Sunday, January 31, 2016

गांधी को किसने मारा ?

आज मैंने इंडियन एक्सप्रेस में रामचंद्र गुहा का गांधी जी की हत्या पर लेख पढा तो कुछ नया जानने को मिला। यह सब जानकर और विचलित हो गया। दरअसल बचपन से ही मेरे मन में नाथूराम गोडसे नाम के आदमी के लिए एक अजीब-सी बेचैनी भरे प्रश्न थे। गांधी जी जैसे महान इंसान का इस आदमी ने कत्ल  क्यों किया? कानपुर में, संघ के एक कॉलेज (राम जानकी इंटर कॉलेज, बिठूर) में पढते समय मेरे एक हिन्दुत्ववादी मित्र ने नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे की लिखी 'गांधी हत्या और मैं', पुस्तक मुझे पढने के लिए दी थी।
यह पुस्तक जनता के बीच उसके द्वारा दिया गया बचावनामा है, जो उसने आजीवन कैद की सजा होने के बाद लिखी थी। ये किताब पढने के बाद मुझे महसूस हुआ कि नाथूराम गोडसे धर्मांध था। जैसा कल उमा भारती ने जिसको सिरफिरा कहा, ऐसा तो वह हरगिज नहीं था। नाथूराम और उसके साथियों ने जान-बूझकर, षड्यंत्रपूर्वक ठण्डे दिमाग से सोच समझकर गांधीजी की हत्या की थी। इन लोगों ने गांधीजी की हत्या क्यों की, इस प्रश्न के जवाब की तलाश में धीरे-धीरे गांधीजी की राजनीति और हिन्दुत्ववादियों की राजनीति के बीच का फर्क मुझे समझ में आने लगा। 
मुसलमानों ने भारत का विभाजन करवाया, फिर भी मुसलमानों, उनके संगठन मुस्लिम लीग तथा नवनिर्मित पाकिस्तान के प्रति गांधी ने नरम रुख अपनाया था, ऐसी दलीलें उन पुस्तकों, पत्रिकाओं में तथा मौखिक रूप से भी हिन्दुत्ववादी देते रहे हैं। कई बार तो इन्होंने अपना अलग इतिहास बनाने की कोशिश की। ये लोग कहते हैं कि हद तो तब हो गई जब गांधीजी ने पाकिस्तान को, उसके हिस्से के, 55 करोड रुपये देने की जिद उपवास की धमकी के साथ की। पाकिस्तान में हिन्दुओं पर अत्याचार तथा कश्मीर पर हमला करने वालों को 55 करोड रुपये देने की बात से उग्र होकर नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या हिंदू हित में की थी।
आम तौर पर गांधीजी की हत्या के सम्बन्ध में, आम लोगों की भी धारणा ऐसी ही है। अनेक इतिहासकार और पत्रकार भी ऐसा ही मानते हैं। मैं इस बात से कभी सहमत नहीं हो पाया और आज तक 4-5 किताबें पढीं और बहुत लोगों से जानकारी लेता रहा। गूगल पर इस बारे में विश्वास नहीं किया। 
बहुत पहले मैंने एक किताब 'द लास्ट फेज' पढी थी। लेखक का नाम अभी तो याद नहीं है। पूरी तो नहीं लेकिन किताब के कुछ हिस्से अब तक स्मृति में हैं। इस किताब में गांधी जी की हत्या के केस की निगरानी करने वाली अदालत के जस्टिस खोसला के एक पत्र को कोर्ट किया गया है। प्रोसीक्यूशन की ओर से एडवोकेट के संस्मरण हैं। जो असलियत बताते हैं।
इसके विपरीत हिंदुत्ववादियों से बात करने पर गोडसे बन्धुओं का प्रतिवाद करने वाली कई दूसरी पुस्तकों के हवाले से और कुछ ही कहा जाता है। लेकिन अब तक मुझे यकीन हो चुका था कि गांधीजी की हत्या 55 करोड रुपये के प्रकरण या विभाजन के कारण नहीं की गयी थी। भारत का विभाजन और 55 करोड के एपिसोड के बहुत पहले ही इस ग्रुप ने गांधीजी की हत्या करने का निश्चय कर लिया था और कई बार उनकी हत्या करने के प्रयास भी किये थे। 
गांधी-हत्या केस के आरोपियों में से गोपाल गोडसे और मदनलाल पाहवा के इंटरव्यू की कापी मैंने एक पत्रकार महोदय के फेसबुक पेज से लेकर पढी थी। जिसमें बम कांड के बारे में पूछे जाने पर मदनलाल ने कहा था कि उसने गांधीजी की हत्या करने के लिए नहीं, बल्कि चेतावनी देने के लिए बम फेंका था। कई हिंदूवादी संगठनों के अनुसार गोडसे बन्धु की पुस्तकों में भी यही कहा गया है। उस इंटरव्यू में गोपाल गोडसे के पास अधिकांश प्रश्नों के उनर नहीं थे। दूसरे की बात सुनी-अनसुनी करके वे अपनी ही बात कहते रहे। स्वयं को बहुत बडा देशभक्त और नाथूराम को विद्वान और चरित्रवान होने का बखान करते रहे।
