Sunday, December 31, 2017

क्या जीएसटी से टैक्स चोरी रुकी है?

 फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक जीएसटी आने के बाद कंपोजिट स्कीम में आए व्यापारियों ने टैक्स चोरी अधिक की है. कंपोज़िशन स्कीम क्या है, इसे ठीक से समझना होगा। "छोटी कंपनियों के लिए रिटर्न भरना आसान हो इसलिए यह व्यवस्था बनाई गई है। उनकी प्रक्रिया भी सरल है और तीन महीने में एक बार भरना होता है." आज की तारीख़ में कंपोज़िशन स्कीम के तहत दर्ज छोटी कंपनियों की संख्या करीब 15 लाख है. जबकि सितंबर में इनकी संख्या 10 से 11 लाख थी। इनमें से भी मात्र 6 लाख कंपनियों ने ही जुलाई से सितंबर का जीएसटी रिटर्न भरा है. इन 6 लाख कंपनियों ने मात्र 250 करोड़ का टैक्स दिया है. इन कंपनियों का औसत टर्नओवर 2 लाख है। अगर आप पूरे साल का इनका डेटा देखें तो मात्र 8 लाख है। समस्या यह है कि जिन कंपनियों का या फर्म का सालाना 20 लाख से कम का टर्नओवर हो उन्हें जीएसटी रिटर्न भरने की ज़रूरत भी नहीं है। इसका मतलब है कि छोटी कंपनियां अपना टर्नओवर कम बता रही हैं। भारत की व्यवस्था आप जानते ही हैं कि दस लाख कंपनियों का आडिट करने में ज़माना गुज़र जाएगा। इस रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि बड़े पैमाने पर कर चोरी की छूट दी जा रही है। आखिर जीएसटी के आने से कर चोरी कहां बंद हुई है? क्या 20 लाख से कम के टर्नओवर पर रिटर्न नहीं भरने की छूट इसलिए दी गई ताकि कंपनियां इसका लाभ उठाकर चोरी कर सकें और उधर नेता जनता के बीच ढोल पीटते रहें कि हमने जीएसटी लाकर चोरी रोक दी है। जीएसटी फाइल करने को आसान बनाने के नाम पर राजनेता से लेकर जानकार तक यह सुझाव दे रहे हैं कि कंपोज़िशन स्कीम के तहत कंपोज़िशन स्कीम के तहत डेढ़ करोड़ के टर्नओवर वाली कंपनियों को भी शामिल किया जाए। यह ज़रूर कुछ ऐसा खेल है जिसे हम आम पाठक नहीं समझते हैं मगर ध्यान से देखेंगे तो इस खेल को समझना इतना भी मुश्किल नहीं है। कंपोज़िशन स्कीम के तहत 20 लाख टर्नओवर की सीमा को बढ़ा कर डेढ़ करोड़ करने की कोई ज़रूरत नहीं है बल्कि टैक्स चोरी रोकने के लिए ज़रूरी है कि 20 लाख से भी कम कर दिया जाए। बिजनेस स्टैंडर्ड में श्रीमि चौधरी की रिपोर्ट पर ग़ौर कीजिए। CBDT ( central board of direct taxex) को दिसंबर की तिमाही का अग्रिम कर वसूली का के आंकड़ो को जुटाने में काफी मुश्किलें आ रही हैं। दिसंबर 15 तक करदाताओं को अग्रिम कर देना होता है। चोटी की 100 कंपनियों ने जो अग्रिम कर जमा किया है और जो टैक्स विभाग ने अनुमान लगाया था, उसमें काफी अंतर है। मिलान करने में देरी के कारण अभी तक यह आंकड़ा सामने नहीं आया है। नवंबर की जीएसटी वसूली काफी घटी है। वित्तीय घाटा बढ़ गया है। सरकार ने 50,000 करोड़ का कर्ज़ लिया है। ऐसे में अग्रिम कर (Advance Tax) वसूली का आंकड़ा भी कम आएगा तो विज्ञापनबाज़ी का मज़ा ख़राब हो जाएगा। अधिकारियों ने कहा है कि हर तिमाही में हमारे आंकलन और वास्तविक अग्रिम कर जमा में 5 से 7 फीसदी का अंतर आ ही जाता है मगर इस बार यह अंतर 15 और 20 फीसदी तक दिख रहा है। 

वित्तीय घाटा

देश का राजकोषीय घाटा मौजूदा वित्त वर्ष के खत्म होने के चार महीने पहले ही तय लक्ष्य को पार कर गया है. नवंबर महीने के अंत में यह लक्ष्य का 112 फीसदी हो गया है. महालेखा नियंत्रक द्वारा शुक्रवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार ऐसा अप्रत्यक्ष कर (जीएसटी) संग्रह के कम रहने और खर्च के ज्यादा रहने के चलते हुआ है. ऐसे में वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.2 फीसदी तक सीमित रखने का लक्ष्य पूरा न हो पाने की आशंका है. जानकारों के अनुसार यदि ऐसा हुआ तो आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ सकती है.रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल से नवंबर के बीच देश का राजकोषीय घाटा (सरकार के आय और खर्च का अंतर) 6.12 लाख करोड़ रुपये हो गया है. पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह पूरे साल के तय लक्ष्य का केवल 86 फीसदी था. हालांकि वित्त वर्ष 2016-17 में सरकार का लक्ष्य इसे जीडीपी के 3.5 फीसदी तक रखने का लक्ष्य था. महालेखा नियंत्रक के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2017-18 में सरकार को अब तक कुल 8.04 लाख करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ. यह 15.15 लाख करोड़ रुपये के बजट लक्ष्य का केवल 53 फीसदी है. पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में वार्षिक लक्ष्य का करीब 58 फीसदी राजस्व प्राप्त हुआ था. इससे पहले जारी हुए आंकड़ों के अनुसार नवंबर में जीएसटी संग्रह पिछले पांच महीनों में सबसे कम (80,808 करोड़ रुपये) रहा था. जानकारों के अनुसार ऐसा कई सारी वस्तुओं का कर स्लैब घटाने से हुआ. इसके एक महीने पहले अक्टूबर में 83,000 करोड़ रु का जीएसटी संग्रह हुआ था.

आम आदमी पार्टी में फिर घमासान

इस समय आम आदमी पार्टी में राज्य सभा सीटों को लेकर लड़ाई अंतिम दौर में है. केजरीवाल बनाम कुमार विश्वास की लड़ाई का आखिरी अध्याय लिखा जा रहा है. इसमें हार कुमार विश्वास की ही होनी है और इसी के डर से वे अब तक कोई फैसला नहीं ले पा रहे थे. लेकिन आगे ऐसा कर पाना मुश्किल है. दिल्ली में राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं. जनवरी के पहले हफ्ते में ही इनके नाम की घोषणा होनी है. दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी के 70 में से 66 विधायक हैं, इसलिए तीनों सीटें आम आदमी पार्टी को मिलना तय है. लेकिन अरविंद केजरीवाल किसे उम्मीदवार बनाएंगे यह अभी तक तय नहीं हुआ है. गुरुवार को आम आदमी पार्टी के दफ्तर पर कुमार विश्वास के समर्थन में जबरदस्त नारेबाजी हुई. सोशल मीडिया पर कुमार को राज्यसभा उम्मीदवार बनाने की मुहीम शुरू है. इसका खुला समर्थन कुमार विश्वास खुद भी कर रहे हैं. वे ट्विटर पर हर उस ट्वीट को लाइक कर रहे हैं जो उन्हें राज्यसभा उम्मीदवार बनाने की पैरवी करती है. लेकिन जब कुमार के समर्थकों ने आम आदमी पार्टी के दफ्तर पर हल्ला बोला तो उन्होंने इससे खुद को अलग करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि वे ‘मुद्दों के लिए संघर्ष करें, मेरे हित-अहित के लिए नहीं. स्मरण रखिए अभिमन्यु के वध में भी उसकी विजय है.’ उनके इस लिखने से भी अंदाजा हो जाता है कि अब ये करीब-करीब तय हो चुका है कि अरविंद केजरीवाल उन्हें राज्यसभा नहीं भेजेंगे. सुनी-सुनाई है कि कुमार विश्वास को पार्टी के दो-तीन बड़े नेताओं ने बता दिया है कि उनका संसद पहुंचना नामुमकिन है. इसलिए वे वैकल्पिक व्यवस्था की तैयारी में जुट गये हैं. हाल-फिलहाल में जिन लोगों ने कुमार विश्वास से बात की, उनमें से कुछ का मानना है कि वे खुद पार्टी नहीं छोड़ेंगे. वे खुद को पार्टी के ‘टॉप थ्री’ नेताओं में से एक मानते हैं. वे पिछले दिनों बार-बार कहते सुने गए कि अभी जितने लोग पार्टी में शीर्ष पर हैं उनमें से वे, अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया ही पार्टी के ‘फाउंडर मेंबर’ हैं. इसलिए वे पार्टी क्यों छोड़ें, ये पार्टी तो उनकी है. वे कई बार खुद को मनीष सिसौदिया से भी ज्यादा लोकप्रिय बताते हैं. वे कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल के बाद उनकी जनसभा की सबसे ज्यादा मांग की आती है. इस हिसाब से पार्टी में उनकी हैसियत नंबर दो की है, मनीष सिसौदिया की नहीं. यह बात मनीष को नागवार गुजर रही है. इस वजह से कुमार विश्वास को केजरीवाल ने नहीं मनीष सिसौदिया ने किनारे लगाया है. कुमार विश्वास और मनीष सिसौदिया दोनों बचपन के मित्र हैं. एक ही साथ पढ़े-लिखे और बड़े हुए. जब अन्ना आंदोलन हुआ तो मनीष की वजह से ही कुमार विश्वास आंदोलन से जुड़े और फिर अरविंद केजरीवाल के करीब आए. जब अन्ना से अलग होने का फैसला हुआ तब भी मनीष सिसौदिया से अपने संबंध की वजह से कुमार ने केजरीवाल की सियायत का रास्ता पकड़ा. जब पार्टी से प्रशांत भूषण और योगेंद्र योदव को निकाला गया तब भी मनीष सिसौदिया के ही कहने पर कुमार विश्वास ने उऩके निष्कासन की घोषणा की थी. लेकिन पिछले कुछ महीने में यह दोस्ती टूट सी गई है. कुमार विश्वास से पहले राजस्थान का कामकाज मनीष सिसौदिया ही देखते थे. उस दौरान वहां आम आदमी पार्टी का कोई खास संगठन नहीं था, बस कुछ पदाधिकारी थे जो मनीष ने ही बनाए थे. लेकिन केजरीवाल और कुमार विश्वास के बीच हुए पिछले समझौते के तहत कुमार को राजस्थान की जिम्मेदारी सौंपी गई. राजस्थान में अजमेर लोकसभा सीट पर उपचुनाव होने वाले हैं. सुनी-सुनाई है कि अरविंद केजरीवाल से ज्यादा मनीष सिसौदिया चाहते थे कि कुमार विश्वास अजमेर से चुनाव लड़ें. राजस्थान इकाई के कई नेताओं के जरिए उनका नाम दिल्ली भिजवाया भी गया. लेकिन अपनी हार तय मानकर कुमार विश्वास ने चुनाव लड़ने के बजाय राज्यसभा की सीट पर अपनी दावेदारी बरकरार रखी. इसके बाद से उनकी केजरीवाल के साथ-साथ अपने पुराने मित्र मनीष सिसौदिया से भी बातचीत बंद है. कुमार तीन राज्यसभा सीट में से एक अपने नाम करना चाहते हैं, अरविंद केजरीवाल तीन में से एक सीट अपने मित्र संजय सिंह के नाम कर चुके हैं. बाकी दो सीटों पर सस्पेंस है. लेकिन इतना तय है कि यह अब कुमार विश्वास को नहीं मिलने वाली.

