आज मैंने इंडियन एक्सप्रेस में रामचंद्र गुहा का गांधी जी की हत्या पर लेख पढा तो कुछ नया जानने को मिला। यह सब जानकर और विचलित हो गया। दरअसल बचपन से ही मेरे मन में नाथूराम गोडसे नाम के आदमी के लिए एक अजीब-सी बेचैनी भरे प्रश्न थे। गांधी जी जैसे महान इंसान का इस आदमी ने कत्ल क्यों किया? कानपुर में, संघ के एक कॉलेज (राम जानकी इंटर कॉलेज, बिठूर) में पढते समय मेरे एक हिन्दुत्ववादी मित्र ने नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे की लिखी 'गांधी हत्या और मैं', पुस्तक मुझे पढने के लिए दी थी।
यह पुस्तक जनता के बीच उसके द्वारा दिया गया बचावनामा है, जो उसने आजीवन कैद की सजा होने के बाद लिखी थी। ये किताब पढने के बाद मुझे महसूस हुआ कि नाथूराम गोडसे धर्मांध था। जैसा कल उमा भारती ने जिसको सिरफिरा कहा, ऐसा तो वह हरगिज नहीं था। नाथूराम और उसके साथियों ने जान-बूझकर, षड्यंत्रपूर्वक ठण्डे दिमाग से सोच समझकर गांधीजी की हत्या की थी। इन लोगों ने गांधीजी की हत्या क्यों की, इस प्रश्न के जवाब की तलाश में धीरे-धीरे गांधीजी की राजनीति और हिन्दुत्ववादियों की राजनीति के बीच का फर्क मुझे समझ में आने लगा।
मुसलमानों ने भारत का विभाजन करवाया, फिर भी मुसलमानों, उनके संगठन मुस्लिम लीग तथा नवनिर्मित पाकिस्तान के प्रति गांधी ने नरम रुख अपनाया था, ऐसी दलीलें उन पुस्तकों, पत्रिकाओं में तथा मौखिक रूप से भी हिन्दुत्ववादी देते रहे हैं। कई बार तो इन्होंने अपना अलग इतिहास बनाने की कोशिश की। ये लोग कहते हैं कि हद तो तब हो गई जब गांधीजी ने पाकिस्तान को, उसके हिस्से के, 55 करोड रुपये देने की जिद उपवास की धमकी के साथ की। पाकिस्तान में हिन्दुओं पर अत्याचार तथा कश्मीर पर हमला करने वालों को 55 करोड रुपये देने की बात से उग्र होकर नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या हिंदू हित में की थी।
आम तौर पर गांधीजी की हत्या के सम्बन्ध में, आम लोगों की भी धारणा ऐसी ही है। अनेक इतिहासकार और पत्रकार भी ऐसा ही मानते हैं। मैं इस बात से कभी सहमत नहीं हो पाया और आज तक 4-5 किताबें पढीं और बहुत लोगों से जानकारी लेता रहा। गूगल पर इस बारे में विश्वास नहीं किया।
बहुत पहले मैंने एक किताब 'द लास्ट फेज' पढी थी। लेखक का नाम अभी तो याद नहीं है। पूरी तो नहीं लेकिन किताब के कुछ हिस्से अब तक स्मृति में हैं। इस किताब में गांधी जी की हत्या के केस की निगरानी करने वाली अदालत के जस्टिस खोसला के एक पत्र को कोर्ट किया गया है। प्रोसीक्यूशन की ओर से एडवोकेट के संस्मरण हैं। जो असलियत बताते हैं।
इसके विपरीत हिंदुत्ववादियों से बात करने पर गोडसे बन्धुओं का प्रतिवाद करने वाली कई दूसरी पुस्तकों के हवाले से और कुछ ही कहा जाता है। लेकिन अब तक मुझे यकीन हो चुका था कि गांधीजी की हत्या 55 करोड रुपये के प्रकरण या विभाजन के कारण नहीं की गयी थी। भारत का विभाजन और 55 करोड के एपिसोड के बहुत पहले ही इस ग्रुप ने गांधीजी की हत्या करने का निश्चय कर लिया था और कई बार उनकी हत्या करने के प्रयास भी किये थे।
गांधी-हत्या केस के आरोपियों में से गोपाल गोडसे और मदनलाल पाहवा के इंटरव्यू की कापी मैंने एक पत्रकार महोदय के फेसबुक पेज से लेकर पढी थी। जिसमें बम कांड के बारे में पूछे जाने पर मदनलाल ने कहा था कि उसने गांधीजी की हत्या करने के लिए नहीं, बल्कि चेतावनी देने के लिए बम फेंका था। कई हिंदूवादी संगठनों के अनुसार गोडसे बन्धु की पुस्तकों में भी यही कहा गया है। उस इंटरव्यू में गोपाल गोडसे के पास अधिकांश प्रश्नों के उनर नहीं थे। दूसरे की बात सुनी-अनसुनी करके वे अपनी ही बात कहते रहे। स्वयं को बहुत बडा देशभक्त और नाथूराम को विद्वान और चरित्रवान होने का बखान करते रहे।