हिन्दुत्ववादियों में फरेबियों के सभी लक्षण दिखाई देते हैं। वे फासीवादियों की थ्योरी पर चलते हैं। उनउनका मानना है कि 'असत्य'को अलग अलग स्थानों पर, अलग-अलग तरीकों से और बार बार कहते रहने पर एक दिन वह 'सत्य' मान लिया जाता है। इसीलिए ये लोग तीन 'झूठ' प्रचारित करने की लगातार कोशिशें करते हैं। पहला झूठ है कि गांधीजी मुसलमानों तथा पाकिस्तान के पक्षपाती थे। दूसरा झूठ है कि गांधीजी की हत्या 55 करोड रुपयों के कारण की गयी थी। तीसरा झूठ है कि गांधी की हत्या करने वाले बहादुर और देशभक्त थे। परन्तु सत्य यह है कि ये तीनों बातें बिल्कुल मिथ्या हैं। गांधीजी क्या मुसलमानों के तरफदार और पक्षपाती थे? क्या देश के विभाजन के लिए गांधीजी जिम्मेदार थे? गांधी की हत्या के सम्बन्ध में इन लोगों की थीसिस में कितना झूठ भरा पडा है, यह समझने के लिए सर्वप्रथम उक्त तीनों बातों की तह में जाना और समझना जरूरी है। 9 जनवरी,1915 को गांधीजी जब अफ्रीका से हिन्दुस्तान वापस आये, तब कांग्रेस का नेतृत्व लोकमान्य तिलक कर रहे थे। लोकमान्य तिलक की विचारधारा ब्राह्मणवाद की ओर थी। गोपालकृष्ण गोखले की अस्वस्थता के कारण प्रगतिशील, सुधारवादी शक्तिया कमजोर पड गयी थी। उस समय लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में कुछ हिन्दुत्ववादी कांग्रेसी आन्दोलन चला रहे थे,तो कुछ सावरकर जैसे हिन्दुत्ववादी क्रान्तिकारी लोग भूमिगत रहकर हिंसक आन्दोलन की तैयारी कर रहे थे। लोकमान्य तिलक ने घोषणा की कि "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है" इसमें स्वराज शब्द आता है। उस समय इसका अर्थ पूर्ण स्वराज्य नहीं था। लोकमान्य के मन में स्वराज्य का आशय था ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत ही दमन रहित शासन चले। शायद होमरूल। यही उनकी मांग थी। ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण के कारण तिलक कांग्रेस के प्रभाव का विस्तार नहीं कर सके थे। उधर अंबेडकर के नेतृत्व में महाराष्ट तथा अन्य प्रान्तों में ब्राह्मणविरोधी आन्दोलन जोर पकडने लगा था। जिसने कांग्रेस के हिन्दुत्ववादी रुझान के नेतृत्व को प्रभावहीन बना दिया था। अक्सर कई क्रान्तिकारी छोटी घटनाएं करने के बाद पकड लिये जाते थे। अलीपुर बम केस में अरविन्द घोष जैसे नेता भी कोई योजना बनाने से पहले ही पकड लिये गये थे। 
उस समय के अधिकांश नेता भारत की सामाजिक वास्तविकताओं से अनजान थे। भारत में आते  ही कांग्रेस के ब्राह्मणवादी झुकाव तथा भूमिगत आन्दोलन की दूरियां गांधीजी की समझ में आ गयी। अब गांधीजी ने कांग्रेस को व्यापक जन संगठन में परिवर्तित करने का काम आरम्भ कर दिया। पहली बार दलित आदिवासी पिछडे वर्ग के लोग महिलाए कांग्रेस से जुडे।  