Monday, January 25, 2016

गणतत्र दिवस विशेष

आज हमारा देश 67वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है. 
आप सबको गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। आज का दिन हमारे लिए बहुत महत्तवपूर्ण है। आज ही के दिन 26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ था। आज का यह दिन भारत के लिए सबसे गौरवमयी दिन है। इस गौरवमयी दिन के अवसर पर मैं संविधान और अनुशासन के विषय में अपने विचार प्रस्तुत करना चाहता हूँ। 
संविधान का अर्थ है किसी राष्ट्र की शासन-व्यवस्था के लिए बनाए गए आधारभूत नियम और कानून। हर देश का एक संविधान होता है। कानून-व्यवस्था होत है। उसका पालन कराने के लिए प्रशासन और पुलिस होती है। कानून-व्यवस्था का उल्लंघन करने वालों को सजा दी जाती है। यह कानून-व्यवस्था देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान होती है। सभ्य समाज का नागरिक होने और कानून का डर होने के कारण हम सरकारी नियम-कानूनों का पालन करते हैं। कानून-व्यवस्था को तोड़ने पर हमें सजा का भय होता है।
अब यदि हम संविधान के व्यापक अर्थ को लें तो प्रशासन, स्कूल, समाज, परिवार सभी जगह हमारे द्वारा बनाए गए नियम, सिद्धान्त और आदर्श हमारा संविधान है। कोई भी संविधान तब सार्थक माना जाता है जब वह समाज को अनुशासित करे। अनुशासन से अभिप्राय नियम, सिद्धान्त तथा आदेशों का पालन करना है। जीवन को आदर्श तरीके से जीने के लिए अनुशासन में रहना आवश्यक है। अनुशासन के बिना व्यक्ति पशु के समान है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, ‘अनुशासन राष्ट्र का जीवन-रक्त है।’
वर्तमान की बात करें तो 2
-3 दिन के लिए लोग फेसबुक और व्हाट्सएप पर तिरंगे का डीपी लगाकर देशभक्ति जाहिर कर रहे हैं. अच्छा भी है, जेनरेशन के हिसाब से लोग जिस तरह से सेलिब्रेट करना चाहें करें, यह उनकी आज़ादी में सामिल होना चाहिए. यह आज़ादी, लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही जिंदा है. लेकिन जैसा इस देश में कुछ दिनों से चल रहा है, उससे ऐसा तो नहीं लगता है कि देश का कोई भी नेता लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए बहुत चिंतित दिखता है. चाहे मोदी, राहुल हों या फिर अखिलेश और केजरीवाल. सब अपनी अपनी राजनीति को चमकाने के चक्कर में लोकतंत्र पर हमला करते हैं. चूँकि सरकार भाजपा की है, इसलिए सारी ज़िम्मेदारी भी सत्ताधारी पार्टी पर ही आ जाती है. अगर देश को बचाना है, लोकतंत्र को बचाना है तो लोगों की आज़ादी जिंदा रखनी पड़ेगी. उनको बोलने की आज़ादी हो, उनको विरोध करने की आज़ादी हो, उनको खाने की (शाकाहार या माँसाहार), पीने की, क्या पहनना है इसकी भी आज़ादी हो(ख़ासकर औरतों को), युवाओं को सोसल मीडिया पर बोलने की आज़ादी हो, ज़रा सी बात पर टिड्डी दल ना छोड़ दिया जाए थोड़ी सी आलोचना करने पर. सबको प्यार करने की आज़ादी हो, देखना अभी कितने बजरंगी तैयारी में लगे होंगे वैलेंटाइन के विरोध के लिए. विरोध कोई वैचारिक या तार्किक न होकर गुंडागिरी टाइप होता है. वैसे इन समाज विरोधियों का भी हम जैसे लोग विरोध तो करते ही रहेंगे, चाहे जितना भी संघर्ष क्यों ना करना पड़े.  

"बुजदिल इंसा को जिंदा नहीं कहते, 
पत्थर बनाता है खामोश रहना भी"।।
ज़्यादा राजनीतिक बातें ना करके केवल इतना ही कहना चाहता हूँ क़ि सब अपने अपने स्तर पर ईमानदारी से काम करिए, ज़रूरी नहीं है कि सभी सेना में ही भर्ती होकर बॉर्डर पर लड़ेंगे जाकर. एक पूर्ण देश तब बनता है जब उसका हर नागरिक अपनी अपनी ज़िम्मेदारी निभाता है. सीए अपना काम करे, नेता अपना काम "ईमानदारी से करे, वकील अपना काम करे, पुलिस भी अपना काम करे तो पूरा देश मजबूत बनेगा. हम आज ही देखकर चलेंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ी का भविष्य ख़तरे में होगा. जहाँ पर भी हमें कमी दिखती है, कुछ भी ग़लत होता है कोशिश करें कि हमारी आवाज़ दबी ना रहे. चाहें वो ग़लत करने वाला हमारा अपना ही क्यों ना हो? सबसे ज़्यादा ज़रूरी तो महिलाओं का बोलना है. उनको भी अपने अपने क्षेत्रों में रहकर लड़ना पड़ेगा. कितने भी बड़े पद पर क्यों ना हों उनको वहाँ कभी ना कभी तो महिला होने के कारण पीछे रहना ही पड़ता है. किसी ना किसी को तो आवाज़ उठानी ही पड़ती है. परिवार भी है तो क्या हुआ अपनी सास के खिलाफ भी आवाज़ उठाइए अगर वो ग़लत करती है तो अगर आज आपने सुन लिया तो कल आपकी बेटी को भी बर्दास्त करना पड़ेगा. आप ही उसको यह शिक्षा देंगी. जबकि बदलाव की शुरुआत तो आप से ही होनी है. 

आओ सड़क पर लड़कर एक हिन्दुस्तान बनाते हैं,
बहुत आसान है बंद कमरे में वन्दे मातरम कहना.........


No comments:

Post a Comment

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...