अभी हाल ही में मेरे पास भी मुंबई यूनिवर्सिटी में एनएसयूआई की तरफ से एक छात्रनेता मित्र की तरफ से वैचारिक नेता के तौर पर शामिल होने का निमंत्रण मिला था, लेकिन स्थितियों के हिसाब से और कांग्रेस की वजह से मुझे वहाँ जाना ठीक नहीं लग रहा था। छात्र संगठनों की राजनीतिक उठापठक बताती है, क़ि देश के सभी राजनैतिक दल किस तरह की राजनीति करना चाहते हैं। यूपी में समाजवादी छात्रसभा, बंगाल में टीएमसी की स्टूडेंट विंग, कर्नाटक और केरल सही पूर्वोत्तर में एनएसयूआई और पूरे देश में एबीवीपी अलग अलग मुद्दों पर बहुत उग्र होकर छात्र राजनीति कर रहे हैं। अपवाद स्वरूप आजतक मैने कभी भी एएसए(अंबेडकर स्तडेंट एसोसिएसन) को ऐसा कभी यूपी की मायावती सरकार में करते नहीं देखा। लेफ्ट का छात्र संगठन भी बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार के समय ऐसा ही करता रहा है। यूपीए सरकार में हमेशा ही एन एस यू आई ख़ासकर दिल्ली में आक्रामक रही है। महाराष्ट् ख़ासकर मुंबई में शिवसेना का छात्र संगठन युवा सेना तो हमेशा ही ऐसा करता रहा है। आजकल दिल्ली में सीवाईएसएस (आम आदमी पार्टी) भी विश्व विद्यालय में भले ही कोई सीट न जीती हो, लेकिन दिल्ली सरकार का फ़ायदा तो उठाती है। पूरे देश में राजनीति को लेकर जिस तरह की शुरुआत की उम्मीद की जाती है, वो तो इन संगठनों से निकलकर नहीं आ पाते हैं। जो वैचारिक नेता निकालने चाहिए वो तो बेचारे नौकरी करने और अपने अपने परिवार पालने निकल जाते हैं, केवल राजनेता वही बन पाते हैं जो धन बल और बाहुबल अपने साथ रखते हैं।
मैं कानपुर की छात्र राजनीति के बहुत नेताओं से परिचित हूँ जिन्होने काफ़ी संघर्ष किए थे, लेकिन कभी उनको सार्वजनिक क्षेत्र में राजनीति करते हुए नहीं देखा। कुछ नेता बने भी तो वो जिनके बाप बड़े पैसे वाले या कोई नेता थे। अभी हाल ही में एक छात्र नेता जिला पंचायत सदस्य बनकर आया है, जो कानपुर यूनिवर्सिटी में प्रेसीडेंट बना था, उसके बाद वो 2-3 साल तक बड़े अपराधी केस में जेल में रहा। अब चुनाव जीता एक ख़ास जाति की बहुलता के कारण।
ऐसा भी नहीं है कि इन संगठनों ने छात्र समस्याओं के लिए कुछ ख़ास कार्य किया हो। लेकिन ऐसा भी इतिहास दर्ज नहीं करा पाए हैं जिसको आने वाली पीढ़ी एक बड़े छात्र आंदोलन के रूप में देखे। सभी राजनीतिक पार्टियों ने छात्रों का अपने अपने हिसाब से प्रयोग किया है। ख़ासकर मंडल के समय समाजवादियों
ओबीसी छात्रों का और और 1992 के बाद दक्षिणपंथियों ने अपने अपने आंदोलनों में। वर्तमान परिस्थिति में देखा जाए तो सबसे मजबूत स्थिति में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ही है। जिसकी टक्कर में अलग अलग राज्यों में सत्ताधारी दलों के छात्र संगठन तो हो सकते हैं लेकिन कोई एक नहीं जो हर जगह लड़ सके। वैचारिक रूप से इनको सीधी टक्कर कम्युनिस्ट छात्र संगठन ही दे पाते हैं। बाकी सबके पास तो कोई वैचारिक नीति या शब्द तक नहीं मिलते हैं। किसी समाजवादी संगठन के नेता को को अपना इतिहास नहीं पता होगा, विचारधारा की तो बात छोड़िए। ऐसे में एबीवीपी कई तरीके से अपने कार्यकर्ताओं