चम्पारण में संघर्ष के बाद, खिलाफत आन्दोलन को समर्थन देकर मुसलमानों को साथ लेने का प्रयास गांधीजी ने किया। ऐसे में कट्टरपंथियों को कांग्रेस नापसंद आने लगी। लेकिन गांधीजी के उदार राष्टंवाद के सामने संकुचित हिन्दू राष्टवाद टिक सके ऐसा भी सम्भव नहीं था। तो कुछ लोग हिन्दू महासभा से जुड गये थे तो कुछ ने 1925 में राष्टींय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की। फिर इन तथाकथित राष्टवादियों ने आजादी के एक भी आन्दोलन में कभी भाग नहीं लिया। उनको गांधीजी का नेतृत्व मान्य नहीं था। लेकिन गांधीजी तथा कांग्रेस से अलग,स्वतंत्र रूप से कोई एक भी आजादी का आन्दोलन इन लोगों ने नहीं चलाया। किसी हिन्दुत्ववादी का आजादी के आंदोलन में शामिल होने के बारे में पूछे जाने पर ये लोग सावरकर का नाम लेते हैं। सावरकर ने एक पत्रिका निकालने के अलावा कुछ नहीं किया। केवल दूर से ही आदेश देते थे तभी उनके पाठक भी नाराज हो गए थे। एक बार हिम्मत का काम किया था, वो भी जब ब्रिटिश सरकार के जहाज से कूदकर अपनी जान बचाने की कोशिश की थी। फिर जेल से रिहा होने के लिए लिखित माफी मांगी थी। उस माफीनामे में लिखा था कि 10 साल तक रत्नागिरी के बाहर नहीं जाएगे।
रही बात विभाजन की तो 1937 में हिन्दू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन में खुद सावरकर ने द्विराष्टंवाद के सिद्धान्त का समर्थन किया था। इन लोगों ने 1942 की आजादी के आन्दोलन में तो भाग नहीं ही लिया था, उल्टे ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर यह जानकारी भी दी थी कि हम आन्दोलन का समर्थन नहीं करते हैं। गुरु गोलवलकर ने तो हिटलर की तारीफ में किताब तक लिख दी थी। जिसका संपादन संघ ने बाद में बंद कर दिया था। फिर भी अंग्रेजों ने उनको गिरफ्तार नहीं किया। भारत विभाजन के लिए जितने जिम्मेदार मुस्लिम लीग तथा अंग्रेज हैं, उतने ही हिन्दुत्ववादी भी जिम्मेदार हैं। आजाद भारत में हिन्दू ही हुकूमत करेंगे ऐसा शोर मचाकर हिन्दुत्ववादियों ने विभाजनवादी मुसलमानों के लिए एक ठोस आधार दे दिया था। गांधीजी ने तो अन्त तक भारत विभाजन का विरोध किया था। गांधीजी ने अन्तिम समय तक इसके लिए जिन्ना के साथ मीटिंग कीं। गांधीजी सर्व समावेशक उदार राष्टवादी थे। इसीलिए उन्होंने सब धर्मों को अपनाया था केवल मुसलमानों को ही नहीं।
गांधीजी को भारत विभाजन रोकना चाहिए था। लेकिन इसके लिए इन लोगों ने क्या किया? गांधीजी को विभाजन रोकने के लिए उपवास करना चाहिए था। ऐसी अपेक्षा करने का इनको क्या नैतिक-अधिकार है? जिसको आप देश के लिए कलंक समझते हैं, जिसका वध करना जरूरी मानते हैं, उसी से आप ऐसी अपेक्षाए भी रखते हैं? आपने क्यों नहीं विभाजन को रोकने के लिए कुछ किया? सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर ने विभाजन के विरुद्ध क्यों नहीं आमरण उपवास किया? क्यों नहीं इसके लिए उन्होंने हिन्दुओं का व्यापक आन्दोलन चलाया? जब गांधीजी अकेले पड जाने के कारण देश का विभाजन रोक नहीं पाये, तब आप उनको राक्षस मानकर उनका वध करने की साजिश रचते हो? इसको मर्दानगी कहेंगे या नपुंसकता?
गांधी जैसे लोग पैदा नही होते , अवतरित होते हैं। ऐ हमारा सौभाग्य है कि उन्होंने हमें अपनी बात कहना और अहिंसक लड़ाकू बनना सिखाया। आज कल देश में भ्रम फैलाने की राजनीति बहुत हो रही है। ऐसी ही खराब राजनीति है बापू के नाम पर। देश के बहुत से यूवा इस राजनीति का शिकार हो रहे है।
मैं इसके कई प्रत्यक्ष उदाहरणों से रोज मिलता हूँ। आज गांधी जी को एक व्यक्ति समझना भूल होगी, अब वह एक चरित्र हैं। मेरा प्रयास है कि मैं भी इस चरित्र का एक अंश मात्र अपने जीवन में ढाल सकूँ तो अपने को सफल समझूँगा। राष्ट्रपिता किसी गली मुहल्ले या किसी शहर का अनचाहा नाम नहीं है। एक जीवित इतिहास है। गांधी एक विचारधारा है जो  कभी मर नहीं सकती। यह विचारधारा बहुमूल्य धरोहर है।  हवा और पानी की तरह। वर्तमान और अगली पीढ़ी की दुनिया के लिए भी......

