Friday, January 22, 2016

पाकिस्तान के इतिहास पर कुछ जानकारी

मंगलवार की रात को ऐसे ही एबीपी न्यूज पर मुकेश कुमार सिंह का ब्लॉग पढ़ने लगा तो काफ़ी अच्छा लगा पाकिस्तान के इतिहास के बारे में जानकर। इसके बाद और अधिक जानकारी के लिए व्याकुल सा हो गया और गूगल करने लगा लेकिन वहाँ से मिली जानकारी से बिल्कुल भी संतुष्टि नहीं मिल पाई। इसके बाद मैने लाइब्रेरी से एक किताब "ग्रेट पारटिशन: मेकिंग ऑफ इंडिया आंड पाकिस्तान" लेकर आया और दो दिन तक पढ़ी। असल में पढ़ने का उद्देश्य यह था कि राजनीतिक स्तर पर अगर पाकिस्तान को देखना है, तो उसके इतिहास को भी देखना ही पड़ेगा। इतिहास को देखे बिना आप वर्तमान भी नहीं देख पाएँगे।  संयोग की बात ही है कि जिस पेशावर के पास यूनिवर्सिटी में आतंकवादियों ने हमला किया वह पाकिस्तान के गाँधी बाचा ख़ान के नाम पर ही है। उन्हें (ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को) सीमांत गाँधी और ना जाने कितने नामों से जान जाता है। सुना है कि विभाजन के बाद उन्होने एक बार महात्मा गाँधी से कहा था कि "   ‘आपने हमें भेड़ियों के बीच छोड़ दिया है…।"
बाचा ख़ान की इस बात ने महात्मा गांधी को निरुत्तर कर दिया। उन्होंने अपने शिष्य को नसीहत दी कि ‘भूल जाओ उन बातों को, अब पाकिस्तान को ही अपना देश समझो। उसी की सेवा करो।’ आज़ादी के वक़्त भारत में जो 535 रजवाड़े थे, उनमें से चार बलूचिस्तान के इलाके में थे। इनमें से तीन – मकरान, लास बेला और ख़रान ने तो मोहम्मद अली जिन्ना के दबाव में पाकिस्तान में अपना विलय कर लिया। लेकिन चौथे यानी कलात रियासत के नवाब अहमद यार ख़ान ने ख़ुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। इतिहास गवाह है कि पाकिस्तानी सेना ने 27 मार्च 1948 को कलात को ज़बरन पाकिस्तान में मिला लिया। इसके बाद भी कई साल तक कलात के लोगों ने अपना संघर्ष जारी रखा। 1955 में चारों रियासतों को मिलाकर पाकिस्तान का चौथा प्रान्त ख़ैबर पख्तूनख़्वा बना। पाकिस्तान सेना ने कश्मीर को भी हड़पने की कोशिश की। तब उसे प्रथम भारत-पाक युद्ध के रूप में भारतीय सेना से लोहा लेना पड़ा। भारत ने न सिर्फ़ तब बल्कि उसके बाद भी हमेशा पाकिस्तानी सेना को मात दी थी। यहां तक कि 1971 में पाकिस्तानी सेना के ज़ुल्म से बांग्लादेश को भी मुक़्ति दिलवायी। लेकिन ख़ैबर पख्तूनख़्वा का सवाल हमेशा अनसुलझा ही रहा। उस दौर से लेकर आज तक ख़ैबर पख्तूनख़्वा, पाकिस्तान का सबसे ग़रीब, शोषित और उपेक्षित इलाक़ा बना हुआ है। आज तक वहां के पख़्तूनियों या पठानों ने अपने विरोध का परचम लहरा रखा है। दरअसल, पठानों ने कभी उस द्विराष्ट्रवाद (Two nation theory) का समर्थन नहीं किया जिसकी बुनियाद पर पाकिस्तान का जन्म हुआ था।
मुकेश कुमार सिंह के ब्लॉगानुसार कई विद्वानों का मानना है कि मुम्बई में जन्मे शिया मुसलमान और पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना बुनियादी तौर पर धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी थे। लेकिन पाकिस्तान बनते ही कट्टरवादियों ने जिन्ना को बहुत जल्द हाशिये पर ढकेल दिया। बंटवारे के बमुश्किल साल भर बाद ही जिन्ना ने धार्मिक अल्पसंख्यकों को बराबरी का दर्ज़ा देने के लिए पाकिस्तान रेडियो पर अपना ज़बरदस्त भाषण रिकॉर्ड करवाया था। लेकिन कट्टरवादी अफ़सरों और नेताओं ने जिन्ना के जीते-जी कभी उस भाषण को प्रसारित नहीं होने दिया। जिन्ना की वो रिकॉर्डिंग भी ऐसे ग़ायब करवायी गयी कि आज तक उसका सुराग नहीं है। अलबत्ता, जिन्ना के उस भाषण की स्क्रिप्ट ज़रूर बरामद हुई है। 