तीन तलाक़ पर बना क़ानून

एक बार में तीन तलाक़ विधेयक (मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक) लोकसभा में गुरुवार को पारित हो गया. लंबी बहस के बाद बिल के ख़िलाफ़ सभी संशोधन खारिज कर दिये गये यानी इसे बिना किसी संशोधन के पास कर दिया गया. अब इसे राज्यसभा में पेश किया जायेगा. विधेयक पर विपक्षी सदस्य 19 संशोधन प्रस्ताव लेकर आए थे, लेकिन सदन ने सभी को ख़ारिज कर दिया. तीन संशोधनों पर वोटिंग की मांग की गई और वोटिंग होने के बाद स्पीकर सुमित्रा महाजन ने परिणामों की घोषणा करते हुए कहा कि ये ख़ारिज हो गए हैं. इस बिल में तीन साल के जेल का प्रावधान है. बिल के अनुसार अगर कोई तलाक़ देता है तो उसे थाने से नहीं कोर्ट से जमानत नहीं मिलेगी. क़ानून मंत्री ने बहस के दौरान कहा, "देश की महिलाएं बहुत पीड़ित हुआ करती थीं. 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया था. आज सुबह मैंने पढ़ा रामपुर की एक महिला को तीन तलाक़ इसलिए दिया गया क्योंकि वो सुबह देर से उठी थी. महिलाओं की गरिमा से जुड़ा है तीन तलाक़. सुप्रीम कोर्ट से भी एक बार में तीन तलाक़ को असंवैधानिक बताया जा चुका है. उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद देश में स्थितियां बदलेंगी, लेकिन जहां इस साल 300 तीन तलाक़ हुए हैं वहीं सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी 100 तीन तलाक़ हुए हैं. हम इस मामले को वोट के चश्मे से नहीं देख रहे हैं. सवाल सियासत का नहीं, हम इसे इंसानियत के चश्मे से देख रहे हैं. आरोप परिवार को तोड़ने का लगाया जा रहा है. लेकिन यह सवाल तब क्यों नहीं उठता जब तलाक़ देकर महिला को फुटपाथ पर रहने के लिए मजबूर किया जाता है." विदेश राज्य मंत्री एम जे अकबर ने तीन तलाक़ पर बिल लाने को ऐतिहासिक मौका बताया. उन्होंने कहा, "यह ऐतिहासिक इसलिए है क्योंकि देश की 9 करोड़ मुस्लिम महिलाओं की तकदीर से जुड़ा है."
उन्होंने एक किस्सा सुनाया, "एक पत्रकार थीं ताया जिनकिन. अंग्रेज़ी अख़बार द गार्डियन की रिपोर्टर. यह बात 1960-61 की है. उन्होंने जवाहर लाल नेहरू से प्रश्न किया कि आपकी सबसे बड़ी कामयाबी क्या है. 
जवाहर लाल ने कहा, "हिंदू कोड बिल."
ताया जिनकिन ने फिर पूछा, "क्या मुसलमान औरतों का हक नहीं था बदलाव का."
जवाहर लाल ने जवाब दिया, "वक्त सही नहीं था."
"मेरे मन में पिछले 40 सालों से यह सवाल है कि वक्त कब सही आयेगा."
"लोगों को यह बताया जाता है कि इस्लाम ख़तरे में है. शरीया को बर्बाद किया जा रहा है. मैं मुसलमान के नाते बोलना चाहता हूं कि जो कलमा पढ़ा है तो वो किस हैसियत से यह कह सकता है कि इस्लाम खतरे में है. लेकिन आपने आज़ादी से पहले देश तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया और आज समाज तोड़ने के लिए, ज़हर ये फ़ैलाया जा रहा है. केवल कुछ मुसलमान मर्दों की जबरदस्ती खतरे में है."
"शरीया क्या है? शरीया का असल मायने क़ानून नहीं है. इसका मतलब जरिया या रास्ता है. रास्ता फलसफा था लेकिन कानून बनाने वाले इंसान थे. सुन्नियों में कम से कम शरीया के चार स्कूल हैं. चारों के अपने अपने लोग अलग अलग हैं. एक हैं इमाम अबू हनीफ़ा, दूसरे इमाम मालिकी, तीसरे इमाम शाफ़ई और चौथे इमाम हंबल हैं. चार किस्म के क़ानून हैं. ये कहना कि क़ानून नहीं बदले जा सकते, ग़लत है. कानून को इज्तेहाद की बुनियाद पर तब्दील किया जाना चाहिए.'
असम से सिल्चर से कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव ने क़ानून मंत्री से सवाल पूछा, "अगर आप इसे अपराध बनायेंगे और पति को जेल भेजेंगे तो महिला और उसके बच्चे का का भरण-पोषण कौन करेगा? अगर महिलाओं का ख्याल है तो क्या महिला आरक्षण विधेयक भी सरकार संसद में लाएगी? सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में तीन तलाक़ को प्रतिबंधित कर दिया है. अगर मुस्लिम महिलाओं के उत्थान का विचार है तो मुस्लिम महिलाओं के लिए एक फंड बनाया जाये जो पति के जेल जाने की स्थिति में उसके भरण पोषण के लिए इस्तेमाल किया जाये."
हैदराबाद से एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, "संसद को इस मसले पर क़ानून बनाने का कोई क़ानूनी हक नहीं है क्योंकि ये विधेयक मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. ये संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही तलाक-ए-बिद्दत को रद्द कर दिया है. देश में पहले से क़ानून हैं, घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम है, आईपीसी है. आप वैसे ही काम को फिर से अपराध घोषित नहीं कर सकते. इस बिल में विरोधाभास हैं. ये बिल कहता है कि जब पति को जेल भेज दिया जाएगा, तब भी सहवास का अधिकार बना रहेगा. उसे भत्ता देना होगा."
"ये कैसे संभव है कि जो आदमी जेल में हो और भत्ता भी अदा करे. आप कैसा क़ानून बना रहे हैं. मंत्री जी ने शुरुआत में ही कहा कि बिल पर मशविरा नहीं किया गया है. अगर ये बिल पास हो जाता है तो मुस्लिम महिलाओं के साथ नाइंसाफ़ी होगी. लोग अपनी पत्नियों को छोड़ देंगे. देश में 20 लाख ऐसी महिलाएं हैं, जिन्हें उनके पतियों ने छोड़ दिया है और वो मुसलमान नहीं हैं. उनके लिए क़ानून बनाए जाने की ज़रूरत है. इनमें गुजरात में हमारी भाभी भी है. उन्हें इंसाफ़ दिलाए जाने की ज़रूरत है. ये सरकार ऐसा नहीं कर रही है."
वैसे एक राय इस बारे में यह भी रही है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तलाक-ए-बिद्दत की कोई कानूनी हैसियत न रहने की वजह से यह निरर्थक हो ही चुका है। लिहाजा अलग से कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद यह चलन बंद नहीं हुआ है। हाल ही में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एक प्रफेसर द्वारा वॉट्सऐप पर तलाक दिए जाने की खबर आई थी। ऐसे मामलों में पीड़ित बीवी पुलिस के पास जाती है तो कानून की गैरमौजूदगी में पुलिस भी कुछ नहीं कर पाती। सरकार इस कमी को दूर करना चाहती है। मानना पड़ेगा कि तलाक-ए-बिद्दत जैसे सदियों से चले आ रहे चलन की सामाजिक मान्यता इतनी जल्दी खत्म नहीं होगी।
कानून कुछ भी कहे, अगर किसी महिला को उसका शौहर तीन बार तलाक कह देता है तो उसकी हैसियत परित्यक्ता जैसी ही हो जाती है। कानून का संरक्षण इस विपत्ति से उबरने में उसकी मदद कर सकता है। इसके अलावा ऐसा करने वाले शौहरों के मन में कानून का खौफ पैदा होगा, जिससे वे गुस्से की हालत में भी अपनी जुबान पर लगाम लगाने की कोशिश करेंगे। हां, इसमें कोई शक नहीं कि ऐसा कोई कानून भरपूर सावधानी की मांग करता है, ताकि इसमें कोई धार्मिक भेद-भाव न खोजा जा सके। पीड़ित महिलाओं को सुरक्षा देने के साथ ही मुस्लिम पुरुषों में भी यह भरोसा बनाए रखना होगा कि बतौर धार्मिक अल्पसंख्यक, इस देश में उनकी पहचान पर कोई आंच नहीं आने वाली। 

Saturday, December 23, 2017

अब 2 जी स्पेक्ट्रम हुआ ही नहीं?

पांच साल तक 2जी घोटाले का प्रचार करके राजनीति होती रही. तो क्या उस झूठ के उजागर होने के बाद टूजी के झूठ घोटाले पर ही हमें वैसा ही असर देखने को मिलेगा? यह सवाल भी खड़ा होगा कि झूठे आरोप लगाने वालों ने इस झूठे आरोप से क्या क्या कमाया. यह सवाल भी कि झूठ के जरिए हासिल वह बेजा कमाई क्या उनसे वसूली जाएगी? जिन पर ये झूठे आरोप लगे थे उन्हें उस झूठ के कारण कितना नुकसान हुआ? क्या उस बेजा नुकसान की भरपाई संभव है? और आखिरी सवाल यह कि भविष्य में झूठे आरोपों से बचाव की क्या व्यवस्था बन सकती है? इसे भ्रष्टाचार का मामला बताकर इसका नामकरण घोटाला किया गया था. इस झूठे आरोप में भ्रष्टाचार का आकार ऐतिहासिक रूप से सबसे बड़ा बनाया गया था यानी एक लाख 76 हजार करोड़. उसके पहले देश की जनता ने सिर्फ चार छह हजार करोड़ के ही आरोप सुने थे. आमतौर पर उन घोटालों के आरोप भी सिर्फ बड़े कारोबारियों पर ही लगते थे. लेकिन पिछली यूपीए सरकार को तबाह करने के लिए एक लाख 76 हजार करोड़ के घपले घोटाले के आरोप बनाए गए थे. और वाकई आरोपबाजों को तबकी सरकार की छवि को घोर भ्रष्टाचारी बनाने में कामयाबी भी मिल गई थी. मीडिया में जिस तरह से इन आरोपों को जांच पड़ताल के पहले ही सबसे बड़ा भ्रष्टाचार साबित करके दिखाया गया था उसका असर हुए बग़ैर रह भी नहीं सकता था. आखिर 2014 के चुनाव में यूपीए सरकार को जनता ने बेदखल कर दिया था. यह साबित करने के लिए किसी बहस की जरूरत नहीं कि पिछले चुनाव में यूपीए सरकार की हार के कारणों में इस 2जी आवंटन में गड़बड़ी के झूठे आरोपों की कितनी बड़ी भूमिका थी. मामला यह कहते शुरू किया गया था कि सरकार की नीतियों से सरकार के खजाने को एक लाख 76 करोड़ का नुकसान हुआ और जल्दी ही इसे घूसखोरी और महाघोटाले के नाम से प्रचारित कर दिया गया था. अदालत से सब के सब आरोपी बरी हो गए. घूस के लेन देन का कोई सबूत पैदा नहीं किया जा सका. यह आरोप भी नहीं लग सकता कि सरकार ने खुद को बचाने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल कर लिया. क्योंकि जांच पड़ताल का काम होते समय सरकार उस राजनीतिक दल की बन गई थी जिसने विपक्ष में रहते हुए आरोप लगाए थे. इसमें क्या कोई शक हो सकता है कि मौजूदा सरकार ने एड़ी से चोटी का दम लगाया होगा कि किसी तरह यह घोटाला साबित हो जाए. उसे यह भी आभास होगा कि यह मामला अगर घोटाला साबित न हुआ तो उसे लेने के देने पड़ जाएंगे. और वही लेने के देने पड़ गए. मौजूदा सरकार पर यह गैरअदालती मुकदमा शुरू हो गया है कि उसने झूठे आरोप लगाकर पिछली सरकार को हटाकर सत्ता हथियाई थी. यानी एक तरह से अब मौजूदा सरकार पर झूठे आरोप का महाघोटाला करने का गैरअदालती मुकदमा शुरू हो गया है. सब जानते हैं कि 2जी का मामला तबके कॉम्‍पट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल विनोद राय के जरिए बनवाया गया था. उन्होंने ही एक लाख करोड़ की भारी भरकम रकम की अविश्वसनीय फिगर निकालकार रिपोर्ट में दर्ज की थी. बाद में यह 2जी आबंटन रद्द करके दुबारा आबंटन करके भी देख लिया गया था कि सरकार के खजाने में इतनी बड़ी रकम आ ही नहीं सकती थी. सो आरोपों का आधार पहले ही खिसक गया था. लेकिन राजनीतिक नफे नुकसान के चक्कर में मामला चलता रहा और उम्मीद लगाई जाती रही कि जब तक ये आरोप अदालत में चलते रहेंगे तब तक पुरानी सरकार की गर्दन पकड़े रहने में आसानी बनी रहेगी. लेकिन मौजूदा सरकार के चार साल होने को आ रहे थे. अदालत में इसे और लंबा टिकाए रखने की सारी हद पार हो चुकी थी. सो अदालती फैसला करना ही पड़ा और उसमें सब बरी हो गए.
सबसे ज्यादा ए राजा ने, उससे थोड़ा कम कनिमोई ने, उससे थोड़ार कम पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने. राजा और कनिमोई तो जेल में बंद तक रहीं. ये सब जनप्रतिनिधि थे. सो उस जनता ने भी दुख और जलालत उठाई जिसने उन्हें चुनकर सरकार में भेजा था. खैर शर्मिंदगी से गुस्साई जनता ने अपनी जलालत कम करने के लिए बाद में अपने प्रिय नेताओं से बदला ले लिया. जनता ने यूपीए को बेदखल कर दिया. वैसे एक तरह से यह भी कहा जा सकता है कि आरोप लगाने वालों ने जनता के जरिए यूपीए को बेदखल करवा दिया. लेकिन आज देखें तो जनता को ही सबसे ज्यादा नुकसान भुगतना पड़ा. कम से यह नुकसान तो जनता को हुआ ही कि वह अपराधबोध में आ गई है. आरोप लगाने वाले लोग अभी भी घाटे में नहीं हैं. वे ज्यादातर लोग सत्ता में हैं. इन आरोपों का अधिकतम लाभ वे पिछले चुनाव में ले चुके हैं. हालांकि  इस मामले में सभी आरोपियों के बरी होने के बाद भी झूठे आरोप लगाने वाले लोग चुप नहीं बैठेंगे. वे जरूर चाहेंगे कि एक के बाद एक ऊंची अदालतों में यह मामला किसी न किसी तरह चलता रहे. इस बात के कहने का आधार यह है कि मौजूदा सरकार की तरफ से उसके वित्तमंत्री ने कहा है कि कांग्रेस इस मामले में सभी आरोपियों के बरी होने को बेकसूर होने का प्रमाणपत्र न माने. हालांकि वे खुद एक बड़े वकील हैं और वे ही कह रहे हों कि अदालत से बरी होना प्रमाणपत्र नहीं है तो यह बात इस बात का संकेत है कि सरकार मामले को ऊंची अदालत में चलवाती रहेगी. इस तरह से वह लंबे समय तक अपने ऊपर लगने वाले इस आरोप से बचती रहेगी कि उसने झूठ बोलने का महाघोटाला किया है. अदालत से आरोपियों के बरी होने के बाद भी वह यह कहती रहेगी कि मामला ऊंची अदालत में विचाराधीन है. यह बात कानूनी मामले में तो कारगर हो सकती है लेकिन जनता के बीच झूठ का जो संदेश चला गया है, उसे मिटाने की कोई जुगाड़ आसान नहीं है. इधर 2019 का चुनाव सिर पर हैं.
लगता है बिल्कुल नहीं बन पाएगा. राजनीति तो टिकी ही प्रचार प्रसार पर है. सरकार कोई भी हो, वह तो अपनी झूठी उपलब्धियों को भी प्रचार के रथ पर सवार कर देती है. कितनी बार आश्वासनों के झूठ का पर्दाफाश होते जनता ने अपनी आखों से देखा है. लेकिन वायदों पर यकीन करने के अलावा उसके पास दूसरा चारा क्या है. हालांकि गौर से देखें तो झूठ और सच के बीच फर्क के लिए उसे अजमाकर देखना उतना जरूरी भी नहीं है. एक विकल्प यह भी है कि उसका निपटारा अक्ल लगाकर, सोच समझकर, विचार विमर्श के जरिए, परामर्श के जरिए हाल के हाल भी किया जा सकता है. मसलन 2जी मामले में जितनी अविश्वसनीय आकार की रकम के घोटाले का आरोप लगाया जा रहा था उसके झूठ को क्या पहली नज़र में ही साफ साफ नहीं देखा जा सकता था. जो जानकार और अनुभवी लोग सच्चाई देखकर बता रहे थे उनपर भ्रष्टाचारियों के साझेदार का आरोप लगाकर चुप कराया जा रहा था. यानी जब हम चैतरफा झूठ से घिरे हों तो 2जी के झूठ के पर्दाफाश का आखिरी ऐलान होने में भी अड़चन ही है.

