लगभग एक महीने पहले मैने महाराष्ट्र के बारे में एक पोस्ट में लिखा था कि यहाँ की परंपराएँ अभी तक महिलाओं को निचले दर्जे का महसूस कराने में पीछे नहीं रहती हैं। आपको याद होगा कि जब अहमद नगर के शनि सिंगडपुर के मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को वर्जित होने के बावजूद एक लड़की ने प्रवेश कर तेल चढ़ा दिया था जिसके बाद काफ़ी हंगामा हुआ था। इस समय भी कुछ एक्टिविस्ट महिलाओं की सेना मंदिर में प्रवेश को लेकर आंदोलन कर रही है। जिसपर महाराष्ट्र की राजनीति काफ़ी बढ़ गई है। वहीं इस मुद्दे के हल के लिए महिला ब्रिगेड की नेता तृप्ति देसाई बुधवार दोपहर राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलीं और अपनी बातें मुख्यमंत्री के सामने रखी। आज तो सीएम फाड़नवीस का भी बयान आया है क़ि महिलाओं को पूरा अधिकार है। किसी क़ानून में जब इस तरह की बात नहीं लिखी है, तो ऐसा कैसे किया जा सकता है? अभी अभी एक मित्र का मेरे ट्वीट पर कमेंट किया कि मैने बहुत अधर्म की बात कर डाली। मुझे अज्ञानी तक बता डाला गया। मेरी बात के पीछे कुछ तर्क हैं लेकिन उन्होने यह तो बताया कि यह पढ़ो, लेकिन यह नहीं बताया कि क्या पढ़ूँ?
कहते हैं कि यहाँ किसी भी घर में दरवाजे नहीं हैं, क्योंकि चोर नहीं हैं, 2010 में यूको बैंक ने यहाँ पर शाखा में दरवाजे नहीं लगवाए थे, तो पुलिस की नींद उड़ गई थी। लेकिन यह परंपरा अब बदल चुकी है। लोग चोरो के कारण दरवाजा लगाने लगे हैं।
समस्या दरअसल यह है कि इस तरह की मानसिकता के लोग (जिनमें स्त्रियां भी शामिल हैं) कभी लड़कियों-औरतों को बेटी की नजर से देख ही नहीं पाते, इसीलिए यह इनकी समझ से परे है कि लड़कियां भी देवताओं की बेटी समान हो सकती हैं। अपनी सोच की गंदगी दूर नहीं कर पाते, और चले आते हैं लड़कियों की पवित्रता का हिसाब-किताब करने। अच्छा चलो, एक बार को मान भी लिया कि लड़कियां कुछ खास मंदिरों में घुसने लायक पवित्र नहीं होतीं, तो भी भगवान की पवित्रता ज्यादा पवित्र है या लड़कियों की ‘अपवित्रता’ ज्यादा अपवित्र है? अरे जिसे पूजते हो, उस पर इतना भरोसा तो रखो कि उसके सान्निध्य में हर ‘अपवित्रता’, पवित्र हो जाएगी। अब बात उन तर्कों की जो इस मंदिर में स्त्रियों की पाबंदी के पक्ष में दिए जाते हैं। इन्हीं में से एक तर्क यह है कि इस मंदिर में नाभि के ऊपर नग्नावस्था में पूजा की जाती है, इसीलिए औरतों के वहां जाने की मनाही है, क्योंकि वे नग्नावस्था में पूजा नहीं कर सकतीं। तो क्यों न ऐसा किया जाए कि स्त्रियों के लिए दर्शन का एक समय तय कर दिया जाए। शनिदेव (और वह भी शनिदेव की उसी मूर्ति) की पूजा के बिना जिनका जीवन रुका हुआ है, वे स्त्रियां उस तय समय के दौरान वहां पूजा-अर्चना कर लें जाकर। अब शनिदेव ने खुद दर्शन देकर तो यह कहा नहीं होगा कि मेरी पूजा नग्नावस्था में ही करनी होगी, और वैसे भी, अगर श्रद्धा सच्ची है तो क्या नग्नावस्था और क्या वस्त्रावस्था। सामान्य तौर पर तो स्त्रियां बाल भी नहीं मुड़वाती हैं, लेकिन तिरुपति बालाजी के मंदिर में दर्शन के लिए तो ऐसा भी करती हैं न! तो नग्न भी हो लेंगी।
अब बात करते हैं इस पूरे अभियान के एक बहुत कम चर्चित पहलू की। एक आम लड़की के मंदिर में घुसने पर हुए विवाद से शुरू हुई इस मुहिम की लीडर अब भूमाता रणरागिनी ब्रिगेड की अध्यक्ष तृप्ति देसाई हैं, जिनके बारे में जानकारी कुछ ऐसी है कि 3 साल पहले उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है। हालांकि, आप किसी भी धर्म के हों, गलत को गलत कहना और बुराइयों के खिलाफ खड़े होना आपका हक होने के साथ-साथ जरूरी भी है, लेकिन अगर तृप्ति देसाई के विषय में यह जानकारी सही है, तो मुझे इस बात का आशंका है कि एक सही मुहिम कहीं राजनीति की भेंट न चढ़ जाए।
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