके छिटपुट उदाहरण मौजूद हैं।  उनकी पहली चेतावनी जनता द्वारा सामाजिक-आर्थिक लक्ष्य हासिल करने के लिए अपनाई जाने वाली गैरसंवैधानिक प्रक्रियाओं पर थी।  पने भाषण में अंबेडकर सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों की प्राप्ति में संविधान प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग जरूरी बताते हुए कहते हैं, ‘इसका मतलब है कि हमें खूनी क्रांतियों का तरीका छोड़ना होगा, अवज्ञा का रास्ता छोड़ना होगा, असहयोग और सत्याग्रह का रास्ता छोड़ना होगा। ’ यहां अंबेडकर यह भी कहते हैं कि लक्ष्य हासिल करने के कोई संवैधानिक तरीके न हों तब तो इस तरह के रास्ते पर चलना ठीक है लेकिन संविधान के रहते हुए ये काम अराजकता की श्रेणी में आते हैं और इन्हें हम जितनी जल्दी छोड़ दें, हमारे लिए बेहतर होगा। 
इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपने एक आलेख में कहते हैं कि अंबेडकर ने उस समय गांधी, नेहरू और सरदार पटेल के लिए जनता में अंधश्रद्धा देखी थी।  इस स्थिति में ये नायक किसी सकारात्मक आलोचना से भी परे हो जाते हैं और शायद यही समझते हुए अंबेडकर ने अपने भाषण में राजनीतिक भक्ति को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था।  बदकिस्मती से भारतीय राजनीति में यह बीमारी काफी गहरी है।  क्षेत्रीय स्तर की राजनीति में तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन और वर्तमान मुख्यमंत्री जयललिता इसके सबसे बड़े प्रतीकों में गिने जा सकते हैं तो वहीं बिना किसी संवैधानिक पद पर रहते हुए बाल ठाकरे का भी रुतबा भी अपने भक्तों की बदौलत किसी राजनीतिक भगवान से कम नहीं था।  राष्ट्रीय स्तर पर इंदिरा गांधी इस बीमारी का सबसे सटीक उदाहरण मानी जा सकती हैं।  1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और पाकिस्तान की पराजय ने उन्हें समर्थकों के बीच अंधश्रद्धा का विषय बना दिया था।  हैरानी की बात नहीं है कि उनके शासनकाल में उन्हें तानाशाही प्रवृत्ति का राजनेता माना जाता था और आखिरकार उन्होंने ही देश में आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को स्थगित किया था।  इंदिरा गांधी के समय सोशल मीडिया नहीं था और यह भी साफ है कि उनके कट्टर समर्थकों को ‘भक्त’ नहीं कहा जाता था।  यहां हम कोई नतीजा नहीं निकाल रहे, लेकिन वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थकों के लिए सोशल मीडिया पर प्रचलित ‘भक्त’ शब्द अब आम बोलचाल की भाषा में भी इस्तेमाल होने लगा है।  सोशल मीडिया में यह स्थिति है कि प्रधानमंत्री की आलोचना पर किसी को भी हजारों गालियां पड़ने की पूरी गारंटी ली जा सकती है।  तानाशाही प्रवृत्ति का आरोप उनके ऊपर भी लगता है।  ये ठीक वही स्थितियां हैं जिनके बारे में डॉ अंबेडकर ने अपने भाषण में जिक्र किया था और जिन्हें लोकतंत्र के लिए खतरा माना जाता है। 

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