मोदी जी ने गुजरात चुनाव जीता लेकिन राहुल ने दिल

कांग्रेस के नए अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए विधानसभा चुनाव के नतीजे अच्छे रहे. गुजरात में कांग्रेस की संतुष्टि इस बात को लेकर है कि पिछले 6 चुनावों के बाद पहली बार कांग्रेस जमीन पर लड़ती दिखाई दे रही थी. कांग्रेस के नए राजनीतिक समीकरण के जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किला बचाने के लिए धुआंधार रैलिया करनी पड़ी. परिणाम बीजेपी के पक्ष में रहा, लेकिन राहुल गांधी के लिए कई मायनों में ये नतीजे उत्साह बढ़ाने वाले है. बीजेपी के मुकाबले गुजरात में कांग्रेस का संगठन कमज़ोर था. राहुल गांधी ने पार्टी के नेताओं की मदद से कांग्रेस को मुकाबले में लाकर खड़ा कर दिया. कांग्रेस के सांसद और यूथ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राजीव सातव कहते हैं, 'अगर राहुल गांधी पहले से प्रचार की शुरुआत न करते तो नतीजे और खराब हो सकते थे. राहुल गांधी इस चुनाव में फाइटर की तरह उभर कर निकले और नतीजों की परवाह किए बिना काम करते रहे.' कांग्रेस की विरोधी शिवसेना ने भी उनकी तारीफ की है. कांग्रेस पार्टी के बाहर कार्यकर्ताओं का जोश बता रहा था कि राहुल गांधी अध्यक्ष बनने के बाद पहले इम्तेहान में पास हो गए हैं. हालांकि राहुल गांधी को डिस्टिन्क्शन की उम्मीद थी, जो नहीं मिल पाया. हालाँकि राहुल गांधी ने गुजरातियों का दिल जीता है. राहुल गांधी ने भी कहा कि वह गुजरात और हिमाचल की जनता को धन्यवाद करते हैं, जिन्होंने उनके प्रति इतना प्यार दिखाया है.
हिमाचल प्रदेश की हार से कांग्रेस की सत्ता सिर्फ पांच राज्यों मे सिमट गई है, लेकिन कार्यकर्ता निराश नहीं हैं. उनमें राहुल गांधी को लेकर जो संशय था वो कुछ हद तक दूर हुआ है, क्योंकि गुजरात चुनाव में कांग्रेस के नए अध्यक्ष के लिए एक लिट्मस टेस्ट भी था. कार्यकर्ता कह रहे कि जिस तरह राहुल गांधी ने लीड किया, उससे ये आशा जगी कि 2019 में कांग्रेस की स्थिति राहुल गांधी की अगुवाई में बेहतर हो सकती है. राहुल गांधी गुजरात के चुनाव में नए तेवर के साथ दिखे, जो पार्टी के लिए फायदेमंद रहा. वह मैदान भले नहीं मार पाए, लेकिन पार्टी के भीतर खुद को साबित करने में कामयाब रहे. कांग्रेस के युवा नेता और गुजरात चुनाव में पार्टी का कामकाज देख रहे आसिफ जाह का भी कहना है कि राहुल गांधी जनता से कनेक्ट करने में कामयाब रहे. राहुल गांधी ने बेरोजगारी, जीएसटी, नोटबंदी और किसानों का मुद्दा उठाया, जिससे जनता का भरोसा राहुल गांधी पर बढ़ा है. कांग्रेस के भीतर और बाहर भी राहुल गांधी को लेकर कई सवाल खड़े किए जा रहे थे. खासकर निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित होने पर शहज़ाद पूनावाला ने खुलेआम सवाल उठाए. राहुल गांधी की राजनीतिक समझ पर अक्सर लोग उंगली उठाते रहे हैं. गुजरात के नतीजों ने राहुल गांधी को इन सब के बीच मज़बूत किया है. अगर नतीजे एकतरफा बीजेपी के पक्ष में जाता तो राहुल गांधी पर सवाल उठना लाज़िमी था. गुजरात में प्रचार का दारमोदार राहुल पर ही था. चुनाव के दौरान भी सेंटर स्टेज पर राहुल गांधी ही थे. पार्टी के प्रदेश के नेता राहुल गांधी के साथ दिखे ज़रूर, लेकिन लाइमलाइट में राहुल ही रहे. बीजेपी ने भी राहुल गांधी को ही टारगेट किया, चाहे वो सोमनाथ का मसला हो या फिर आरक्षण को लेकर पाटीदार अनामत आंदोलन के मसौदे की बात रही हो. गुजरात चुनाव कांग्रेस के लिए संजीवनी तो नहीं बन पाए, लेकिन पार्टी को निराशा से बाहर लाने में मददगार ज़रूर हुए हैं. हालांकि आगे राहुल गांधी की चुनौती आसान नहीं रहने वाली. सामने नरेंद्र मोदी अमित शाह की जोड़ी है, जिसने विपरीत परिस्थिति में बीजेपी को गुजरात में जीत दिला दी है. दोनों ही नेता 24 घंटे राजनीति के बारे में सोचते हैं, सटीक फैसले लेते हैं. चाहे यूपी के चुनाव रहे हों, महाराष्ट्र में शिवसेना से अलग होकर विधानसभा और नगर निगम चुनाव में जाने का फैसला हो या फिर दिल्ली में नगर निगम चुनाव में सभी मौजूदा पार्षदों का टिकट काटने का फैसला हो, ये सभी फैसले चुनाव की कसौटी पर खरे साबित हुए हैं. राहुल गांधी को इनकी सूझबूझ और एनर्जी लेवल की बराबरी करनी पड़ेगी. 2014 के आम चुनाव के बाद बीजेपी ने कई चुनाव जीते. बीजेपी के संगठन में भी कई बदलाव देखने को मिले, लेकिन कांग्रेस में अब तक मामूली फेरबदल ही हो पाया है. कांग्रेस के अध्यक्ष ने कहा है कि कांग्रेस में जल्दी ही बदलाव होगा और नए लोगों को पार्टी में काम करने का मौका मिलेगा. राहुल गांधी को 2018 की शुरुआत में ही फेरबदल करना पड़ेगा, क्योंकि 2019 के चुनावों में ज्यादा वक्त नहीं बचा है. इस बीच चार बड़े राज्यों कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव हैं. कांग्रेस के पास नेताओं का अभाव नहीं है. राजस्थान को छोड़ दें तो बाकी दोनों राज्यों में बीजेपी की सत्ता को 15 साल हो जाएंगे.
कांग्रेस में नया उत्साह बढ़ाने के लिए राहुल गांधी को इन चार राज्यों में तो ज़ोर लगाना ही पड़ेगा. साथ ही साथ लोकसभा चुनाव की तैयारी भी करनी पड़ेगी. नया गठबंधन भी बनाने की ज़िम्मेदारी बहुत हद तक राहुल के कंधों पर रहेगी. हालांकि इस मामले में सोनिया गांधी राहुल गांधी का मार्गदर्शन करती रहेंगी. राहुल गांधी को बीजेपी के चाणक्य का मुकाबला करने के लिए सीनियर नेताओं का सहयोग लेना पड़ सकता है. एनसीपी के नेता प्रफुल्ल पटेल ने कहा भी कि 'कांग्रेस अगर उनके साथ होती तो नतीजे और अच्छे होते.' ज़ाहिर है ये प्रफुल्ल का तंज़ था, राहुल गांधी के लिए शरद पवार और लालू प्रसाद जैसे सहयोगी नेताओं को डील करना भी चैलेंज है. ये लोग ऐन मौके पर ऐसे फैसले ले सकते हैं, जो कांग्रेस के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं. लालू ने साफ कहा है कि ये अभी तय नहीं है कि 2019 में चुनाव राहुल की अगुवाई में लड़ा जाएगा. राहुल गांधी को इन नेताओं को साथ लेकर चलने का सबक भी यूपीए 1-2 के कांग्रेस के सीनियर नेताओं के साथ बैठकर समझना पड़ेगा.

Saturday, December 16, 2017

गुजरात एक्ज़िट पोल्स पर एक नज़र

गुजरात और हिमाचल प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव को लेकर कराए गए एग्ज़िट पोल में दोनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत मिलने की बात की गई है. एग्ज़िट पोल के अनुमान, गुरुवार को गुजरात विधानसभा चुनाव के दूसरे दौर के मतदान के बाद जारी किए गए. दोनों राज्यों में मतगणना 18 दिसंबर को होनी है. गुजरात चुनाव को लेकर करीब दो हफ़्ते पहले जो ओपिनियन पोल जारी किया गया था, उसमें भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर का अनुमान ज़ाहिर किया गया था. तो कुछ दिनों में ऐसा क्या बदला कि एग्ज़िट पोल में भारतीय जनता पार्टी का मत प्रतिशत बढ़ा हुआ दिखाया गया है? दरअसल "ओपिनियन पोल दूसरे चरण के चुनाव से पहले किया गया, जबकि एग्ज़िट पोल चुनाव के बाद. इस दौरान दो हफ़्तों में कई चीज़ें बदलीं. बीजेपी ने काफी आक्रामक चुनाव प्रचार किया. खासकर प्रधानमंत्री ने ताबड़तोड़ रैलियां कीं, जिसके असर से वोटरों का मन बदल गया."
गुजरात और हिमाचल को लेकर आए एग्ज़िट पोल में भारतीय जनता पार्टी की जीत का दावा किया गया है. लेकिन ज़रूरी नहीं कि एग्ज़िट पोल का अनुमान हर बार सही साबित हो. बिहार और दिल्ली के पिछले विधानसभा के चुनावों के बाद आए एग्ज़िट पोल से वास्तविक नतीजे काफी अलग थे. बिहार में महागठबंधन ने बीजेपी को हराकर सरकार बनाई तो दिल्ली के नतीजों ने सबको चौंका दिया. जहां आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटों पर जीत दर्ज की. ऐसे कई मामलों में एग्ज़िट पोल की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं.  "ऐसा नहीं है कि बिहार में एग्ज़िट पोल के सारे नतीजे एकदम उलट थे. कुछ एग्ज़िट पोल ने बीजेपी की जीत दिखाई थी तो कुछ ने महागठबंधन की जीत का अनुमान भी जताया था. जीत हार का अंतर कितना था, इस पर चर्चा ज़रूर हो सकती है." "वहीं दिल्ली विधानसभा चुनाव के वक्त एग्ज़िट पोल ट्रेंड दिखा रहे थे. हां ये ज़रूर है कि कोई ये नहीं कह रहा था कि आम आदमी पार्टी की इतनी बड़ी जीत होगी. ज़्यादा से ज़्यादा 50-52 या 38-40 सीट का अनुमान लगाया गया था." किसी भी पोल के लिए एक सैंपल बनाया जाता है. इस सैंपल में कुछ हज़ार लोग होते हैं. ये लोग राज्य के ही मतदाता होते हैं और इनकी संख्या उसी अनुपात में होती है, जितनी की राज्य में है. इसमें ग्रामीण, शहरी, अलग-अलग धर्म, जाति, लिंग और वर्ग के लोगों को उसी अनुपात में रखा जाता है जितने वो राज्य में हैं. इन सब लोगों से बात की जाती है और जानने की कोशिश की जाती है कि उन्होंने किस पार्टी को वोट दिया या देने वाले हैं? अगर इन सब बातों का ध्यान रखा जाए तो काफ़ी हद तक आपका अनुमान सही हो सकता है. लेकिन अगर सैंपल में अनुपात गलत हुआ तो उलटफेर होने की गुंजाइश रहती है. पश्चिमी देशों में एग्ज़िट या ओपिनियन पोल का अनुमान ज़्यादा सटीक होता है, लेकिन भारत में असल नतीजे इस तरह के पोल से अलग भी मिलते हैं. भारत में अभी सुधार की ज़रूरत है. लेकिन ये भी सच है कि जितनी विविधता भारत के मतदाताओं के बीच है, उतनी पश्चिमी देशों में नहीं है. वहां लोगों में धर्म, जाति की काफ़ी हद तक समानता है. यहां के मुकाबले वहां चुनाव लड़ने वाली पार्टियां कम होती हैं. यही वजह है कि वहां एग्ज़िट पोल के नतीजे सटीक होने की संभावना ज़्यादा है. भारत ही नहीं, कोई भी देश जहां विविधता और पार्टियां ज्यादा हैं, नतीजों में अंतर की गुंजाइश ज़्यादा रहती है. सारे एग्ज़िट पोल संकेत दे रहे हैं कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश में बीजेपी को बढ़त है. ये बढ़त कितनी बड़ी होगी ये अलग बात है लेकिन ये ज़रूर तय है कि कांग्रेस 22 साल बाद भी गुजरात चुनाव जीतने में सफल नहीं होगी. अब इंतज़ार है 18 दिसंबर का जब दोनों विधानसभाओं के असल नतीजे आएंगे.

Sunday, December 10, 2017

मणि शंकर अय्यर ने राहुल की मेहनत पर फेरा पानी.

कांग्रेस ने 22 साल में पहली बार गुजरात में ऐसे सियासी समीकरण सेट किए थे, कि बीजेपी का कोई भी अस्त्र काम नहीं आ रहा था. राहुल गांधी ने गुजरात की युवा त्रिमूर्ति के जरिए बीजेपी के खिलाफ घेराबंदी करने के लिए जातिगत फॉर्मूला बनाया था, जो राज्य में कांग्रेस के सत्ता का वनवास खत्म करने की उम्मीद जगा रहा था. इन सबके बीच मणिशंकर अय्यर की फिसली जुबान ने बीजेपी को संजीवनी दे दी है. अय्यर के बयान से गुजरात में कांग्रेस के जीत का जायका बिगड़ता हुआ नजर आ रहा है. मणिशंकर अय्यर ने गुरुवार को नरेंद्र मोदी के लिए 'नीच' शब्द का इस्तेमाल किया. इसके बाद बीजेपी ने अय्यर के बयान को लेकर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया. हालांकि, कांग्रेस ने कुछ घंटे के अंदर ही अय्यर को निलंबित कर दिया लेकिन जो सियासी माहौल बनना था बीजेपी ने उसे हवा दे दी. पीएम नरेंद्र मोदी ने सूरत की चुनावी रैली में कहा, 'अय्यर कहते हैं कि मोदी नीच जाति का है. ये गुजरात का अपमान है. मुगल संस्कार वालों को मेरे जैसे अच्छे कपड़े पहनना सहन नहीं होता है. आपने हमें गधा और गंदी नाली का कीड़ा कहा. 18 तारीख को मतपेटियां बताएगी कि गुजरात के बेटे के अपमान का बदला कैसे लिया जाता है.' हालांकि कांग्रेस ने मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले मणिशंकर अय्यर को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया है. साथ ही मामले में कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है. अय्यर के बयान से सिर्फ नरेंद्र मोदी और बीजेपी ही आहत नहीं हुई हैं बल्कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के माथे पर भी पसीने आ गए. राहुल गांधी अय्यर के बयान के सियासी मायने बखूबी समझते हैं. इसीलिए उन्होंने ट्वीट कर बयान की निंदा की है और मोदी से माफी मांगने की बात भी कही. राहुल गांधी इस बात से वाकिफ हैं कि उन्होंने पिछले चार महीनों से जिस कदर गुजरात की जमीन पर उतरकर काम किया है. राज्य में वेंटिलेटर पर कांग्रेस में जान दिखने लगी थी. राहुल नवसृजन यात्रा के जरिए गुजरात में सियासी फसल उगाने की कोशिश कर रहे थे. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बार गुजरात के रणभूमि में जातीय सियासी बिसात बिछाई थी. कांग्रेस ने गुजरात के युवा त्रिमूर्ती हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश को अपने साथ मिलाकर जीत का ख्वाब संजोया था. गुजरात में पटेलों की नाराजगी बीजेपी की चिंता का सबब बना हुआ था. कांग्रेस ओबीसी सहित आदिवासी और दलित मतों में सेंधमारी लगाने में जुटी थी, जिससे बीजेपी परेशान थी. बीजेपी की लाख कोशिशों के बावजूद हिंदुत्व की हवा नहीं बन पा रही थी. राहुल गांधी शुरू से ही सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चल रहे थे. इसीलिए बीजेपी का ये कार्ड भी सफलता का पाला छू नहीं पा रहा था. पीएम मोदी के गुजरात अस्मिता कार्ड चल रहे थे और अपने आपको गुजरात का बेटा बता रहे थे. इसके बावजूद उनकी रैलियों से कहीं ज्यादा भीड़ हार्दिक पटेल की रैली में जुट रही थी. बीजेपी इसकी काट नहीं तलाश पा रही थी. ऐसे में  मणिशंकर अय्यर के बयान ने बीजेपी को ब्रह्मास्त्र दे दिया. 

आख़िर क्या है FRDI बिल?