"है उबलता लहू जिनका मंदिरों के नाम पर,
जंग-ए-आजादी में उनका खून तो पानी रहा।"

Thursday, January 28, 2016

महिलाओं को मंदिर में जाने से क्यों रोंका जाता है?

लगभग एक महीने पहले मैने महाराष्ट्र के बारे में एक पोस्ट में लिखा था कि यहाँ की परंपराएँ अभी तक महिलाओं को निचले दर्जे का महसूस कराने में पीछे नहीं रहती हैं। आपको याद होगा कि जब अहमद नगर के शनि सिंगडपुर के मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को वर्जित होने के बावजूद एक लड़की ने प्रवेश कर तेल चढ़ा दिया था जिसके बाद काफ़ी हंगामा हुआ था। इस समय भी कुछ एक्टिविस्ट महिलाओं की सेना मंदिर में प्रवेश को लेकर आंदोलन कर रही है। जिसपर महाराष्ट्र की राजनीति काफ़ी बढ़ गई है। वहीं इस मुद्दे के हल के लिए महिला ब्रिगेड की नेता तृप्ति देसाई बुधवार दोपहर राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलीं और अपनी बातें मुख्यमंत्री के सामने रखी। आज तो सीएम फाड़नवीस का भी बयान आया है क़ि महिलाओं को पूरा अधिकार है। किसी क़ानून में जब इस तरह की बात नहीं लिखी है, तो ऐसा कैसे किया जा सकता है? अभी अभी एक मित्र का मेरे ट्वीट पर कमेंट किया  कि मैने बहुत अधर्म की बात कर डाली। मुझे अज्ञानी तक बता डाला गया। मेरी बात के पीछे कुछ तर्क हैं लेकिन उन्होने यह तो बताया कि यह पढ़ो, लेकिन यह नहीं बताया कि क्या पढ़ूँ?  
कहते हैं कि यहाँ किसी भी घर में दरवाजे नहीं हैं, क्योंकि चोर नहीं हैं, 2010 में यूको बैंक ने यहाँ पर शाखा में दरवाजे नहीं लगवाए थे, तो पुलिस की नींद उड़ गई थी। लेकिन यह परंपरा अब बदल चुकी है। लोग चोरो के कारण दरवाजा लगाने लगे हैं।
समस्या दरअसल यह है कि इस तरह की मानसिकता के लोग (जिनमें स्त्रियां भी शामिल हैं) कभी लड़कियों-औरतों को बेटी की नजर से देख ही नहीं पाते, इसीलिए यह इनकी समझ से परे है कि लड़कियां भी देवताओं की बेटी समान हो सकती हैं। अपनी सोच की गंदगी दूर नहीं कर पाते, और चले आते हैं लड़कियों की पवित्रता का हिसाब-किताब करने। अच्छा चलो, एक बार को मान भी लिया कि लड़कियां कुछ खास मंदिरों में घुसने लायक पवित्र नहीं होतीं, तो भी भगवान की पवित्रता ज्यादा पवित्र है या लड़कियों की ‘अपवित्रता’ ज्यादा अपवित्र है? अरे जिसे पूजते हो, उस पर इतना भरोसा तो रखो कि उसके सान्निध्य में हर ‘अपवित्रता’, पवित्र हो जाएगी। अब बात उन तर्कों की जो इस मंदिर में स्त्रियों की पाबंदी के पक्ष में दिए जाते हैं। इन्हीं में से एक तर्क यह है कि इस मंदिर में नाभि के ऊपर नग्नावस्था में पूजा की जाती है, इसीलिए औरतों के वहां जाने की मनाही है, क्योंकि वे नग्नावस्था में पूजा नहीं कर सकतीं। तो क्यों न ऐसा किया जाए कि स्त्रियों के लिए दर्शन का एक समय तय कर दिया जाए। शनिदेव (और वह भी शनिदेव की उसी मूर्ति) की पूजा के बिना जिनका जीवन रुका हुआ है, वे स्त्रियां उस तय समय के दौरान वहां पूजा-अर्चना कर लें जाकर। अब शनिदेव ने खुद दर्शन देकर तो यह कहा नहीं होगा कि मेरी पूजा नग्नावस्था में ही करनी होगी, और वैसे भी, अगर श्रद्धा सच्ची है तो क्या नग्नावस्था और क्या वस्त्रावस्था। सामान्य तौर पर तो स्त्रियां बाल भी नहीं मुड़वाती हैं, लेकिन तिरुपति बालाजी के मंदिर में दर्शन के लिए तो ऐसा भी करती हैं न! तो नग्न भी हो लेंगी। 
अब बात करते हैं इस पूरे अभियान के एक बहुत कम चर्चित पहलू की। एक आम लड़की के मंदिर में घुसने पर हुए विवाद से शुरू हुई इस मुहिम की लीडर अब भूमाता रणरागिनी ब्रिगेड की अध्यक्ष तृप्ति देसाई हैं, जिनके बारे में जानकारी कुछ ऐसी है कि 3 साल पहले उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है। हालांकि, आप किसी भी धर्म के हों, गलत को गलत कहना और बुराइयों के खिलाफ खड़े होना आपका हक होने के साथ-साथ जरूरी भी है, लेकिन अगर तृप्ति देसाई के विषय में यह जानकारी सही है, तो मुझे इस बात का आशंका है कि एक सही मुहिम कहीं राजनीति की भेंट न चढ़ जाए।