हिन्दुत्ववादियों में फरेबियों के सभी लक्षण दिखाई देते हैं। वे फासीवादियों की थ्योरी पर चलते हैं। उनउनका मानना है कि 'असत्य'को अलग अलग स्थानों पर, अलग-अलग तरीकों से और बार बार कहते रहने पर एक दिन वह 'सत्य' मान लिया जाता है। इसीलिए ये लोग तीन 'झूठ' प्रचारित करने की लगातार कोशिशें करते हैं। पहला झूठ है कि गांधीजी मुसलमानों तथा पाकिस्तान के पक्षपाती थे। दूसरा झूठ है कि गांधीजी की हत्या 55 करोड रुपयों के कारण की गयी थी। तीसरा झूठ है कि गांधी की हत्या करने वाले बहादुर और देशभक्त थे। परन्तु सत्य यह है कि ये तीनों बातें बिल्कुल मिथ्या हैं। गांधीजी क्या मुसलमानों के तरफदार और पक्षपाती थे? क्या देश के विभाजन के लिए गांधीजी जिम्मेदार थे? गांधी की हत्या के सम्बन्ध में इन लोगों की थीसिस में कितना झूठ भरा पडा है, यह समझने के लिए सर्वप्रथम उक्त तीनों बातों की तह में जाना और समझना जरूरी है। 9 जनवरी,1915 को गांधीजी जब अफ्रीका से हिन्दुस्तान वापस आये, तब कांग्रेस का नेतृत्व लोकमान्य तिलक कर रहे थे। लोकमान्य तिलक की विचारधारा ब्राह्मणवाद की ओर थी। गोपालकृष्ण गोखले की अस्वस्थता के कारण प्रगतिशील, सुधारवादी शक्तिया कमजोर पड गयी थी। उस समय लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में कुछ हिन्दुत्ववादी कांग्रेसी आन्दोलन चला रहे थे,तो कुछ सावरकर जैसे हिन्दुत्ववादी क्रान्तिकारी लोग भूमिगत रहकर हिंसक आन्दोलन की तैयारी कर रहे थे। लोकमान्य तिलक ने घोषणा की कि "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है" इसमें स्वराज शब्द आता है। उस समय इसका अर्थ पूर्ण स्वराज्य नहीं था। लोकमान्य के मन में स्वराज्य का आशय था ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत ही दमन रहित शासन चले। शायद होमरूल। यही उनकी मांग थी। ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण के कारण तिलक कांग्रेस के प्रभाव का विस्तार नहीं कर सके थे। उधर अंबेडकर के नेतृत्व में महाराष्ट तथा अन्य प्रान्तों में ब्राह्मणविरोधी आन्दोलन जोर पकडने लगा था। जिसने कांग्रेस के हिन्दुत्ववादी रुझान के नेतृत्व को प्रभावहीन बना दिया था। अक्सर कई क्रान्तिकारी छोटी घटनाएं करने के बाद पकड लिये जाते थे। अलीपुर बम केस में अरविन्द घोष जैसे नेता भी कोई योजना बनाने से पहले ही पकड लिये गये थे।
उस समय के अधिकांश नेता भारत की सामाजिक वास्तविकताओं से अनजान थे। भारत में आते ही कांग्रेस के ब्राह्मणवादी झुकाव तथा भूमिगत आन्दोलन की दूरियां गांधीजी की समझ में आ गयी। अब गांधीजी ने कांग्रेस को व्यापक जन संगठन में परिवर्तित करने का काम आरम्भ कर दिया। पहली बार दलित आदिवासी पिछडे वर्ग के लोग महिलाए कांग्रेस से जुडे। चम्पारण में संघर्ष के बाद, खिलाफत आन्दोलन को समर्थन देकर मुसलमानों को साथ लेने का प्रयास गांधीजी ने किया। ऐसे में कट्टरपंथियों को कांग्रेस नापसंद आने लगी। लेकिन गांधीजी के उदार राष्टंवाद के सामने संकुचित हिन्दू राष्टवाद टिक सके ऐसा भी सम्भव नहीं था। तो कुछ लोग हिन्दू महासभा से जुड गये थे तो कुछ ने 1925 में राष्टींय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की। फिर इन तथाकथित राष्टवादियों ने आजादी के एक भी आन्दोलन में कभी भाग नहीं लिया। उनको