10 अगस्त 2017 में लोकसभा में पेश हुए फाइनेंशियल रेज़्यूलेशन एंड डिपोज़िट इंन्श्योरेंस बिल को लेकर चर्चा हो रही है. 18 अगस्त को यह बिल लोकसभा की संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दी गई, इस समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश नहीं की है मगर इसके कुछ प्रावधानों को लेकर मीडिया में चर्चा है कि बैंकों में जमा आपका पैसा सुरक्षित नहीं है. अब बैंक चाहें तो देने से मना कर सकते हैं. यह बिल इसलिए लाया गया है ताकि बैंकिंग सेक्टर की मॉनिटरिंग के लिए एक रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन बनाया जा सके. यह निगम डूबते हुए बैंक के खाताधारखों के पैसे की बीमा का मापदंड भी तय करेगा. नए प्रावधानों में कहा गया है कि खाताधारकों के जमा पैसे का इस्तेमाल बैंक को उबारने में किया जा सकता है. डिपोजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन भी खत्म किया जाना है. जिसके तहत खाताधारकों को 1 लाख रुपये तक लौटानी की गारंटी मिली है. आपके खाते में अगर दस लाख जमा है, बैंक डूब गया तो सिर्फ एक लाख तक मिलेगा. नौ लाख रुपया समझिए डूब गया. इसकी जगह बैंकों को छूट दी जाएगी कि वो आपका पैसा लौटाएंगे या नहीं. अगर लौटाएंगे तो किस रूप में. कहीं लंबे समय के लिए निवेश कर दिया तो आप गए काम से. बैंकों का एनपीए बढ़कर 6 लाख करोड़ से बढ़ गया है. बैंकों के लिए यह बुरी ख़बर तो होती ही है, आपके लिए भी है क्योंकि बैंक डूबेंगे तो आपका पैसा भी डूबेगा. नए प्रावधान के अनुसार डूबते बैंकों से कहा जाएगा कि आप ख़ुद ही बचा लो, खाताधारक को पैसा मत दो. विवाद बिल के चैप्टर 4 सेक्शन 2 को लेकर भी है. इसके मुताबिक रेज़ोल्यूशन कॉरपोरेशन रेग्यूलेटर से सलाह-मश्विरे के बाद ये तय करेगा कि फाइनेन्शियल रेज़्यूलेशन एंड डिपोज़िट इंन्श्योरेंस बिल. दिवालिया बैंक के जमाकर्ता को उसके जमा पैसे के बदले कितनी रकम दी जाए. वो तय करेगा कि जमाकर्ता को कोई खास रकम मिले या फिर खाते में जमा पूरा पैसा. जून 2017 में स्टेट बैंक का नॉन परफॉर्मिंग असेट एनपीए बढ़कर 1,88,069 करोड़ हो गया है. स्टेट बैंक की तरह ही पांच अन्य सरकारी बैंक हैं जिनका एनपीए इतना बढ़ गया है कि भारतीय रिज़र्व बैंक ने उन्हें तत्काल कुछ करने की चेतावनी दी है. सरकारी रिपोर्ट बताती है कि आम भारतीय का 63 फीसदी पैसा सार्वजनिकि क्षेत्र के बैंकों में जमा है, 18 फीसदी ही निजी बैंकों में जमा है. अगर ये सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक डूबे तो बड़ी संख्या में कस्टमर प्रभावित हो जाएंगे. मीरा नांगिया ने लिखा है कि बेल-इन नाम से एक प्रावधान आ रहा है जो प्रस्तावित रेजोलुशन कॉरपोरेशन को अधिकार देगा कि वह बैंकों की लायबिलिटी को रद्द कर दे यानी या बैंक लंबे समय तक के लिए निवेश कर दे, आपको दे ही न. जो पैसा आप बैंकों में फिक्स डिपोज़िट या आम डिपोज़िट जमा करते हैं उसे लायबिलिटी कहते हैं. बैंक आपसे वादा करता है कि आप जब पैसा मांगेंगे तब वह लौटा देगा. अब इस बेल इन के आने के बाद कहा जा रहा है कि बैंक आपको पैसा देने से मना कर सकते हैं. हो सकता है कि बदले में आपको कुछ शेयर दे दें, कोई सिक्योरिटी दे दें.  कई जानकारों ने लिखा है कि बैंकों में अब आपका पैसा सुरक्षित नहीं रहेगा. या तो पैसा डूब जाएगा या फिर उस पैसे को बैंक अपनी खातिर कहीं निवेश कर देगा. जिस तरह से आप किसी कंपनी का शेयर खरीदते हैं उसी तरह से बैंकों में पैसा जमा करना हो जाएगा. यह एक बड़ा बदलाव है. बैंकिंग एसोसिएशन के लोगों ने कहा है कि वह भी इस बिल के प्रावधान से सहमत नहीं हैं. बैंक के लिए अब बैल- आउट दरअसल बैल-इन बनने जा रहा है. मतलब, पहले जब कोई बड़ा उद्योगपति किसी बैंक को लोन वापस नहीं करता था और बैंक कंगाली की कगार पर आ जाता था तो सरकार अपनी जेब से पैसे देकर उस बैंक की मदद करती थी जिसे बेल-आउट पैकेज भी कहते हैं. लेकिन अब इस कानून के ज़रिए बेल-इन सिस्टम बना दिया जाएगा यानी देश के आम लोगों का पैसा जो उनके बैंक खातों में जमा है, उसे बैंक हड़प लेगा और उद्योगपतियों का लोन माफ़ करते हुए अपने नुकसान की भरपाई कर लेगा. और ये सबकुछ आपकी मर्ज़ी के बिना किया जाएगा.  आलोचनाओं के बाद सरकार ने कहा है कि सरकार कस्टमर के पैसे की सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ट्वीट किया है कि फाइनेन्शियल रेज़्यूलेशन एंड डिपोज़िट इंन्श्योरेंस बिल संसद की स्थायी समिति के अधीन है. सरकार की मंशा वित्तीय संस्थानों और खाताधारकों के हितों को सुरक्षित रखना है. यही नहीं वित्त मंत्रालय की तरफ से एक सफाई भी आई है. जिसमें कहा गया है कि मीडिया में बिल में बेल-इन के प्रावधानों को लेकर गलतफहमी फैलाई जा रही है. संसद में जो बिल पेश किया गया है उससे खाताधारकों की मौजूदा सुरक्षा में कोई बदलाव नहीं किया गया है. बिल में पार्दर्शी तरीके से खाताधारकों के लिए सुरक्षा के नए प्रावधान शामिल किये गए हैं. देखते हैं संसदीय समिति इस मामले में क्या रिपोर्ट देती है.

Saturday, December 2, 2017

बिखरती सपा बसपा की राजनीति

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद मैं एसपी और बीएसपी की राजनीति पर लगातार नज़र रख रहा हूँ क़ि कैसे ये एक राज्य के मजबूत दल एक राष्ट्रीय पार्टी के हाथो ख़त्म हो रहे हैं. इनके कार्यकर्ताओं से लेकर कई जिला और मंडल स्तर के पदाधिकारियों से भी इसपर चर्चा होती रही लेकिन उनकी बातों में कभी उस वापसी का जुनून नहीं दिखता है. और न इनके नेताओं में वो उर्जा. बीएसपी ने भले ही नगर पालिका में कुछ सीटें जीतकर वापसी की उम्मीद जगाई है लेकिन इन चुनावों का पार्टी से बहुत कम लेना देना होता है. कई बार जातीय समीकरण फिट हो गये, तो कई बार प्रत्याशी की निजी छवि.हाँ भाजपा के लिए ऐसा कह सकते हैं क़ि जनता के मूड में हो कि राज्य और केंद्र में जिसकी सरकार होगी वही शहर का अच्छा विकास कर पाएगा. कई बार जीती हुई पार्टी की लहर भी काम कर जाती है. लेकिन 2012 के विधान सभा चुनावों के बाद हुए चुनावों में 45 सीटों वाली बीजेपी ने 16 में से 10 सीटें जीती थी. शहरी इलाक़ों में उसकी पकड़ पहले से ही अच्छी है. अब तो पूरे यूपी में. 
बीएसपी के कई बड़े नेता खुद सपा में जा चुके हैं या जाना चाहते हैं. सोसल मीडिया से लेकर ज़मीन तक पर युवा कार्यकर्ता अब सपा को बेहतर पार्टी मानते हैं बसपा के मुक़ाबले. लेकिन सपा? मुझे याद है अखिलेश यादव ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अब कुर्सी नहीं रही तो झगड़ा कैसा? लेकिन आप अभी भी देखिए तो सांगठनिक तौर पर पार्टी के हालत बद से बदतर हैं. युवा कार्यकर्ता साइकिल चलाने, संघर्ष करने, और व्हाट्सएप चलाने वाला तो अखिलेश के साथ है. वो प्रचार कर सकते हैं लेकिन वोट अपना ही डाल सकते हैं. लेकिन 35 साल से अधिक उम्र के नेता जो पब्लिक का वो दिला सकते हैं वो अभी भी नाराज़ हैं शिवपाल सिंह यादव को दरकिनार करने के कारण. बड़े चुनावों में यूपी के ग्रामीण क्षेत्रों का अभी भी अधिकतर वोट मैथड उसी तरह का है जो किसी मुखिया, प्रधान या बड़े आदमी के कहने से वोट करते हैं. मैं कानपुर नगर से लेकिन देहात और कन्नौज के ऐसे कई नेताओं को जनता हूँ जो शिवपाल की सम्मान सहित वापसी के बिना सपा को कभी नहीं उबरने देंगे. उन नेताओं की भी मजबूरी है, पूर्व में मुलायम सिंह की सरकारों में उनको खूब सत्ता लाभ मिला है. संयोगवश वो एक जाति विशेष के हैं जैसे आज की तारीख में बीजेपी सरकार में तथाकथित अगड़ी जाति का वर्चस्व है. दूसरी बात नीतियों दूसरी बात सरकार की नीतियों का विरोध पार्टी उस तरह से नहीं कर पा रही है. अखिलेश एक प्रेस कांफ्रेंस करके चले जाते हैं जब मीडिया ही साथ नहीं तो कितने लोगों तक आपकी बात पहुच पाई? उनको दूसरी पार्टियों से नेता लाने की बजाय अपने रूठे नेताओं को मानना चाहिए. जो कोशिश अब आम आदमी पार्टी करना चाहती है योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को मनाकर. अभी मुलायम सिंह यादव के जन्म दिन पर हुई रैली में उन्होंने अखिलेश से एक अहम बात कही क़ि, "आप लोग सांप्रदायिकता का सामना कैसे नहीं कर पा रहे हैं? जब अयोध्या में गोली चली थी तब भी 109 सीटें आई थी. तो कुछ लोगों ने कहा क़ि अगर तब सोसल मीडिया होता तो आपको भी सीटें न मिलती. लेकिन जब भाजपा आपके ही टेक्नॉलॉजी का प्रयोग आपके खिलाफ कुप्रचार में कर सकती है तो आप काउंटर कैसे नहीं कर पाते हैं? आप अपनी लोहिया वादी समाजवादी नीतियों या विचार धारा को ही फैला दें तो ही बड़ी बात है. आरक्षण पर बार बार वार होता है, नीति आयोग से एससी एसटी का फंड काट लिया जाता है, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोज़गार की हालत खराब है तो भी आपको मुद्दों की कमी लगती है. वो जितनी बार अयोध्या ले जाएँ आप उतनी बार रोज़गार और भुखमरी पर सवाल करो. कैसे नहीं मानेगी जनता? आपकी ही समाजवादी आर्थिक नीति पर तो कांग्रेस और बीजेपी भी कभी मनरेगा तो कभी शिक्षा और खाने का अधिकार और एक रुपए में बीमा देकर लोगों के वोट बटोरती हैं. यही तो है समाजवाद? लेकिन आप उसपर बात तक नहीं करना चाहते? हो सकता है ईवीएम गड़बड़ हो? बसपा ने तो कभी इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किया, सपा तो कभी बोल ही ना पाई? इसी प्रदेश में न जाने कितने लोग हैं जो धर्म की राजनीति नहीं चाहते लेकिन आप उनके मुद्दे उठाते ही नहीं बस आज़म ख़ान जैसे लोगों के चक्कर में बीजेपी के जाल में फँसते जाते हैं. वैसे भी अब आम आदमी पार्टी भी यूपी में आ रही है एक विकल्प के तौर पर अगर आप नहीं सुधरे तो किसी और को मौका मिलेगा.

Thursday, November 30, 2017

गुजरात में संयमित दिखती कांग्रेस

गुजरात चुनावों में जीत हासिल करने के लिए कांग्रेस संभल-संभल कदम रख रही है और अपनी खोई जमीन को पाने के लिए के लिए बीजेपी को घेरने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है. गुजरात में सबसे ज्‍यादा आबादी हिन्‍दुओं की है इसलिए कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी भी हिन्‍दू वोट पाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. इतना ही नहीं कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला करने से भी बच रही है. क्‍योंकि 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान सोनिया गांधी ने तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को 'मौत का सौदगार' कहा था जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा था.
गुजरात में 90 प्रतिशत आबादी हिन्‍दुओं की है और कांग्रेस पार्टी की नजर इन वोटरों पर है. यहीं वजह हे कि पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल, दलित आंदोलन के नेता जिग्‍नेश मेवाणी और ओबीसी आंदोलन के नेता अल्पेश ठाकोर को अपने साथ लेकर आ गई है. जब जिग्‍नेश मेवाणी ने वडगाम विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की तो कांग्रेस के वर्तमान विधायक मणिभाई वाघेला ने इस सीट से चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया. वहीं अल्पेश ठाकोर कांग्रेस में शामिल हो गए तो हार्दिक पटेल भी कांग्रेस को समर्थन का ऐलान कर चुके हैं. राहुल गांधी अपनी तरफ से भी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं इसलिए वह अब तक 20 से ज्‍यादा मंदिर जा चुके हैं और अपनी हर रैली से पहले मंदिर में जाकर मत्‍था जरूर टेकते हैं. सोशल मीडिया पर भी राहुल गांधी ने अपनी रणनीति बदली है.राहुल ने अपनी डिजिटल टीम में कई बदलाव किए हैं और दिव्या स्पंदना उर्फ राम्या को टीम की हेड बनाया है. राहुल की ये टीम सोशल मीडिया पर व्‍यक्तिगत हमलों से बच रही है और मोदी सरकार को निशाना बनाकर कैंपन चला रही हैं. इसी के तहत ही सोशल मीडिया पर कांग्रेस ने 'विकास पागल हो गया' कैंपन चलाया. राहुल गांधी अपनी रैलियों के दौरान भी किसी पर व्‍यक्तिगत हमलों से जहां तक हो बचने की कोशिश कर रहे हैं. यहीं वजह है वह सरकार के फैसलों को लेकर बीजेपी को घेर रहे हैं. जैसे जीएसटी टैक्‍स पर उन्‍होंने केन्‍द्र सरकार को 'गब्‍बर सिंह टैक्‍स' के नाम पर घेरा था और नोटबंदी समेत केन्‍द्र सरकार के कई फैसलों पर उन्‍होंने सवाल खड़े किए. गुजरात दौरे के दौरान राहुल गांधी कई बार ऐसे फैसले लिए हैं जिससे पार्टी के नेता ही नहीं उनकी सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मी भी दंग रह गए हैं. जैसे भरूच दौरे के दौरान जब एक लड़की उनकी गाड़ी के पास पहुंची तो उन्‍होंने उस लड़की को गाड़ी में ऊपर आने दिया. इसके बाद लड़की ने राहुल को बुके दिया और सेल्‍फी भी ली. इतना ही नहीं राहुल अपने दौरे के दौरान कई बार मंदिर जाने और पूजा करने का फैसला भी लिया. अब कांग्रेस में एक नया आत्‍मविश्‍वास आ गया है. राहुल गांधी अब पप्पू नहीं हैं जैसा कि ट्रेडिशनल और सोशल मीडिया में पेश किया जा रहा था. अब उन्हें अधिक गंभीरता से लिया जा रहा है, खासकर उनके बर्कले प्रवास के बाद. राहुल को लेकर मेनस्‍ट्रीम टीवी के कवरेज में भी एक बदलाव देखने को मिला है. अब पहले से बेहतर रूप से कवर किया जा रहा है और ज्यादा स्‍पेस भी दी जा रही है. दूसरा बदलाव मोदी की लोकप्रियता में एक निश्चित गिरावट के रूप में सामने आ रही है. उन्‍हें प्रत्‍यक्ष तौर पर नोटबंदी और जीएसटी को लेकर आर्थिक विकास में तेज गिरावट के लिए दोषी ठहराया जा रहा है. तीसरा और सबसे सबसे बड़ा कारण यह है कि मोदी राहुल गांधी, और कांग्रेस तथा उसके गुजरात कनेक्‍शन पर काफी हमला बोल रहे हैं. चुनावों के दौरान, मोदी सिर्फ अपने ऊपर चर्चा को केंद्रित करने में सफल रहते हैं. चाहे वह नाकारात्‍मक हो या साकारात्‍मक सबकुछ उनके इर्द-गिर्द ही घूमते रहता है. उनकी शैली ऐसी ही है कि वह अपने आसपास एक ध्रुवीकृत वातावरण बना लेते हैं जिसमें कोई उन्‍हें पसंद करे या उनसे घृणा करे लेकिन कभी भी उनकी अनदेखी नहीं कर सकता. लेकिन इस बार वह ऐसा जादू चलाने में असमर्थ दिख रहे हैं. राहुल और हार्दिक पटेल के गठबंधन ने मोदी को सकते में डाल दिया है और बीजेपी को डिफेंसिव मूड में ला दिया है. मोदी अब अपनी नीतियों पर सफाई देते नजर आ रहे हैं. 
राहुल गाँधी ने गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान कई मुद्दे उठाए हैं, जिसमें रोजगार, मकान और संसद के शीतकालीन सत्र में देरी जैसी मुद्दे उठाए. इतना ही न ही नहीं उन्‍होंने राफेल सौदा और जय शाह जैसे मुद्दों को भी अपनी चुनावी रैलियों में उठाया. 