Tuesday, January 26, 2016

राष्ट्रभक्ति तो खून में बसी है दोस्त



अभी अभी खाना खाने के बाद कुछ देर टहलने के लिए अकेले ही निकल पडा तो देखा कि फुटपाथ पर कुछ तोडफोड हुई है नया बनाने के लिए। इस लिए नीचे चलने लगा तो एक 9-10 साल का लडका आग जला कर बैठा है। मैं भी उसके पास रुक कर मजाक में बोला,"बडी शर्दी है, तो मुझे एक ईटों का बना हुआ एक घर जैसा(छोटा सा बच्चों के खेलने वाली जगह) दिखाने लगा। ऊपर से पुराना अखबार हटाया तो फोटो में दिखाई दे रहे तिरंगे को बनाया है। बोला कल फ्लैग लगाऊँगा, तो मैंने मराठी में उसका नाम पूछा, मुझे लगा मराठी ही होगा। लेकिन जब उसने अपना नाम बताया तो अविश्वसनीय खुशी हुई। उसका नाम था, "रेहान"। कन्फर्म करने के लिए दो बार पूछा, "क्या?" फिर बताता है कि यहां अंडे की दुकान मेरे अब्बू की है।
अब ये तो पक्का विश्वास है कि मुस्लिम समाज के गरीब लोग भी अपने बच्चों को उतनी ही राष्ट्रभक्ति सिखाते हैं जितनी हमारे राष्ट्रवादी बजरंगी। रही बात उनमें से किसी एक दो के गलत रास्ते पर जाने की तो इससे पूरा समुदाय वैसा नहीं हो जाता है। हमारे यहां आशाराम जैसे कुछ बाबा खराब होने से सबको तो वैसा नहीं कह सकते हैं। अगर कुछ युवाओं को कुछ बाहरी और इंसानियत के दुश्मन लोग बहलाकर या ब्रेनवाॅस कर दुरूपयोग करते हैं तो उन्हें राष्ट्रभक्ति सिखा कर हम अपने देश के साथ ही रखेगे। उन्हें सौतेले की तरह नहीं सगे भाई की तरह समझाएंगे। फिर भी जो नहीं माने तो जाने कितने मुजाहिदीन हमारे देश के रक्षकों के आगे हार चुके हैं। तब फिर हमारे देश का मुस्लिम समाज मुंबई हमले के बाद के जैसे ऐसे लोगों को अपने कब्रिस्तान में जगह तक नहीं देगा। मुझे तो बडा गर्व है देश के ऐसे भविष्य(रेहान) पर। आप भी अपने आसपास ऐसे देश भक्त बच्चों को सम्प्रदायिक नजरों से बचाइए।

एस सी एस टी एक्ट 2015

एस सी एस टी एक्ट 2015 पता नहीं कब बदलकर आ गया मुझे पता भी नहीं चल पाया। अब अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के खिलाफ अत्याचार करने वालों पर अब से कड़ी कार्रवाई हो सकेगी। इस बारे में शिड्यूल्ड कास्ट एंड द शिड्यूल्ड ट्राइब्स अमेंडमेंट एक्ट, 2015 मंगलवार से प्रभावी हो गया है।
नए एक्ट के अनुसार एसटी/एससी सदस्यों के बाल या मूंछ छीलना, उन्हें खेती करने से रोकना, जूते-चप्पलों की माला पहनाना, शवों का निस्तारण करने और कब्र खोदने के लिए मजबूर करना, जाति का नाम लेकर गाली देना, साफ-सफाई के लिए इस्तेमाल करना जैसे कार्य जिनसे उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती है।
मजबूर करना अपराध माना जाएगा। इन काम के लिए इन्हें मजबूर करना अपराध माना जाएगा। सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार, समाज की किसी महिला के कपड़े उतारकर उसे चोट पहुंचाने, घर या गांव छोड़ने के लिए मजबूर करने और लैंगिक इशारे करने पर भी कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। अब विशेष अदालतों के पास अपराध के स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार होगा। आरोप पत्र दाखिल होने के बाद वे दो महीने के अंदर केस की सुनवाई पूरी कर सकेंगी।
केंद्र सरकार  की योजना इस कानून को प्रभावी रूप से लागू कराने की भी है। इसके लिए गैर एससी या एसटी सरकारी कर्मियों के ड्यूटी में कोताही बरतने पर दंडित करने के प्रावधान पर विचार कर रही है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री ने एक जवाब में कहा कि सभी पक्षों से सलाह मशविरा के आधार पर अत्याचार रोकथाम संशोधन के बारे में विचार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस संशोधन का लक्ष्य एससी और एसटी समुदाय को बेहतर न्याय दिलाना है।