हालाँकि मुझे इस बात पर बहुत कम विश्वास होता है। अगर ऐसा ही होता तो क्यों उन्होने पाकिस्तान की माँग ही क्यों की थी? 
जिन्ना की ख़्वाहिश के विपरीत वहां के पहले प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान ने बंटवारे के बाद पाकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की जगह मुसलिम देश बनाने का प्रस्ताव पारित करवा लिया। आगे चलकर वही पाकिस्तान के संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा बना। उस संविधान की सबसे बड़ी ख़राबी यही थी कि पाकिस्तान में जो मुसलमान नहीं हैं, उन्हें मुसलमानों जैसे हक़ हासिल नहीं होंगे। यही वजह है कि 1947 में जहां पाकिस्तान में 23 फ़ीसदी आबादी ग़ैर-मुसलिमों की थी, वो अब घटकर महज़ 3-4 फ़ीसदी रह गयी है। इसमें भी ग़रीब अहमदियों की संख्या तो अब मुट्ठी भर ही बची है। उन्हें लेकर ऐसा भेदभाव है कि पाकिस्तान में पासपोर्ट बनवाने वाले हरेक व्यक्ति को एक ऐसे फ़ार्म पर दस्तख़त करना होता है जो कहता है कि आवेदक की राय में अहमदी, ग़ैर-मुसलिम हैं। साफ़ है कि पाकिस्तान का संविधान ही अपने ही नागरिकों के प्रति भेदभाव करता है।
दूसरे दौर में 1958 से 1971 के दौरान पाकिस्तान की विशुद्ध ‘मुसलिम पहचान’ बनाने के नाम पर सरकार ने स्कूली क़िताबों से हर उन बातों को हटवा दिया जो बहुलतावाद (Pluralism) के प्रतीक थे। इससे देखते ही देखते हड़प्पा और मोहन जोदाड़ो की संस्कृति के अलावा सूफीवाद भी हाशिये पर पहुंच गया। तीसरा दौर 1974 में उस वक़्त आया जब इस्लामीकरण को क़ानून ज़ामा पहनाने का काम शुरू हुआ। ज़ुल्फ़िकार अली ख़ान भुट्टो की हुक़ूमत ने क़ानून बनाकर अहमदियों को ग़ैर-मुसलिम क़रार दे दिया। इसके लिए भुट्टो पर उलेमाओं और फ़ौज का भारी दबाव था। उन्होंने सोचा था कि ये अस्थायी उपाय होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मज़े की बात ये भी रही कि ख़ुद भुट्टो को भी इससे कोई फ़ायदा नहीं हुआ।
इस्लामीकरण के चौथे दौर की शुरुआत 1988 में ज़िया उल हक़ की बदौलत हुई। 1990 तक संगठित आतंकवाद ने अपनी शक्ल अख़्तियार कर ली। इसके तहत मसजिद और सेना के गठबन्धन से बने तमाम ज़िहादी (धर्म के सैनिक) संगठनों ने पूरे पाकिस्तान को अपनी मुट्ठी में कर लिया। हरेक फ़ैसला इनके हाथों में ही था। ज़िहादी नीतियों की वजह से मुसलिम बहुल कश्मीर से हिन्दुओं और सिखों को पलायन करना पड़ा। पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों की तरह धीरे-धीरे सबने ख़ुद को नयी जगहों पर बसा लिया। अब शायद ही कभी उनकी वापसी हो पाये। 
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का हाल सबसे बुरा है। हिन्दू-सिख-ईसाई जो भी देश छोड़कर जा सकते थे, चले गये। सिर्फ़ बेहद ग़रीब बचे हैं। जिन्हें कोई नहीं पूछता। अल्पसंख्यक शियाओं का भी आये दिन क़त्लेआम होता रहता है। वहाँ की जो सरकार भी किसी तरह से सरिया क़ानून, वहाँ की सेना या आई एस आई या कट्टरपंथियों के खिलाफ काम करने की कोशिश करती हैं, उन्हें उसका ख़ामियाजा उठाना पड़ता है। कुछ ही प्रधानमंत्री होंगे जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया होगा। नवाज शरीफ भी आज विश्व के सामने शांति बहाली पर खूब काम करना चाहते हैं। लेकिन उनके अपने हाथों में भी सबकुछ नहीं होता है। लेकिन अगर पाकिस्तान की सिविल सोसायटी भी ऐसे ही खून में संघर्ष करती रहेगी, उनके बच्चे भी स्कूल में मारे जाएँगे। 

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