Tuesday, November 28, 2017

वीपी सिंह एक समाजवादी नेता

राजपाट छोड़कर मांडा में एक मजदूर की ही तरह सिर पर मिट्टी ढोकर सड़क बनाने वाले, कोरांव में तालाब में फावड़े से मिट्टी खोदने वाले, एक विद्यालय में मास्टरी करने वाले और फिर उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहते एक घटना पर त्यागपत्र देने वाले, दो पहिया बुलेट मोटर साइकिल से ही पूरे देश में चुनाव प्रचार करने वाले, भ्रष्ट्राचार से लड़ने, टैक्स चोर पूंजीपतियों को देश छोड़ने पर मजबूर कर देने वाले सामाजिक न्याय के मसीहा, महान विचारक, कवि, चित्रकार और गरीबों के सबसे बड़े रहनुमा को उनकी पुण्यतिथि 27 नवम्बर पर शत्- शत् नमन, एक सच्ची श्रद्धांजलि. 
सच्चे अर्थों में वीपी सिंह, महात्मा बुद्ध (राजुमार सिद्धार्थ)के बाद  जन कल्याण के लिये अपना सब कुछ त्याग देने वाले आखिरी राजकुमार थे. आगे कई सदियों तक वीपी सिंह का नाम अमर रहेगा. राजनेताओं में वह भारत के दूसरे अम्बेडकर हैं, जिन्होंने गरीबों, पिछड़ों, दबे कुचले समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन कर भारतीय राजनीति की दिशा और दशा बदलने का काम किया है. यह अलग बात है कि बाबा साहब को मान्यवर कांशीराम ने दलितों का मसीहा बना दिया और उनके विचारों से बहुजन आन्दोलन पैदाकर राजनीति की धारा ही बदल दी. वहीं मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान से लेकर देवगौड़ा तक ने पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के पीठ में छूरा भोकने का काम किया. तीन माह पूर्व मुलायम सिंह यादव ने तो प्रेस कांन्फ्रेस कर कहा कि वीपी सिंह की ११ महींने की सरकार को उन्होंने ही गिरवाई थी. वीपी सिंह का पार्थिव शरीर जब इलाहाबाद पहुंचा तो बहन मायावती पूरे दिन वहां उपस्थित रहीं, लेकिन मुलायम वहां नजर नहीं आये.
वीपी सिंह दुबारा प्रधानमंत्री बनने से इंकार करने वाले शायद पहले राजनेता होंगे. बीमारी के बावजूद भूमि अधिग्रहण के विरोध में पूर्व प्रधान मंत्री वीपी सिंह स्वयं ट्रैक्टर चलाकर दादरी (उ.प्र.) अधिग्रहीत जमीन की जुताई करने पहुंच गए और पहली बार इस देश में किसान और उनका मुद्दा राजनीति की मुख्यधारा में पहुंचा. सहकारी बैंक से कर्जदार किसानों का कर्ज माफ करने वाले वह पहले प्रधानमंत्री थे..
आज जिस टैक्सचोरी रोकने व काले धन की बात की जा रही है, उस पर सबसे पहले वीपी सिंह ने ही लगाम लगाने की पहल की थी. जब धीरुभाई अम्बानी, अमिताभ बच्चन के भाई अजिताभ बच्चन सहित सैकड़ों टैक्सचोर भागकर विदेश में शरण लिये हुये थे, तब यही भाजपा वालों ने पूंजीपतियों को लेकर कमंडल रथ निकाला और एक ईमानदार प्रधानमंत्री को हटाकर ही दम लिया. वीपी सिंह एक मोटरसाइकिल से पूरे देश में प्रचार कर साबित कर दिया था कि उन्हें किसी टैक्स चोर के पैसे की जरुरत नहीं.
अयोध्या विवाद और आरक्षण आंदोलन के केंद्र रहे पूर्व पीएम वीपी सिंह की आज पुण्यतिथि है। वीपी वही 'कमज़ोर' प्रधानमंत्री थे जिन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं, जिन्हें इंदिरा जैसी 'ताकतवर' नेता तक लागू करने से बचती रही। सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण वीपी की सरकार ने ही सुनिश्चित किया। देश की सड़कों पर नाराज़ सवर्ण युवकों का हुजूम था। वो खुद को आग लगा रहे थे। जिस राजपूत समाज के वो नेता थे उसने भी उनमें अब दुश्मन खोज निकाला था। कहा जाता है कि डिप्टी पीएम देवीलाल की सियासी चुनौती ने उन्हें ओबीसी का दामन थामने को मजबूर किया था लेकिन वाकई वीपी जानते तो थे ही कि वो कितना बड़ा चैलेंज ले रहे हैं। पत्रकार कुलदीप नैयर कहते हैं कि वीपी ने उनसे एक बार कहा था कि भले ही अपनी एक टांग गंवा दी हो, लेकिन उन्होंने गोल करके ही दम लिया। 
एक बार अटल बिहारी वाजपेयी ने कुलदीप नैयर से कहा था कि मंडल ना होता तो कमंडल भी ना होता। हालांकि आडवाणी अपनी आत्मकथा में ऐसा नहीं मानते, बल्कि वो तो बार बार कहते हैं कि उनके चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर का मुद्दा था, तो ऐसे में जब भाजपा वीपी का साथ दे रही थी तो गठबंधन धर्म का पालन करते हुए उन्हें भी इस मुद्दे पर संवेदनशीलता बरतनी चाहिए थी। बहरहाल, सबने देखा कि वीपी ने कोई मुरव्वत नहीं की। वैसे आरोप ये भी लगता रहता है कि वीपी ने रथ को शुरू में ही क्यों नहीं रोका। रथ चलते ही देश में दंगे भड़कने लगे थे लेकिन वीपी भाजपा के समर्थन से मिली कुरसी पर चुप्पी लगाए बैठे रहे। आखिरकार वीपी एक राजनेता ही तो थे। आडवाणी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि बंबई के एक्सप्रेस टॉवर्स की एक बैठक में वीपी ने सबके सामने कहा था- 'अरे भाई, मस्जिद है कहां? वह तो अभी मंदिर है। पूजा चल रही है। वह इतना जर्जर है कि एक ही धक्के में नीचे गिर जाएगा। उसे ढहाने की ज़रूरत ही क्या है?' अरुण शौरी ने भी 1990 में इस बैठक पर एक लेख लिखा था। ज़ाहिर है, वीपी स्थिति समझ तो रहे ही थे। वीपी ने अयोध्या मसले का हल निकालने के लिए राम जन्मभूमि से जुड़े संतों से 4 महीने का वक्त मांगा था, वो फेल रहे। इसके बाद संघ ने कारसेवा की घोषणा कर दी। आडवाणी ने इसी के बीच में गुंजाइश देखी और प्रमोद महाजन के सुझाव से रथयात्रा का आरंभ हुआ। डॉ कोनराड एल्स्ट अपनी किताब में बताते हैं कि वीपी सिंह के मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के फैसले से कुछ लोग इतने आक्रोशित थे कि उन्होंने आडवाणी की रथयात्रा तक पर पत्थर फेंके। भाजपा वीपी सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी इसलिए आक्रोशित सवर्णों की नज़र में वो इस फैसले का हिस्सा ही थी। वहीं वीपी भी किसी तरह इस विवाद को सुलझाने में जुटे थे। एस गुरुमूर्ति सरकार और मंदिर आंदोलन के नेताओं के बीच वार्ताकार बने थे। वो देशभर में घूम घूम कर धार्मिक गुरूओं से मिल रहे थे। खैर, बाद में किसी भी मसौदे पर सहमति बन पाने से पहले ही लालू सरकार के हाथ आडवाणी गिरफ्तार हो गए, नतीजतन सरकार संकट में आ गई। आज तक अयोध्या विवाद देश का सबसे ज्वलनशील मुद्दा है। किरदार बदल गए हैं लेकिन समस्या जस की तस है। प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अपने कैबिनेट तक में आधी सीटें पिछड़ा वर्ग को दे दी थीं। ये वीपी थे जिन्होंने बाबासाहेब अंबेडकर का चित्र संसद के केंद्रीय सभागृह में लगवाया और उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया। खुद को भारत रत्न देनेवाले नेहरू और इंदिरा ने कभी बाबासाहेब को भारत रत्न देने योग्य क्यों नहीं समझा ये तो जाना नहीं जा सकता लेकिन वीपी ने कृतज्ञ देश की ओर से उन्हें भारत रत्न दिया। वीपी की राजनीति खत्म हो गई लेकिन उनके फैसलों का असर आज भी देश पर बना हुआ है।

Wednesday, November 15, 2017

गुजरात में बदले दिखे राहुल

गुजरात में राहुल गांधी एक नए अंदाज़ में हैं. इस बार राहुल गांधी का फोकस खास तौर पर पिछड़ों, दलितों आदिवासी और मुस्लिमों पर है. शायद राहुल गांधी को पाटीदारों के वोटों पर उतना भरोसा नहीं है. शायद उन्हें लगता है कि पाटीदार परंपरागत तौर पर बीजेपी को वोट देते आए हैं. पहले भी गुजरात में कांग्रेस खाम का फार्मूला अपना चुकी है यानी क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम, मगर इस बार राहुल पोडा (पाटीदार, ओबीसी, दलित, आदिवासी) पर फोकस कर रहे हैं. गुजरात में पाटीदार 12 से 15 प्रतिशत है जबकि 14 फीसदी आदिवासी, 9 फीसदी मुस्लिम और 7 फीसदी दलित हैं. राहुल आदिवासी इलाकों में जाते हैं तो किसी आदिवासी युवक को मंच पर बुला कर भाषण दिलवाते हैं. राहुल को मालूम है कि जीएसटी यानी 'गब्बर सिंह टैक्स' हिट हो गया है, इसलिए इस मुहावरे का खूब इस्तेमाल करते हैं. यही नहीं, इस बार राहुल अपने ट्वीट को ले कर भी काफी सुर्ख़ियों में हैं. लगता है कि ट्वीट के किये राहुल ने कोई खास टीम तैयार की है. राहुल का हर ट्वीट खबर बनता है जिससे उनकी इमेज भी मीडिया में बदल रही है. ज़ीएसटी में जो सरकार ने बदलाव किया है उसका भी श्रेय राहुल खुद को देते हैं. राहुल अपने भाषण में एक संवाद पैदा करने की कोशिश करते हैं. वह लोगों से पूछते हैं कि घर देने का वायदा किया गया, मिला कि नहीं और लोग जवाब भी देते हैं. दरअसल दो दशकों से बीजेपी गुजरात में सत्ता में है, यही उसकी मुसीबत भी बन गयी है. कई जगह लोग अब बदलाव की बात भी करने लगे हैं. उन्हें लगता है कि कांग्रेस को भी एक चांस मिलना चाहिए.
राहुल की राह को वाघेला ने भी आसान बना दिया है. वाघेला ने कांग्रेस की राह आसान कर दी है. दरअसल वाघेला कांग्रेस में रहते तो राहुल पर अतिरिक्त भार पड़ता क्योंकि वाघेला कम से कम अपने समर्थकों के लिए 40 सीट जरूर ले जाते ताकि जरुरत पड़ने पर मुख्यमंत्री की दावेदारी पेश की जा सके. मगर अब यह हालत नहीं है. यही वजह है कि राहुल गांधी को टिकट बांटने में आसानी होगी. वह बिना किसी दबाव में आए टिकट बांट सकते हैं. दरअसल राहुल गुजरात में सांप्रदायिक ध्रुविकरण से बचना चाहते हैं. उन्हें लगता है इस पर वो बीजेपी से जीत नहीं सकते, यही वजह है कि राहुल मंदिरों की खाक तो छान रहे हैं मगर मस्जिदों पर नज़र भी नहीं डालते हैं. कांग्रेस ने राहुल की सॉफ्ट हिंदुत्व की छवि बनाई है. राहुल के पक्ष में हार्दिक पटेल हैं जो पाटीदार हैं, ओबीसी नेता के रूप में कांग्रेस में भारत सिंह सोलंकी हैं और साथ में अल्पेश ठाकोर रभी हैं, दलित नेता के रूप में जिग्नेश मेवानी हैं तो आदिवासी नेता के रूप में छोटू भाई वसावा हैं, जिसके वोट से अहमद पटेल ने राज्यसभा का चुनाव जीता था. कुल मिला कर राहुल गांधी को समझ में आ गया है कि लालू का माय हो, खाम हो या पोड़ा हो, यदि चुनाव जीतना है तो एक समीकरण का चलना जरूरी है.

आख़िर जीएसटी पर भी पीछे क्यों भागी सरकार?