Monday, January 25, 2016

गणतत्र दिवस विशेष

आज हमारा देश 67वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है. 
आप सबको गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। आज का दिन हमारे लिए बहुत महत्तवपूर्ण है। आज ही के दिन 26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ था। आज का यह दिन भारत के लिए सबसे गौरवमयी दिन है। इस गौरवमयी दिन के अवसर पर मैं संविधान और अनुशासन के विषय में अपने विचार प्रस्तुत करना चाहता हूँ। 
संविधान का अर्थ है किसी राष्ट्र की शासन-व्यवस्था के लिए बनाए गए आधारभूत नियम और कानून। हर देश का एक संविधान होता है। कानून-व्यवस्था होत है। उसका पालन कराने के लिए प्रशासन और पुलिस होती है। कानून-व्यवस्था का उल्लंघन करने वालों को सजा दी जाती है। यह कानून-व्यवस्था देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान होती है। सभ्य समाज का नागरिक होने और कानून का डर होने के कारण हम सरकारी नियम-कानूनों का पालन करते हैं। कानून-व्यवस्था को तोड़ने पर हमें सजा का भय होता है।
अब यदि हम संविधान के व्यापक अर्थ को लें तो प्रशासन, स्कूल, समाज, परिवार सभी जगह हमारे द्वारा बनाए गए नियम, सिद्धान्त और आदर्श हमारा संविधान है। कोई भी संविधान तब सार्थक माना जाता है जब वह समाज को अनुशासित करे। अनुशासन से अभिप्राय नियम, सिद्धान्त तथा आदेशों का पालन करना है। जीवन को आदर्श तरीके से जीने के लिए अनुशासन में रहना आवश्यक है। अनुशासन के बिना व्यक्ति पशु के समान है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, ‘अनुशासन राष्ट्र का जीवन-रक्त है।’
वर्तमान की बात करें तो 2
-3 दिन के लिए लोग फेसबुक और व्हाट्सएप पर तिरंगे का डीपी लगाकर देशभक्ति जाहिर कर रहे हैं. अच्छा भी है, जेनरेशन के हिसाब से लोग जिस तरह से सेलिब्रेट करना चाहें करें, यह उनकी आज़ादी में सामिल होना चाहिए. यह आज़ादी, लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही जिंदा है. लेकिन जैसा इस देश में कुछ दिनों से चल रहा है, उससे ऐसा तो नहीं लगता है कि देश का कोई भी नेता लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए बहुत चिंतित दिखता है. चाहे मोदी, राहुल हों या फिर अखिलेश और केजरीवाल. सब अपनी अपनी राजनीति को चमकाने के चक्कर में लोकतंत्र पर हमला करते हैं. चूँकि सरकार भाजपा की है, इसलिए सारी ज़िम्मेदारी भी सत्ताधारी पार्टी पर ही आ जाती है. अगर देश को बचाना है, लोकतंत्र को बचाना है तो लोगों की आज़ादी जिंदा रखनी पड़ेगी. उनको बोलने की आज़ादी हो, उनको विरोध करने की आज़ादी हो, उनको खाने की (शाकाहार या माँसाहार), पीने की, क्या पहनना है इसकी भी आज़ादी हो(ख़ासकर औरतों को), युवाओं को सोसल मीडिया पर बोलने की आज़ादी हो, ज़रा सी बात पर टिड्डी दल ना छोड़ दिया जाए थोड़ी सी आलोचना करने पर. सबको प्यार करने की आज़ादी हो, देखना अभी कितने बजरंगी तैयारी में लगे होंगे वैलेंटाइन के विरोध के लिए. विरोध कोई वैचारिक या तार्किक न होकर गुंडागिरी टाइप होता है. वैसे इन समाज विरोधियों का भी हम जैसे लोग विरोध तो करते ही रहेंगे, चाहे जितना भी संघर्ष क्यों ना करना पड़े.  

"बुजदिल इंसा को जिंदा नहीं कहते, 
पत्थर बनाता है खामोश रहना भी"।।
ज़्यादा राजनीतिक बातें ना करके केवल इतना ही कहना चाहता हूँ क़ि सब अपने अपने स्तर पर ईमानदारी से काम करिए, ज़रूरी नहीं है कि सभी सेना में ही भर्ती होकर बॉर्डर पर लड़ेंगे जाकर. एक पूर्ण देश तब बनता है जब उसका हर नागरिक अपनी अपनी ज़िम्मेदारी निभाता है. सीए अपना काम करे, नेता अपना काम "ईमानदारी से करे, वकील अपना काम करे, पुलिस भी अपना काम करे तो पूरा देश मजबूत बनेगा. हम आज ही देखकर चलेंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ी का भविष्य ख़तरे में होगा. जहाँ पर भी हमें कमी दिखती है, कुछ भी ग़लत होता है कोशिश करें कि हमारी आवाज़ दबी ना रहे. चाहें वो ग़लत करने वाला हमारा अपना ही क्यों ना हो? सबसे ज़्यादा ज़रूरी तो महिलाओं का बोलना है. उनको भी अपने अपने क्षेत्रों में रहकर लड़ना पड़ेगा. कितने भी बड़े पद पर क्यों ना हों उनको वहाँ कभी ना कभी तो महिला होने के कारण पीछे रहना ही पड़ता है. किसी ना किसी को तो आवाज़ उठानी ही पड़ती है. परिवार भी है तो क्या हुआ अपनी सास के खिलाफ भी आवाज़ उठाइए अगर वो ग़लत करती है तो अगर आज आपने सुन लिया तो कल आपकी बेटी को भी बर्दास्त करना पड़ेगा. आप ही उसको यह शिक्षा देंगी. जबकि बदलाव की शुरुआत तो आप से ही होनी है. 