गांधीजी का नेतृत्व मान्य नहीं था। लेकिन गांधीजी तथा कांग्रेस से अलग,स्वतंत्र रूप से कोई एक भी आजादी का आन्दोलन इन लोगों ने नहीं चलाया। किसी हिन्दुत्ववादी का आजादी के आंदोलन में शामिल होने के बारे में पूछे जाने पर ये लोग सावरकर का नाम लेते हैं। सावरकर ने एक पत्रिका निकालने के अलावा कुछ नहीं किया। केवल दूर से ही आदेश देते थे तभी उनके पाठक भी नाराज हो गए थे। एक बार हिम्मत का काम किया था, वो भी जब ब्रिटिश सरकार के जहाज से कूदकर अपनी जान बचाने की कोशिश की थी। फिर जेल से रिहा होने के लिए लिखित माफी मांगी थी। उस माफीनामे में लिखा था कि 10 साल तक रत्नागिरी के बाहर नहीं जाएगे।
रही बात विभाजन की तो 1937 में हिन्दू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन में खुद सावरकर ने द्विराष्टंवाद के सिद्धान्त का समर्थन किया था। इन लोगों ने 1942 की आजादी के आन्दोलन में तो भाग नहीं ही लिया था, उल्टे ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर यह जानकारी भी दी थी कि हम आन्दोलन का समर्थन नहीं करते हैं। गुरु गोलवलकर ने तो हिटलर की तारीफ में किताब तक लिख दी थी। जिसका संपादन संघ ने बाद में बंद कर दिया था। फिर भी अंग्रेजों ने उनको गिरफ्तार नहीं किया। भारत विभाजन के लिए जितने जिम्मेदार मुस्लिम लीग तथा अंग्रेज हैं, उतने ही हिन्दुत्ववादी भी जिम्मेदार हैं। आजाद भारत में हिन्दू ही हुकूमत करेंगे ऐसा शोर मचाकर हिन्दुत्ववादियों ने विभाजनवादी मुसलमानों के लिए एक ठोस आधार दे दिया था। गांधीजी ने तो अन्त तक भारत विभाजन का विरोध किया था। गांधीजी ने अन्तिम समय तक इसके लिए जिन्ना के साथ मीटिंग कीं। गांधीजी सर्व समावेशक उदार राष्टवादी थे। इसीलिए उन्होंने सब धर्मों को अपनाया था केवल मुसलमानों को ही नहीं।
गांधीजी को भारत विभाजन रोकना चाहिए था। लेकिन इसके लिए इन लोगों ने क्या किया? गांधीजी को विभाजन रोकने के लिए उपवास करना चाहिए था। ऐसी अपेक्षा करने का इनको क्या नैतिक-अधिकार है? जिसको आप देश के लिए कलंक समझते हैं, जिसका वध करना जरूरी मानते हैं, उसी से आप ऐसी अपेक्षाए भी रखते हैं? आपने क्यों नहीं विभाजन को रोकने के लिए कुछ किया? सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर ने विभाजन के विरुद्ध क्यों नहीं आमरण उपवास किया? क्यों नहीं इसके लिए उन्होंने हिन्दुओं का व्यापक आन्दोलन चलाया? जब गांधीजी अकेले पड जाने के कारण देश का विभाजन रोक नहीं पाये, तब आप उनको राक्षस मानकर उनका वध करने की साजिश रचते हो? इसको मर्दानगी कहेंगे या नपुंसकता?
गांधी जैसे लोग पैदा नही होते , अवतरित होते हैं। ऐ हमारा सौभाग्य है कि उन्होंने हमें अपनी बात कहना और अहिंसक लड़ाकू बनना सिखाया। आज कल देश में भ्रम फैलाने की राजनीति बहुत हो रही है। ऐसी ही खराब राजनीति है बापू के नाम पर। देश के बहुत से यूवा इस राजनीति का शिकार हो रहे है।
मैं इसके कई प्रत्यक्ष उदाहरणों से रोज मिलता हूँ। आज गांधी जी को एक व्यक्ति समझना भूल होगी, अब वह एक चरित्र हैं। मेरा प्रयास है कि मैं भी इस चरित्र का एक अंश मात्र अपने जीवन में ढाल सकूँ तो अपने को सफल समझूँगा। राष्ट्रपिता किसी गली मुहल्ले या किसी शहर का अनचाहा नाम नहीं है। एक जीवित इतिहास है। गांधी एक विचारधारा है जो कभी मर नहीं सकती। यह विचारधारा बहुमूल्य धरोहर है। हवा और पानी की तरह। वर्तमान और अगली पीढ़ी की दुनिया के लिए भी......
"है उबलता लहू जिनका मंदिरों के नाम पर,
जंग-ए-आजादी में उनका खून तो पानी रहा।"