जीएसटी की भी नोटबंदी जैसी गत बन रही है. नोटबंदी में जिस तरह से रोज़रोज़ रद्दोबदल करने पड़े थे उसी तरह से जीएसटी में भी शुरू हो गए. नोटबंदी में जैसी बार बार बदनामी हुई थी वैसी अब जीएसटी में होने लगी. अलबत्ता सरकार का पूरा अमला प्रचार करने में लगाया गया है कि जीएसटी की वसूली के रेट कम करने को जनता के लिए बड़ी राहत के तौर पर प्रचारित किया जाए. टीवी पैनल की चर्चाओं में यह बात खासतौर पर चलवाई जा रही है कि इससे गुजरात के व्यापारियों की नाराज़गी कम हागी. इस तरह से आरोप की शक्ल में इस प्रचार पर जो़र है कि गुजरात चुनाव के मददेनज़र यह फैसला किया गया है.                  
पहला सवाल यह कि क्या वाकई यह टैक्स गब्बर सिंह जैसा था जिसे अब कम भयावह बनाने का ऐलान हुआ है. अगर ऐसा है तो यह सवाल सबसे पहले कौंधेगा कि यह भारी भरकम टैक्स लगाया किसने था? जब लगाया गया था तब तर्क दिया गया था कि सरकार को देश के हित में बहुत सी योजनाएं चलानी पड़ती हैं. उसके लिए पैसे की जरूरत पड़ती है सो ऐशोआराम की चीज़ों पर ज्यादा टैक्स तो लगाना ही पड़ेगा. सो नया सवाल यह पैदा हुआ है कि ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स घटाने से अब देश हित की योजनाएं चलाने में कमी नहीं आ जाएगी क्या? गौरतलब है कि खासतौर पर ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स वसूली के रेट घटाने से सरकार के ख़ज़ाने में बीस हजार करोड़ रुपए कम पहुंचेंगे.
जनता को 20 हजार करोड़ का यह तोहफा देने के लिए सरकार पैसा कहां से जुटा लाई. एक सरल सा जवाब है कि सरकार ने चार महीने पहले जो टैक्स वसूली की नई योजना बनाई थी उससे एक लाख करोड़ की वसूली की योजना थी वह वसूली कम कर दी गई है. यानी, देश के हित में सरकार ने जनता के सिर पर जो बोझ लादा था उस बोझ में कटौती का एलान किया है. इस तरह से क्या यह बहस शुरू नहीं हो जाएगी कि जनता को जो बेजा सज़ा का ऐलान हुआ था उस सज़ा में कटौती हो गई है.
नोटबंदी से मची भारी अफरातफरी और भारी घाटे का काम साबित होने के बाद जीएसटी से भी चारों तरफ परेशानियों का अंबार खड़ा होता जा रहा था. व्यापारी और उपभोक्ता दोनों परेशान हैं. हालांकि व्यापारी टैक्स के रेट से परेशान नहीं थे क्योंकि उन्हें टैक्स अपने पास से नहीं बल्कि नागरिकों से उगाही कर जमा करना था. व्यापारी लोग टैक्स भरने की समय खपाऊ और हिसाब बनाने की खर्चीली प्रक्रिया से परेशान हैं. सो उनके लिए भी सरकार ने टैक्स के कागज़ तैयार करने का बोझ कुछ कम कर दिया. क्या इसे पहले नहीं सोचा जा सकता था? इस तरह सरकार खुद को नौसिखिया साबित करवा रही है. बिल्कुल उसी तरह जिस तरह नोटबंदी में साबित हुई थी. जानकार लोग नफे नुकसान का हिसाब भी बैठा रहे हैं. व्यापारी और नागरिक बेजा तरीके से खा न पाएं उससे सरकार को जितना पैसा बच सकता है उससे कई गुना उस चोरी न हो पाने का इंतजाम करने में खिन्न होकर बर्बाद तो नहीं हो रहा है? इसलिए, एक हिसाब लगना चाहिए कि गोदाम में जितने का माल है उसकी चौकीदारी पर उससे ज्यादा खर्चा तो नहीं बैठ रहा है. यानी, जीएसटी और नोटबंदी के जरिए ऐसी चौकीदारी घाटे का सौदा तो नहीं बन रही है. वैसे इसका पता आम बजट पेश होते समय चलेगा.
केंद्र और राज्य सरकारें अपने पास संसाधनों का रोना रोती रहती हैं. वे तरह तरह के जो टैक्स वसूलती थीं उसकी जगह एक ही टैक्स की व्यवस्था बनाने पर रजामंदी बनाई गई थी. यह रजामंदी इस आश्वासन पर बनी थी कि राज्यों को नई व्यवस्था से अगर कोई घाटा हुआ तो केंद्र सरकार उसकी भरपाई का इंतजाम करेगी. वैसे तो राज्य सरकारें बिल्कुल भी जोखिम उठाने को राजी नहीं होतीं लेकिन राजनीतिक परिदृश्य ऐसा है कि ज्यादातर राज्यों में भी भाजपा की ही सरकारें काबिज़ हैं. सो राज्य सरकारों की तरफ से केंद्र की इच्छा, मंशा या योजना पर नानुकुर करने का कोई सवाल ही नहीं उठता लेकिन राज्यों के संसाधनों में कमी को आखिरकार उन्हें ही झेलना पड़ता है. वे किस तरह से झेलेंगी यह भी आने वाले दिनों में पता चलेगा. जीएसटी से नया हाहाकार न मचने लगे इसे दोनों प्रकार की सरकारों को सोचकर रखना पड़ेगा. और भारतीय लोकतंत्र की जनता को बजट तक इंतजा़र करना पडे़गा कि जीएसटी लागू होने के तोहफे से उसने क्या खोया पाया. खासतौर पर जीएसटी के 28 फीसद टैक्स वाले स्लेब की चीजों पर टैक्स घटने से गरीब जनता को  क्या हासिल होगा?
नोटबंदी के नियमों में बार बार बदलाव की तरह जीएसटी में भी बार बार बदलाव के नफे नुकसान पर मीडिया में रोचक बहसें हो रही हैं. सरकार के तरफदार विशेषज्ञों की सबसे दिलचस्प थ्योरी यह है कि जीएसटी की कंपलायंस यानी इसके मुताबिक टैक्स जमा होने में दिक्कत आ रही थी. उनका तर्क है कि ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स कम होने से टैक्स जमा करने वालों की संख्या बढ़ जाएगी. इस तरह से उन्होंने दिलासा दिलाना शुरू किया है कि बदले ऐलान से सरकार के खजाने को 20 हजार करोड़ से कम का ही नुकसान होगा. ऐसा तर्क देने वाले क्या उस समय यह तर्क नहीं दे सकते थे जब 28 फीसद टैक्स वाली स्लैब बनाई गई थी. तब तो यह तर्क दिया गया था कि गरीब जनता के लिए अच्छी योजनाओं के लिए पैसा चाहिए और यह पैसा ऐशो आराम से रहने वालों पर टैक्स से लिया जा सकता है. चार महीने में ही थ्योरियां बदल गईं.

Friday, October 20, 2017

गुजरात की युवा तिकड़ी

गुजरात विधानसभा चुनावों के नज़दीक आते-आते राजनीतिक सरगर्मियां तेज़ हो गई हैं. सभी राजनीतिक दल गुजरात में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं. बीजेपी ने भी गुजरात में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. पार्टी कोई भी ऐसा कारण नहीं छोड़ना चाहती जो किसी तरह के बुरे परिणाम का नतीजा बने. ऐसा कहा जा रहा कि पिछले दो सालों में उभरकर सामने आए पाटीदार, ओबीसी और दलित समुदायों को प्रभावित करने वाले तीन युवा बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, दलित नेता जिग्नेश मेवाणी और ओबीसी नेता अल्पेश ठाकुर गुजरात की राजनीति का अहम हिस्सा बन गए हैं.
साल 2015 में पटेल आरक्षण की मांग के बाद हार्दिक पटेल का नाम तेज़ी से उभरकर सामने आया. इस आंदोलन को दबाने की गुजरात सरकार की कोशिशों के बावजूद अभी तक यह मांग शांत नहीं हुई है.
पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के संयोजक हार्दिक पटेल किसी भी पार्टी में न शामिल होने की बात कह चुके हैं. हार्दिक पटेल ने सार्वजनिक तौर पर बीजेपी को आरक्षण न देने के लिए दोषी ठहराया है. अमित शाह को गुजरात गौरव यात्रा के दौरान पाटीदार युवाओं का विरोध भी झेलना पड़ा था. साथ ही हार्दिक पटेल ने कांग्रेस की तरफ़ झुकाव भी प्रकट किया है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के गुजरात जाने पर हार्दिक ने ट्वीट करके उनका स्वागत किया था. ऐसे में बीजेपी की चिंताएं बढ़ना लाज़मी है. पाटीदार भले ही 12 प्रतिशत का वोट शेयर रखते हों लेकिन अपनी आर्थिक ताक़त के कारण वो ​स्थितियां प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं. शुरुआत में इस आंदोलन का विरोध करने के बाद आज बीजेपी पाटीदारों का वोट पाने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है. आंदोलन में शामिल पाटीदार नेताओं के ख़िलाफ़ केस वापस लिए गए हैं और अनामत आंदोलन समिति के सदस्यों पर हुए पुलिस अत्याचार की जांच के लिए समिति का निर्माण किया गया है. हालांकि, इसके बावजूद भी हार्दिक पटेल का रुख़ बीजेपी के प्रति नरम पड़ता नहीं दिख रहा है. राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के संयोजक जिग्नेश मेवाणी राज्य में दलितों पर हो रहे हमलों के लिए गुजरात सरकार को ज़िम्मेदार मानते हैं. लगातार दलितों पर हुए हमले की ख़बरों के बाद बीजेपी की छवि का पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक भी है. गुजरात में युवा दलित नेता के तौर पर उभरे जिग्नेश पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. ऊना में गोरक्षा के नाम पर दलितों की पिटाई के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन का जिग्नेश ने नेतृत्व किया था. 'आज़ादी कूच आंदोलन' में जिग्नेश ने 20 हज़ार दलितों को एक साथ मरे जानवर न उठाने और मैला न ढोने की शपथ दिलाई थी. इस आंदोलन में दलित मुस्लिम एकता भी दिखाई दी थी.
जिग्नेश मेवाणी का कहना है, ''राज्य में दलित पर हो रहे हमलों को रोकने और उनकी स्थिति में सुधार के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है. बीजेपी का हिंदुत्व का एजेंडा है और इस सरकार के रहते उनका भला नहीं हो सकता.'' मेवाणी साफ़-साफ़ कहते हैं, ''इस बार बीजेपी को हर क़ीमत पर हराया जाना चाहिए.'' हालांकि, वह अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर कुछ भी साफ़ तौर पर नहीं कह रहे हैं. राज्य में दलितों का वोट प्रतिशत क़रीब सात फ़ीसदी है. राज्य की कुल आबादी लगभग 6 करोड़ 38 लाख है, जिनमें दलित 35 लाख 92 हज़ार के क़रीब हैं. गुजरात में दलितों का प्रतिनिधित्व बहुत ज्यादा न होने के बावजूद भी चुनाव में हर एक वोट बहुत कीमती होता है. ऐसे में बीजेपी के लिए जिग्नेश मेवाणी मुसीबत ला सकते हैं. ओबीसी नेता के तौर पर उभरे अल्पेश ठाकुर पाटीदारों को आरक्षण देने का विरोध करते रहे हैं. साथ ही वह देसी शराब से होने वाले नुक़सान के चलते शराबबंदी के पक्षधर रहे हैं. ओबीसी, एससी और एसटी एकता मंच के संयोजक अल्पेश ठाकुर ने अलग-अलग मंचों से गुजरात की हालत ख़राब होने की बात कही है. वह कहते हैं कि विकास सिर्फ दिखावा है. गुजरात में लाखों लोगों के पास रोज़गार नहीं है. ओबीसी का वोट प्रतिशत 40 है जो पाटीदार और एससी व एसटी से कहीं ज्यादा है. ऐसे में बीजेपी के लिए ये वर्ग और महत्वपूर्ण हो जाता है. लेकिन, पाटीदारों को आरक्षण देने के मसले पर बीजेपी और उनकी राय एक होने के चलते अल्पेश ठाकुर का झुकाव बीजेपी की तरफ जाने की संभावना है. उनका रुख साफ़ नहीं है. लेकिन, अगर वो बीजेपी की तरफ जाते हैं तो उनके सपोर्ट बेस में दरार पड़ सकती है. अल्पेश का बीजेपी की तरफ झुकाव होना मुश्किल है. क्योंकि बीजेपी ने पाटीदारों को जो लाभ दिए हैं वो ओबीसी को नहीं दिए हैं. इन तीनों नेताओं के उभरने की कहानी निजीकरण से शुरू होती है. जब पीएम नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने वाइब्रेंट गुजरात की बात की.उस समय काफ़ी निजीकरण हुआ. बहुत सारे निजी शैक्षणिक संस्थान आ गए. बहुत बड़े-बड़े समिट होने लगे जिनमें बड़े स्तर पर निवेश होने और रोजगार के अवसर खुलने की बातें कही गईं. लोगों को सुखद भविष्य के सपने दिखाए गए. लोगों ने अपने बच्चों को उन्हीं प्राइवेट इंस्टीट्यूट में महंगी फीस देकर पढ़ाया. लेकिन, जब उनके बच्चे बाज़ार में आए तो उन्हें नौकरी ही नहीं मिली. नौकरी मिली भी तो 5-6 हज़ार की.  'सरकार की कथनी और करनी के अंतर की वजह से युवाओं में निराशा और ग़ुस्सा भर गया है. पाटीदार एक संपन्न वर्ग है. जब उनके बच्चे भी सड़क पर उतरे हैं तो दूसरों का क्या हाल होगा.' घनश्याम दास कहते हैं, ''बीजेपी को ओबीसी से मुश्किल ज़रूर होगी. दलित नेता के तौर पर उभरे जिग्नेश का रुख साफ़ नहीं है कि वह किस तरफ जाएंगे. उन्होंने कांग्रेस की तरफ भी झुकाव नहीं दिखाया है.'' बीजेपी पर गुजरात में चुनौतियां का असर दिखने लगा है तभी बीजेपी नेता लगातार गुजरात दौरे कर रहे हैं.

Saturday, October 14, 2017

भूख से हारता भारत

विश्व की महाशक्ति बनने का सपना देखने वाले भारत के लोग खाने जैसी बेसिक नेसेसिटी (बुनियादी जरूरत) से महरूम हैं ये एक बड़ी विडंबना ही कही जा सकती है. देश डिजिटल क्रांति के जरिए वर्ल्ड लीडर के तौर पर बढ़ता दिख रहा है और आने वाले सालों में सबको घर, सबको बिजली जैसे ‘न्यू इंडिया’ की उम्मीदें लगाए बैठा है, लेकिन दुनिया के सारे देशों में से जहां के लोग अपने पेट भरने की रोज की जरूरत को भी पूरा नहीं कर पाते ऐसे देशों में से सिर्फ 19 देशों से आगे है. इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) के मुताबिक, भारत में भूख एक ‘‘गंभीर’’ समस्या है और 119 देशों के वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 100वें पायदान पर है. भारत उत्तर कोरिया और बांग्लादेश जैसे देशों से पीछे है लेकिन पाकिस्तान से आगे हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चों में कुपोषण (मेल न्यूट्रीशन) की उच्च दर से देश में भूख का स्तर इतना गंभीर है कि पिछले साल भारत इस इंडेक्स में 97वें स्थान पर था और अब 100वें स्थान पर है. यानी इस साल वर्ल्ड हंगर इंडेक्स में भारत और 3 स्थान पीछे चला गया है. आईएफपीआरआई ने एक बयान में कहा, ‘‘119 देशों में भारत 100वें स्थान पर है और समूचे एशिया में सिर्फ अफगानिस्तान और पाकिस्तान उससे पीछे हैं.’’ उन्होंने कहा, ‘‘31.4 के साथ भारत का 2017 का जीएचआई (वैश्विक भूख सूचकांक) अंक ऊंचाई की तरह है और ‘गंभीर’ श्रेणी में है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत चीन (29), नेपाल (72), म्यामांर (77), श्रीलंका (84) और बांग्लादेश (88) से भी पीछे है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान क्रमश: 106वें और 107वें स्थान पर हैं. जाहिर तौर पर राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर इसे सुधारने के लिए मजबूत प्रतिबद्धता दिखाने की जरूरत है. हाल ही में फोर्ब्स की सबसे धनवान भारतीयों की लिस्ट में दिखा था कि देश के सबसे धनवानों की संपत्ति में पिछले साल के मुकाबले काफी इजाफा हो चुका है. वहीं कल ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत के और नीचे खिसकने से यही आकलन किया जा सकता है कि अमीर और अमीर हो रहे हैं और गरीब और गरीब और गरीब हो रहे हैं. देश के टॉप 100 धनी व्यक्तियों की संपत्ति में 26 फीसदी का इजाफा हुआ है. रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी लगातार 10वें साल भारत के सबसे अमीर व्यक्ति रहे और उनकी प्रॉपर्टी बढ़कर 38 अरब डॉलर (करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये) पर पहुंच गई है. अमीरों की संपत्ति का आकलन करने वाली पत्रिका फोर्ब्स की वार्षिक सूची ‘इंडिया रिच लिस्ट 2017’ में यह जानकारी दी गयी थी.
दुनिया के देशों में लोगों को खाने की चीज़ें कैसी और कितनी मिलती हैं?, ग्लोबल हंगर इंडेक्स इसे दिखाने का माध्यम है. हर साल नए आंकड़ों, नए डेटा कलेक्शन के आधार पर ही ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ की लिस्ट निकाली जाती है. इस इंडेक्स में दिखाया जाता है कि दुनिया भर में भूख के खिलाफ चल रही देशों की लड़ाई में कौनसा देश कितना सफल और कितना असफल रहा है. साल 2006 में सबसे पहले वेल्ट हंगरलाइफ नाम के जर्मनी के स्वयंसेवी ऑर्गेनाइजेशन ने ग्लोबल हंगर इंडेक्स जारी किया था, इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के तहत ये काम किया जाता है. इसे सुधारने के लिए सभी राज्यों, सरकारों और सामाजिक संगठनों को मैराथन प्रयास करने होंगे वर्ना ‘इंडिया’ और ‘भारत’ के बीच की खाई को पाटना लगभग-लगभग असंभव हो जाएगा और अमीर-गरीब (वंचितों) के बीच बढ़ते फासले को मिटाने का सरकार का सपना, सपना ही रह जाएगा. एक न्यूक्लियर सुपरपावर देश की बड़ी जनसंख्या खाने जैसी फंडामेंटल जरूरत और हक से भी महरूम हैं जो बेहद गंभीर और चिंताजनक स्थिति कही जा सकती है.
एक और जहां भारत भूख की गंभीर समस्या से जूझ रहा है, वहीं दूसरी और देश में बड़े पैमाने पर खाने की बर्बादी की जाती है. खाने की बर्बादी भुखमरी का एक अहम कारण है. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 40 फ़ीसदी खाना बर्बाद हो जाता है. इन्हीं आंकड़ों में कहा गया है कि यह उतना खाना होता है जिसे पैसों में आंके तो यह 50 हज़ार करोड़ के आसपास पहुंचेगा. आंकड़ों पर ना भी जाएं, तो भी हम रोज़ाना अपने आस-पास ढेर सारा खाना बर्बाद होते हुए देखते ही हैं. शादी, होटल, पारिवारिक और सामाजिक कार्यक्रमों, यहां तक की घरों में भी कितना खाना यू हीं फेंक दिया जाता है. अगर ये खाना बचा लिया जाए और ज़रूरतमंदों तक पहुंचा दिया जाए तो कई लोगों का पेट भर सकता है.  संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में खाने का पर्याप्त उत्पादन होता है, लेकिन ये खाना हर जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पाता. भूख से पीड़ित दुनिया की 25 फ़ीसदी आबादी भारत में रहती है. भारत में करीब साढ़े 19 करोड़ लोग कुपोषित हैं. इसमें वो लोग भी हैं जिन्हें खाना नहीं मिल पाता और वो लोग भी हैं जिनके खाने में पोषण की कमी होती है. खाने की बर्बादी रोकने के लिए हर इंसान को व्यक्तिगत रूप से ज़ागरुक होने की ज़रूरत है. जितना खाना है उतना ही लें. अगर घर में खाना बच जाता है तो अपने आस-पास किसी ज़रूरतमंद को दें. शादी, पार्टी, होटल में भी ऐसा ही किया जा सकता है, वैसे कई संस्थाएं ऐसी हैं जो लोगों का बचा हुआ खाना एकत्रित करके उसे ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंचाने का दावा करती हैं. ऐसी ही एक संस्था रॉबिन हुड आर्मी को शुरू करने वाले संचित जैन बताते हैं कि दिल्ली की एक शादी में बचे खाने से कई बार पांच सौ से ढाई हज़ार लोगों का पेट भर जाता है. संचित जैन खाने की चीज़ों की बर्बादी की वजह सप्लाई चेन का कमज़ोर होना बताते हैं. वो कहते हैं खेतों से अनाज निकलकर मंडी तक तो पहुंच जाता है, लेकिन भंडारण की सुविधाएँ अच्छी नहीं होने और समय पर आगे सप्लाई नहीं किए जाने की वजह से मंडियों में ही सड़ जाता है. रॉबिन हुड आर्मी का दावा है कि वे होटलों से एकत्रित किया हुआ खाना झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोगों तक पहुंचाते हैं. वैसे सच्चाई यही है कि गैर-सरकारी संस्थाओं के अलावा सरकार भी कई बार खाने की बर्बादी पर चिंता जता चुकी 