का प्रयोग करती है। असल में इनका प्रयोग आर एस एस करता है, जो पहले छात्रों के रूप में फिर अन्य संगठनों बजरंग दल, हिंदू सभा आदि में प्रयोग करता है। यहाँ एक बात और गौर करने वाली है कि संघ भी एबीवीपी के छात्रों को कभी भाजपा में नहीं भेजता है। इसके बजाय अपना स्वयम् सेवक बनाने में अधिक विश्वास करता है। संघ के 1 या 2 विश्वासपात्र नेता (राम माधव जैसे लोग) तो नियंत्रण में भाजपा में आते हैं, लेकिन जिस नेतृत्व फौज की उम्मीद की जाती है, वो आ नहीं पाती है। फिलहाल तो भाजपा में अमित शाह और मोदी युग चल रहा है, जहाँ विचारधारा के साथ साथ धन और वोट बल भी देखा जाता है। कांग्रेस के संगठन एन एस यू आई में राहुल गाँधी ने 2012 के आसपास युवा कांग्रेस के नाम पर कुछ शुरुआत तो की लेकिन फिर ध्यान नहीं दे पाए। दलित या कम्युनिस्ट संगठन जो एबीवीपी को टक्कर दे सकते हैं, वो बिल्कुल भी ऐसी स्थिति में नहीं हैं जो एबीवीपी की सत्ता, उसका धनबल, कार्यकर्ताओं का हुजूम, व्यवस्था, वैचारिक समर्थक(आज का माहौल बहुत अनुकूल है, उनकी विचारधारा को फैलाने के लिए), नीतियों और टेक्नॉलॉजी ज़रूरतों के आगे खड़ा भी हो सके। केवल विचारधारा से ही उनसे लड़ना मुस्किल है, वो हैदराबाद के रोहित और डीयू, बीएचयू या जेएनयू में लेफ्ट संगठन करने की कोशिश करते हैं। एबीवीपी से लड़ने के लिए आपको उसको मुद्दों पर भी घेरना पड़ेगा, जिसमें एन एस यू आई कांग्रेस के पिछले कार्यकाल की वजह से कमजोर पड़ जाता है। आम आदमी पार्टी का सीवाईएसएस तो उससे हर मोर्चे पर लड़ सकता है, लेकिन दिल्ली के बाहर अभी उसके पास संगठन नहीं है। इसमें एक बात यह मुझे निजी तौर पर लगती है, कि एबीवीपी और आप के युवाओं में कुछ वैचारिक अंतर तो नहीं है। आप के युवा स्टूडेंट्स भी दक्षिण पंथियों के जैसे ही सोंच के हो जाते हैं भड़काए जाने पर। उनमें वैसी वैचारिक स्थिरता नहीं नज़र आती है, उदाहरण के तौर पर सेकूलरिज़्म पर ही। जो भी हो लेकिन भविष्य मे एक अच्छी छात्र राजनीति की उम्मीद तो की ही जा सकती है। अगर ऐसी शुरुआत नहीं हुई तो यह बहुत ही ग़लत होगा देश और समाज की राजनीति के लिए। मैं हर यूनिवर्सिटी में ऐसी राजनीति की उम्मीद करता हूँ जिसमे विरोध तो हो लेकिन आक्रामकता कम और बहस अधिक हो। अगर "मुज़फ़्फ़रनगर
बाकी है दिखाया जाता है" तो उसको दिखाने दिया जाए और जिसको ऐतराज है वो बहस करे, लेख लिखे, जवाब में फिल्म बनाए, लोगों के बीच में जाए लेकिन ऐसे फालतू टाइप के फर्जी आंदोलन ना करे जिसमें दूसरे की अभिव्यक्ति की आज़ादी का हनन हो। किसी के विचार व्यक्त करने पर उसको राष्ट्रविरोधी
या राष्ट्रवादी होने का सर्टिफिकेट ना बाँटा जाए। बल्कि ऐसे मुद्दों पर ऐसे सेमिनार होने चाहिए जिसमें हर विचारधारा के लोग आकर बहस करें। आपस में चर्चा करें। सुब्रमण्यम स्वामी टाइप लोग जाएँ तो अरुंधती राय को भी उसी सेमिनार में बोलने का मौका मिले। किसी को रोंका मत जाए ना बाबा रामदेव को जेएनयू में और ना किसी और को।
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