आओ सड़क पर लड़कर एक हिन्दुस्तान बनाते हैं,
बहुत आसान है बंद कमरे में वन्दे मातरम कहना.........


Sunday, January 24, 2016

छात्र राजनीति पर चिंता

अभी हाल ही में मेरे पास भी मुंबई यूनिवर्सिटी में एनएसयूआई की तरफ से एक छात्रनेता मित्र की तरफ से वैचारिक नेता के तौर पर शामिल होने का निमंत्रण मिला था, लेकिन स्थितियों के हिसाब से और कांग्रेस की वजह से मुझे वहाँ जाना ठीक नहीं लग रहा था छात्र संगठनों की राजनीतिक उठापठक बताती है, क़ि देश के सभी राजनैतिक दल किस तरह की राजनीति करना चाहते हैं। यूपी में समाजवादी छात्रसभा, बंगाल में टीएमसी की स्टूडेंट विंग, कर्नाटक और केरल सही पूर्वोत्तर में एनएसयूआई और पूरे देश में एबीवीपी अलग अलग मुद्दों पर बहुत उग्र होकर छात्र राजनीति कर रहे हैं। अपवाद स्वरूप आजतक मैने कभी भी एएसए(अंबेडकर स्तडेंट एसोसिएसन) को ऐसा कभी यूपी की मायावती सरकार में करते नहीं देखा। लेफ्ट का छात्र संगठन भी बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार के समय ऐसा ही करता रहा है। यूपीए सरकार में हमेशा ही एन एस यू आई ख़ासकर दिल्ली में आक्रामक रही है। महाराष्ट् ख़ासकर मुंबई में शिवसेना का छात्र संगठन युवा सेना तो हमेशा ही ऐसा करता रहा है। आजकल दिल्ली में सीवाईएसएस (आम आदमी पार्टी) भी विश्व विद्यालय में भले ही कोई सीट जीती हो, लेकिन दिल्ली सरकार का फ़ायदा तो उठाती है। पूरे देश में राजनीति को लेकर जिस तरह की शुरुआत की उम्मीद की जाती है, वो तो इन संगठनों से निकलकर नहीं पाते हैं। जो वैचारिक नेता निकालने चाहिए वो तो बेचारे नौकरी करने और अपने अपने परिवार पालने निकल जाते हैं, केवल राजनेता वही बन पाते हैं जो धन बल और बाहुबल अपने साथ रखते हैं।
मैं कानपुर की छात्र राजनीति के बहुत नेताओं से परिचित हूँ जिन्होने काफ़ी संघर्ष किए थे, लेकिन कभी उनको सार्वजनिक क्षेत्र में राजनीति करते हुए नहीं देखा। कुछ नेता बने भी तो वो जिनके बाप बड़े पैसे वाले या कोई नेता थे। अभी हाल ही में एक छात्र नेता जिला पंचायत सदस्य बनकर आया है, जो कानपुर यूनिवर्सिटी में प्रेसीडेंट बना था, उसके बाद वो 2-3 साल तक बड़े अपराधी केस में जेल में रहा। अब चुनाव जीता एक ख़ास जाति की बहुलता के कारण।
ऐसा भी नहीं है कि इन संगठनों ने छात्र समस्याओं के लिए कुछ ख़ास कार्य किया हो। लेकिन ऐसा भी इतिहास दर्ज नहीं करा पाए हैं जिसको आने वाली पीढ़ी एक बड़े छात्र आंदोलन के रूप में देखे। सभी राजनीतिक पार्टियों ने छात्रों का अपने अपने हिसाब से प्रयोग किया है। ख़ासकर मंडल के समय समाजवादियों ओबीसी छात्रों का और और 1992 के बाद दक्षिणपंथियों ने अपने अपने आंदोलनों में। वर्तमान परिस्थिति में देखा जाए तो सबसे मजबूत स्थिति में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ही है। जिसकी टक्कर में अलग अलग राज्यों में सत्ताधारी दलों के छात्र संगठन तो हो सकते हैं लेकिन कोई एक नहीं जो हर जगह लड़ सके। वैचारिक रूप से इनको सीधी टक्कर कम्युनिस्ट छात्र संगठन ही दे पाते हैं। बाकी सबके पास तो कोई वैचारिक नीति या शब्द तक नहीं मिलते हैं। किसी समाजवादी संगठन के नेता को को अपना