लोहिया जी का व्यक्तित्व

जेपी तो 1953 से ही सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर दलविहीन लोकतंत्र और ‘सर्वोदय’ का प्रयोग कर रहे थे. ऐसे में वे लोहिया ही थे जिन्होंने विपक्ष क्या होता है और उसे क्या करना चाहिए, का पाठ भारतीय लोकतंत्र को सिखाया. अपने प्रयासों से उन्होंने आजादी के बाद एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस को अपनी मौत से ठीक पहले यानी 1967 तक पानी पीने पर मजबूर कर दिया. लेकिन ऐसा करने के लिए उन्होंने अपने मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. राम मनोहर लोहिया की रचनात्मक राजनीति और अद्भुत नेतृत्व क्षमता का प्रभाव इतना दूरगामी रहा कि उनके जाने के करीब 20 सालों बाद ही उनके सिद्धांतों को मानने वाली कई पार्टियां भारतीय लोकतंत्र के पटल पर छाने लगीं. ‘सामाजिक न्याय’ की उनकी संकल्पना तो आज राजनीति का मूल सिद्धांत बन चुकी है. यह राम मनोहर लोहिया की ही दूरदर्शिता थी कि तमाम वंचित जातियों और वर्गों की धीरे-धीरे ही सही, सभी क्षेत्रों में हिस्सेदारी बढ़ रही है. बताया जाता है कि लोहिया शुरू में नेहरूवादी थे और गांधीवादी वे बाद में बने. मतलब यह है कि शुरू में वे गांधी की तुलना में नेहरू से ज्यादा प्रभावित थे. बाद में नेहरू से उनका मोहभंग होता गया और गांधी के सिद्धांतों और कार्यनीतियों पर उनका भरोसा बढ़ता गया. उच्च शिक्षा के दौरान जर्मनी में राम मनोहर लोहिया की राजनीतिक सक्रियता की जानकारी कांग्रेस के नेताओं विशेषकर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को भी थी. इसलिए 1933 में पीएचडी करने के बाद देश लौटने पर नेहरू ने उन्हें कांग्रेस की विदेश मामलों की समिति में रखा था. अगले दो सालों तक उन्होंने भविष्य के भारत की विदेश नीति तय करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. इसलिए उन्हें भारत का पहला गैर-आधिकारिक विदेश मंत्री भी कहा जाता है. आजादी के बाद देश ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे निर्धारित करने में लोहिया का महत्वपूर्ण योगदान था. कांग्रेस मॉडल के तहत कांग्रेस का सदस्य रहते हुए कोई किसी अन्य संगठन का भी सदस्य बन सकता था. इसलिए समाजवादी विचारधारा से प्रभावित जयप्रकाश नारायण जैसे कई कांग्रेसी नेताओं ने मई 1934 में ‘कांग्रेस समाजवादी पार्टी’ की नींव डाली. लोहिया का इसमें महत्वपूर्ण योगदान था. लेकिन नेहरू से लोहिया के संबंध 1939 के बाद खट्टे होने लगे. संबंधों के खराब होने की शुरुआत दूसरे विश्वयुद्ध में भारत के शामिल होने के सवाल पर हुई. लोहिया चाहते थे कि अंग्रेजों की कमजोर स्थिति को और कमजोर करने के लिए भारत को युद्ध में शामिल नहीं होना चाहिए. उधर, नेहरू चाहते थे​ कि भारतीय सेना इस महायुद्ध में अंग्रेजों का साथ दे. नौ अगस्त 1942 को जब भारत छोड़ोंं आंदोलन छेड़ा गया तो अंग्रेजों ने पूरे देश में कांग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया. ऐसा लगा अब यह आंदोलन विफल हो जाएगा. लेकिन कांग्रेस के भीतर जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेताओं ने आंदोलन का अगले दो सालों तक सफलतापूर्वक नेतृत्व किया. आंदोलन की घोषणा होते ही मुंबई में एक भूमिगत रेडियो स्टेशन से आंदोलनकारियों को ​दिशा-निर्देश दिए जाने लगे थे. ऐसा करने वाले कोई और नहीं लोहिया थे. अंग्रेज जब तक उस रेडियो स्टेशन को ढूंढ़ पाते तब तक लोहिया कलकत्ता जा चुके थे. वहां वे पर्चे निकालकर लोगों का नेतृत्व करने लगे. उसके बाद वे जयप्रकाश नारायण के साथ नेपाल पहुंच गए. वहां पर ये लोग ‘आजाद दस्ता’ बनाकर आंदोलनकारियों को सशस्त्र गुरिल्ला लड़ाई का प्रशिक्षण देने लगे. अंग्रेजों को दो सालों तक छकाने के बाद जेपी और लोहिया मई 1944 में पकड़ लिए गए. इन दोनों पर मुकदमा चला और वे लाहौर जेल में बंद कर दिए गए. यहां से वे लोग अप्रैल 1946 में ही छूट पाए. जेल में अंग्रेजों ने लोहिया को जमकर यातनाएं दी थीं जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था. लोहिया ने अपनी किताब ‘विभाजन के गुनहगार’ में बताया है कि दो जून 1947 की बैठक में वे और जेपी विशेष आमंत्रित सदस्य थे. बैठक का नजारा ऐसा था मानो नेहरू और पटेल पहले से सब कुछ तय कर आए हों. महात्मा गांधी के विरोध करने के बाद नेहरू और पटेल ने कांग्रेस के सभी पदों से इस्तीफा दे देने की धमकी दे दी. लोहिया लिखते हैं कि तब गांधी के पास विभाजन के प्रस्ताव पर मौन सहमति देने और विभाजन के गुनहगारों में शामिल हो जाने के सिवाय दूसरा कोई विकल्प नहीं बच गया था. गांधी के मरने के बाद कांग्रेस मॉडल को नेहरू ने 1948 में खत्म कर दिया. कांग्रेस के समाजवादी नेताओं को पार्टी का विलय कांग्रेस में करने या कांग्रेस छोड़ने का विकल्प दिया गया. लोहिया को तो नेहरू ने कांग्रेस पार्टी का महासचिव बनाने का प्रस्ताव दिया. लेकिन उन्होंने अन्य समा​जवादियों जिनमें जेपी भी शामिल थे, के साथ कांग्रेस छोड़ने का विकल्प चुना. यह समझते हुए भी कि कांग्रेस की छवि देशवासियों के दिलोदिमाग पर छप चुकी है और उसे हटाना आसान नहीं है, खासकर तब जब कोई स्थापित संगठन न हो और न ही मजबूत आर्थिक समर्थन. लेकिन लोहिया और उनके साथियों ने लोकतंत्र के हित मेंं विपक्ष की आवाज बनने और उसे बुलंद करने का फैसला लिया. इसका परिणाम 1948 में ‘सोशलिस्ट पार्टी’ के गठन के रूप में हुआ. फिर 1952 में जेबी कृपलानी की ‘किसान मजदूर पार्टी’ के साथ विलय करके ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ का निर्माण किया गया. हालांकि मतभेदों के चलते लोहिया ने ​1955 में पीएसपी छोड़कर फिर से ‘सोशलिस्ट पार्टी’ को जिंदा करने का निर्णय किया. लोहिया से सोशलिस्ट पार्टियों की इस टूट-फूट पर किसी ने पूछा तो उन्होंने व्यंग्य के लहजे में कहा था, ‘समाजवादी विचारधारा की पार्टियों और अमीबा में एकरूपता है. मतलब जैसे ही पार्टी मजबूत होकर बड़ी बनती है, अमीबा की तरह टूटकर फिर पहले की तरह छोटी हो जाती है.’ उनका यह कथन आज भी खुद को उनकी विरासत का उत्तराधिकारी कहने वाली पार्टियों पर लागू होता दिखता है. लोहिया और अन्य समाजवादियों की पहले आम चुनाव में हार हुई. लेकिन यह हार इन नेताओं की अलोकप्रियता की वजह से नहीं बल्कि उनके संगठन के कांग्रेस की तुलना में कमजोर होने और कमतर आर्थिक संसाधन होने के चलते हुई थी. इसे मजबूत कांग्रेस को नियंत्रण में रखने की जिजीविषा ही कहेंगे कि इस हार के बाद कई सोशलिस्ट पार्टियां एकजुट हो गईं. इसी समय लोहिया के सिद्धांत पार्टी के अन्य नेताओंं को पच नहीं रहे थे. वे जैसे भी हो केरल में सत्ता में बने रहना चाहते थे. इसी बात पर लोहिया ने 1955 में पीएसपी छोड़कर फिर से सोशलिस्ट पार्टी को जिंदा करने का निर्णय लिया. इसके बाद वे घूम-घूमकर तमाम पिछड़ी जातियों के संगठनों को जोड़ने लगे. इसी सिलसिले में उन्होंने बीआर अंबेडकर से मिलकर उनके ‘आॅल इंडिया बैकवर्ड क्लास एसोसिएशन’ के सोशलिस्ट पार्टी में विलय की बात शुरू की. बातचीत पक्की हो गई थी कि दिसंबर 1956 में अंबेडकर का निधन हो गया. और उन्हें अपने साथ जोड़ने की उनकी मुहिम अधूरी रह गई. फिर भी ऐसे दूसरे संगठनों को जोड़ने का उनका प्रयास जारी रहा. राम मनोहर लोहिया के ऐसे प्रयासों का ही नतीजा रहा कि 1967 कांग्रेस पार्टी सात राज्यों में चुनाव हार गई और पहली बार विपक्ष उसे टक्कर देने की हालत में दिखने लगा. इस चुनाव के बाद लोहिया ने तय किया कि वे जेपी को मुख्यधारा में वापस लाकर विपक्ष को और मजबूत बनाएंगे. पर वे अक्टूबर में चल बसे. हालांकि राम मनोहर लोहिया का प्रयास करीब एक दशक बाद रंग लाया जब 1975 में जयप्रकाश नारायण राजनीति की मुख्यधारा में वापस लौटे. आपातकाल के बाद हुए 1977 के चुनाव में विपक्षी पार्टियों की एकजुटता रंग लाई और 25 सालों से केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. राम मनोहर लोहिया ने जर्मनी में रहते कार्ल मार्क्स और एंगेल्स को खूब पढ़ा. लेकिन उन्होंने पाया कि भारत के संदर्भ में कम्युनिस्ट विचारधारा अपूर्ण है. मार्क्सवाद ने साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के संबंधों की जो व्याख्या की थी लोहिया उससे असहमत थे. बल्कि वे तो उसे उल्टा मानते थे. मार्क्सवाद मानता था कि पूंजीवाद के विकास से साम्राज्यवाद पनपता है. इसलिए पूंजीवाद के खात्मे से ही साम्राज्यवाद का विनाश होगा. लोहिया ने बताया कि मामला असल में उल्टा है. वह साम्राज्यवाद ही है जिससे पूंजीवाद का विकास हुआ. इसलिए पूंजीवाद का नाश करने के लिए जरूरी है कि साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंका जाए. उन्होंने ब्रिटेन के उदय को भारत जैसे उपनिवेशों के शोषण से जोड़ दिया और कहा कि भारत को आजाद किए बगैर पूंजीवाद की जड़ें कमजोर नहीं हो सकती. इस तरह लोहिया ने पूंजीवाद के विनाश के लिए भारत जैसे उपनिवेशों की आजादी को सबसे महत्वपूर्ण बताया.  
लोहिया ने मार्क्स के वर्ग-सिद्धांत की भारत के संदर्भ में नई व्याख्या दी. उनके अनुसार भारत का समाज औद्योगिक समाज नहीं है. इस समाज में असमानता की मुख्य वजह जाति रही है. यहां पर शोषण का कारण जाति व्यवस्था रही है. इसलिए यहां पर ‘बुर्जुआ’ और ‘सर्वहारा’ वर्गों की मौजूदगी मार्क्सवाद के सिद्धांतों की तरह नहीं है. राम मनोहर लोहिया का मानना था कि भारत की सवर्ण जातियों को बुर्जुआ माना जाना चाहिए और तमाम वंचित वर्गों, जिनमें आदिवासी, दलित, अन्य पिछड़ी जातियां और यहां तक कि सभी समुदायों की महिलाएं भी शामिल हैं, को सर्वहारा माना जाना चाहिए. भारत के संदर्भ में मार्क्सवाद की लोहिया की यह व्याख्या और इसके परिणाम क्रांतिकारी रहे. आलोचकों का भी मानना है कि साठ के दशक से भारत में समाजवादी विचारधारा के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने के पीछे लोहिया की इस अनूठी व्याख्या का ही योगदान रहा है. इसने जातिगत पहचानों को तो मजबूती दी ही है, राजनीति में वंचित जातियों की पैठ भी बढ़ाई है. हर तरह की विषमता को खत्म करने की दिशा में सप्तक्रांति सिद्धांत को भी राम मनोहर लोहिया की अनूठी देन माना जाता है. इस सिद्धांत में सात बिंदु थे. मसलन रंगभेद खत्म हो, जातिगत भेदभाव बंद हो, औरत और मर्द में कोई अंतर नहीं है, राष्ट्रवाद को संकुचित नहीं व्यापक तरीके से समझा जाए, समाजवादी आर्थिक मॉडल श्रेष्ठ है, सभी देश निरशस्त्रीकरण के रास्ते चलें और भेदभाव से लड़ने का तरीका सत्याग्रह ही होना चाहिए. लोहिया के प्रयासों का ही असर रहा कि तमाम पिछड़ी जातियों में आत्मविश्वास विकसित हुआ. उन्होंने कमाबेश सभी पिछड़ी जाति के नेताओं को आगे बढ़ाया. उनके जाने के बाद उत्तर भारत के कई राज्यों में समाजवादी विचारधारा की सरकार बनी. इससे सामाजिक न्याय को अभूतपूर्व मजबूती मिली. किसी जानकार ने कहा है कि गांधी को छोड़ दिया जाए तो लोहिया का अनुसरण करने वाली पार्टियों और नेताओं की संख्या देश के इतिहास में सबसे ज्यादा है.