इतिहास नहीं पता होगा, विचारधारा की तो बात छोड़िए। ऐसे में एबीवीपी कई तरीके से अपने कार्यकर्ताओं का प्रयोग करती है। असल में इनका प्रयोग आर एस एस करता है, जो पहले छात्रों के रूप में फिर अन्य संगठनों बजरंग दल, हिंदू सभा आदि में प्रयोग करता है। यहाँ एक बात और गौर करने वाली है कि संघ भी एबीवीपी के छात्रों को कभी भाजपा में नहीं भेजता है। इसके बजाय अपना स्वयम् सेवक बनाने में अधिक विश्वास करता है। संघ के 1 या 2 विश्वासपात्र नेता (राम माधव जैसे लोग) तो नियंत्रण में भाजपा में आते हैं, लेकिन जिस नेतृत्व फौज की उम्मीद की जाती है, वो नहीं पाती है। फिलहाल तो भाजपा में अमित शाह और मोदी युग चल रहा है, जहाँ विचारधारा के साथ साथ धन और वोट बल भी देखा जाता है। कांग्रेस के संगठन एन एस यू आई में राहुल गाँधी ने 2012 के आसपास युवा कांग्रेस के नाम पर कुछ शुरुआत तो की लेकिन फिर ध्यान नहीं दे पाए। दलित या कम्युनिस्ट संगठन जो एबीवीपी को टक्कर दे सकते हैं, वो बिल्कुल भी ऐसी स्थिति में नहीं हैं जो एबीवीपी की सत्ता, उसका धनबल, कार्यकर्ताओं का हुजूम, व्यवस्था, वैचारिक समर्थक(आज का माहौल बहुत अनुकूल है, उनकी विचारधारा को फैलाने के लिए), नीतियों और टेक्नॉलॉजी ज़रूरतों के आगे खड़ा भी हो सके। केवल विचारधारा से ही उनसे लड़ना मुस्किल है, वो हैदराबाद के रोहित और डीयू, बीएचयू या जेएनयू में लेफ्ट संगठन करने की कोशिश करते हैं। एबीवीपी से लड़ने के लिए आपको उसको मुद्दों पर भी घेरना पड़ेगा, जिसमें एन एस यू आई कांग्रेस के पिछले कार्यकाल की वजह से कमजोर पड़ जाता है। आम आदमी पार्टी का सीवाईएसएस तो उससे हर मोर्चे पर लड़ सकता है, लेकिन दिल्ली के बाहर अभी उसके पास संगठन नहीं है। इसमें एक बात यह मुझे निजी तौर पर लगती है, कि एबीवीपी और आप के युवाओं में कुछ वैचारिक अंतर तो नहीं है। आप के युवा स्टूडेंट्स भी दक्षिण पंथियों के जैसे ही सोंच के हो जाते हैं भड़काए जाने पर। उनमें वैसी वैचारिक स्थिरता नहीं नज़र आती है, उदाहरण के तौर पर सेकूलरिज़्म पर ही। जो भी हो लेकिन भविष्य मे एक अच्छी छात्र राजनीति की उम्मीद तो की ही जा सकती है। अगर ऐसी शुरुआत नहीं हुई तो यह बहुत ही ग़लत होगा देश और समाज की राजनीति के लिए। मैं हर यूनिवर्सिटी में ऐसी राजनीति की उम्मीद करता हूँ जिसमे विरोध तो हो लेकिन आक्रामकता कम और बहस अधिक हो। अगर "मुज़फ़्फ़रनगर बाकी है दिखाया जाता है" तो उसको दिखाने दिया जाए और जिसको ऐतराज है वो बहस करे, लेख लिखे, जवाब में फिल्म बनाए, लोगों के बीच में जाए लेकिन ऐसे फालतू टाइप के फर्जी आंदोलन ना करे जिसमें दूसरे की अभिव्यक्ति की आज़ादी का हनन हो। किसी के विचार व्यक्त करने पर उसको राष्ट्रविरोधी या राष्ट्रवादी होने का सर्टिफिकेट ना बाँटा जाए। बल्कि ऐसे मुद्दों पर ऐसे सेमिनार होने चाहिए जिसमें हर विचारधारा के लोग आकर बहस करें। आपस में चर्चा करें। सुब्रमण्यम स्वामी टाइप लोग जाएँ तो अरुंधती राय को भी उसी सेमिनार में बोलने का मौका मिले। किसी को रोंका मत जाए ना बाबा रामदेव को जेएनयू में और ना किसी और को।


राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...