Thursday, October 12, 2017

राहुल की बदलती छवि

सुना है क़ि राहुल गाँधी के लिए भी वही पीआर एजेंसी हायर की जा रही है जो अमेरिका में ट्रम्प के लिए काम कर रही थी. उसी की रणनीति के तहत वो इसबार कुछ अधिक बदले और मेहनत करते दिख रहे हैं. अभी तक उनका गुजरात में इसबार 15 दिन में दूसरा दौरा है. वो जनता से सीधा संवाद कर रहे हैं. मुझे नहीं पता कि वो जनता कौन है? कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं या फिर नैचुरल? इसमें वो छात्रों, डॉक्टर्स, सीए, व्यापारियों, आदिवासी युवाओं से सीधा संवाद कर उनके हर सवाल पर जवाब दे रहे हैं. कई बार तो ऐसे टेक्निकल सवाल होते हैं क़ि लगता है वो जवाब नहीं दे पाएँगे लेकिन वो काफ़ी तैयारी के साथ दिखते हैं और जवाब में ईमानदारी दिखती है. वो जीएसटी पर बहुत अधिक नॉलेज रखते हैं. एक इंजीनियर सवाल करता है तो टेक्निकल और अमेरिकन इंस्टीट्यूट, चाइना की बात करते हैं. डॉक्टर्स सवाल करते हैं तो वो मेडिकल में भारत को सुपर पवार बनाने की बाते करते हैं जो विश्व मे सबसे अधिक जॉब क्रिएक करके चाइना का मुकाबला करने की भी बात करते हैं. वो अमूल दुधा, और पापड़ अचार जैसे छोटे उद्योगों को बढ़ाने की बात करते हैं, वो रोज़गार पर ईमानदारी से बहुत अच्छी बात करते हैं. मेरे ख़याल से केजरीवाल से भी बेहतर इस मामले में. खुद की ग़लतियाँ स्वीकार करते हैं क़ि कैसे कांग्रेस के नेता गमंड में आ गए, कैसे 2011 के बाद से सब विकास बंद करके भ्रष्टाचार करने लगे. किसानों से फूड प्रोसेसिंग लगाकर आस्ट्रेलिया का मुकाबला करने की बात करते हैं. वो पर्यवरण पर बात करते हैं. कम से कम एक नया नेता दिखता है. कोई कह सकता है कि मैं उनका बखान कर रहा हूँ, लेकिन नहीं. 2013 में जब मोदी जी गुजरात से बाहर निकल कर यही कर रहे थे तो भी हम लिखकर उनके नेतृत्व पर अपनी राय रखते थे. अब मोदी जी शीर्ष नेता हैं तो उनका एनलिसिस नहीं हो इस तरह से नहीं हो सकता. जब बीजेपी से कोई नया आएगा तो होगा. इसके पहले मोदीजी के सामने हमेशा बच्चे ही नज़र आते थे लेकिन आज लगता है क़ि अगर प्रधान मंत्री उम्मीदवारों में उनकी बहस मोदी जी से हो तो वो हर मुद्दे पर उनके हरा सकते हैं. लेकिन भाषण देने की कला और जनता से कनेक्ट होने का जादू अभी भी मोदी जी के पास बेहतर है. वो इतना टेक्निकल नॉलेज भले न रखते हों लेकिन जनता और कार्यकर्ताओं में जोश भरना उनकी कला है. वहीं राहुल गाँधी इस बार खुद को हिंदू विरोधी भी नहीं दिखाना चाहते हैं. कहीं भी 2002 के दंगे, हिंदू मुस्लिम या फिर सेकूलरिज़्म की बात नहीं की. उनको पता है क़ि मुस्लिम वोटों के पास विकल्प ही एक है. यूपी की तरह तीन चार सेकुलर दल तो हैं नहीं. वो हर रैली और रोडशो के पहले उस क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध मंदिर में जाकर पूजा अर्चना करते हैं. फिर माथे पर बड़ा सा तिलक लगाते हैं जो लोगों को सांकेतिक तौर पर दिखाए क़ि वो हिंदू ही हैं. फिर वो आक्रमक होकर जमकर हमला करते हैं. लोगों का रिस्पोन्स भी काफ़ी अच्छा है. क्योकि हार्दिक पटेल का भी समर्थन मिला है उनको. शायद कांग्रेस को लगता है क़ि अगर वो गुजरात फ़तह कर लेते हैं तो 2019 का किला ढहने में अधिक समय नहीं लगेगा. लेकिन अमित शाह और मोदी बिल्कुल निश्चिंत हैं उनको गुजरात पर भरोसा है वो केवल अंत में एक दो दिन प्रचार से ही सबकुछ संभालने का भरोसा रखते हैं. हालाँकि इतना आसान भी नहीं है कांग्रेस के लिए गुजरात जीतना. मुझे अभी भी ये असंभव ही लगता है. 

Tuesday, October 10, 2017

चे ग्वेरा की क्रांति

"मैं कोई मुक्तिदाता नहीं हूँ। मुक्तिदाता का कोई अस्तित्व नहीं होता। लोग खुद को अपने आप मुक्त करते हैं"... 
ये शब्द हैं चे ग्वेरा के जिनको पूरी दुनिया में क्रांतिदूत के नाम से जाना जाता है। चे ग्वेरा का जन्म अर्जेंटीना के रोसारियो शहर में 1928 में हुआ था। इनके पूर्वज आयरलैंड से अर्जेंटीना आए थे। माता पिता ने नाम एर्नेस्तो रखा। बचपन से ही चंचल स्वभाव का होने की वजह से उनके पिता कहते थे कि सबसे पहली चीज जो मेरे बेटे में नजर आती है वो है उसकी रगों में दौड़ रहा विद्रोही आयरिश खून। दमे की बीमारी होने के बावजूद चे ने अपने आपको एक अच्छे एथलिट के रूप में ढाल लिया था। वे स्विमिंग, गोल्फ, फुटबाल, शूटिंग और रग्बी के अच्छे खिलाड़ी थे। किशोरावस्था में काव्य के प्रति उनकी रुचि बनी जो जीवनपर्यंत रही। वे पाब्लो नेरुदा, लोर्का, जॉन कीट्स के बहुत बड़े प्रशंसक थे। 1948 में चे ग्वेरा ने डॉक्टरी की पढाई करने के लिए ब्यूनस एरिस यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। 1950 में वे अपनी प्रसिद्ध मोटरसाइकिल यात्राओं में से पहली पर निकल पड़े जिस दौरान उन्होंने उत्तरी अर्जेंटीना का 4800 किलोमीटर का सफ़र अकेले मोटरसाइकिल पर तय किया। उसके बाद 1951 में लगभग पूरे दक्षिण अमेरिका की 9000 किलोमीटर की यात्रा मोटरसाइकिल पर तय की जो कि 9 महीने तक चली। इस दौरान उन्होंने चिली के खान श्रमिकों की दशा देखी जो पूंजीवादी शोषण की वजह से नारकीय जीवन बिता रहे थे। साथ में माचू पिचू के गरीब किसानों की दशा ने उनको झकझोर कर रख दिया था। यात्राओं से लौट कर जून 1953 में उन्होंने अपनी मेडिकल की डिग्री पूरी की। *अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने भूख, गरीबी और बीमारी देखी और देखा कैसे लोग पैसे की कमी के कारण अपने बीमार बच्चों का इलाज नहीं करवाते और कैसे अपने बच्चे की मौत को एक "महत्वहीन दुर्घटना" मान कर संतोष कर लेते हैं। इन अनुभवों से उनको एहसास हुआ कि अगर इन लोगों की सहायता करनी है तो उनको डॉक्टरी के साथ साथ क्रांति का भी रास्ता अख्तियार करना होगा।
जुलाई 1953 में वे फिर से यात्रा पर निकले पेरू, बोलीविया, अल सल्वाडोर, पनामा, कोस्टा रिका, निकारागुआ, ग्वाटेमाला होते हुए। उसके बाद उन्होंने दिवंगत स्तालिन की तस्वीर के आगे शपथ कि वे तब तक चैन नहीं लेंगे जब तक पूंजीवाद रूपी इस ऑक्टोपस को खत्म न कर दें। 1953 में ही वे निर्वासित क्यूबाई विद्रोही फिदेल कास्त्रो के संपर्क में आये। इसी दौरान अर्नेस्टो ग्वेरा को उनका प्रसिद्ध नाम "चे" मिला। ग्वाटेमाला में उनकी मुलाकात हिल्डा गादेया से हुई जो एक अर्थशास्त्री और वामपंथी झुकाव वाली राजनीतिक कार्यकर्त्ता थी। हिल्डा ने उनकी मुलाकात ग्वाटेमाला की वामपंथी झुकाव वाली सरकार के उच्चाधिकारियों से करवाई। लेकिन इस सरकार का सी.आई.ए. की साजिश से तख्तापलट होने के बाद हिल्डा गादेया को गिरफ्तार कर लिया गया और चे को अर्जेंटीनी दूतावास में छिप कर जान बचानी पड़ी। उसके बाद वे मेक्सिको चले गए। मेक्सिको में ही सितम्बर 1955 में उन्होंने हिल्डा गादेया से विवाह किया। ग्वाटेमाला में तख्तापलट के बाद चे का संयुक्त राज्य अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों के प्रति विरोध तीव्र होता चला गया। गादेया ने बाद में लिखा कि ग्वाटेमाला के तख्तापलट से ही अंततः चे को पूर्ण विश्वास हो गया था कि साम्राज्यवाद के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष ही उपाय है। उसके बाद क्यूबा की क्रांति में उनकी भूमिका इतिहास निर्मात्री साबित हुई जब उन्होंने 1959 में फिदेल कास्त्रो के साथ मिलकर बतिस्ता की अमेरिका परस्त तानाशाही को उखाड़ फेंका और जनता का राज्य कायम किया।उसके बाद चे ने 1965 में क्यूबा को छोड़ दिया और दुनिया के दूसरे देशों में क्रांति के लिए निकल पड़े। पहले कांगो और फिर बोलीविया में कम्युनिस्ट विद्रोह का नेतृत्व किया। बोलीविया में विद्रोह के दौरान सी.आई.ए. ने बोलिवियन सरकार की मदद से उनको पकड़ लिया और 9 अक्टूबर 1967 को उन्हें गोली मार दी गई। शहीद होने से पहले उन्होंने गोली मारने वालों को ललकारा था कि "मुझे पता है तुम मुझे मारने आए हो। गोली चलाओ, कायरों। तुम सिर्फ एक व्यक्ति को मार रहे हो"। चे एक डॉक्टर थे। और एक क्रांतिकारी थे। इस क्रांतिकारी डॉक्टर ने मानवता की बीमारी, पूंजीवाद, को पहचान लिया था और इस बीमारी के खिलाफ जीवन पर्यन्त संघर्ष में लगे रहे थे। उन्होंने कहा था -- "एक क्रांतिकारी डॉक्टर बनने के लिए, या फिर कहें कि एक क्रांतिकारी ही बनने के लिए, एक क्रांति की जरूरत होती है। अलग थलग रह कर किये गए निजी प्रयास, अपने तमाम आदर्शों की पवित्रता के बावजूद, किसी काम के नहीं होते, और अगर कोई आदमी अकेले ही काम करते हुए, अमेरिका के किसी कोने में किसी बुरी सरकार और प्रगतिरोधी सामाजिक परिस्थितियों के खिलाफ लड़ते हुए, किसी महान आदर्श के लिए पूरी जिंदगी का बलिदान भी कर देता है तो भी उससे कोई फायदा नहीं होता। एक क्रांति को पैदा करने के लिए हमारे पास वह होना चाहिए, जो आज क्यूबा में है, यानि पूरी जनता की लामबंदी। और अंततः आज आपके सामने, अन्य सभी बातों से ऊपर, एक क्रांतिकारी डॉक्टर, यानि कहें तो वह डॉक्टर जो अपने पेशे से सम्बंधित तकनीकी ज्ञान को लोगों और क्रांति की सेवा में लगाता हो, बनने का अधिकार भी है और कर्तव्य भी।"

Sunday, October 1, 2017

क्या सच में गाँधी ने भगत सिंह को नहीं बचाया?

हमारे देश में एक नया ट्रेंड चालू हुआ है इतिहास को फिर से लिखने का. गाँधी जी के बारे में ही अगर बात की जाए तो लोगों ने उनके खिलाफ ऐसा प्रोपेगेंडा फैला रखा है जो उनको विलेन साबित करता है. ऐसा लगता है देश में जितनी भी समस्याएँ हैं उन सबका ज़िम्मेदार अकेले गाँधी जी ही हैं. जबकि जो लोग ऐसा कर रहे हैं उनके सरदार (मोदी जी) विश्व पटल या देश के अंदर भी खुद को साबित करने के लिए बार बार गाँधी का प्रयोग करते हैं. कई राज्यों की किताबों से गाँधी को हटाकर श्यामाप्रसाद मुखर्जी और संघ की विचारधारा वाले अन्य लोगों को जगह दी जा रही है. इसी कड़ी में जब हम कभी गाँधी पर बात करते हैं  तो बड़े पैमाने पर लोगों से ये बात सुनने को मिलती है कि गाँधी और भगत सिंह एक दूसरे के विरोधी थी. उनमें कोई समानता नहीं थी. यहाँ तक क़ि गाँधी ने भगत सिंह की फाँसी रोकने के लिए कुछ नहीं किया. अगर वो चाहते तो उन्हें बचा सकते थे. क्या सच में ऐसा था? और ये धारणा आज ही नहीं काफ़ी जनमानस में बन चुकी है. यहाँ तक क़ि भगत सिंह पर बनी हर फिल्म में यही दिखाने की कोशिश हुई है. इस बात में कितनी सच्चाई है आइए हम इसपर बात करते हैं.
24 मार्च, 1931 के दिन या भगत सिंह को फांसी दिए जाने की अगली सुबह गांधी जैसे ही कराची (आज का पाकिस्तान) के पास मालीर स्टेशन पर पहुंचे, तो लाल कुर्तीधारी नौजवान भारत सभा के युवकों ने काले कपड़े से बने फूलों की माला गांधीजी को भेंट की. स्वयं गांधीजी के शब्दों में, ‘काले कपड़े के वे फूल तीनों देशभक्तों की चिता की राख के प्रतीक थे.’ 26 मार्च को कराची में प्रेस के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा - ‘मैं भगत सिंह और उनके साथियों की मौत की सजा में बदलाव नहीं करा सका और इसी कारण नौजवानों ने मेरे प्रति अपने क्रोध का प्रदर्शन किया है. ...ये युवक चाहते तो इन फूलों को मेरे ऊपर बरसा भी सकते थे या मुझ पर फेंक भी सकते थे, पर उन्होंने यह सब न करके मुझे अपने हाथों से फूल लेने की छूट दी और मैंने कृतज्ञतापूर्वक इन फूलों को लिया. बेशक, उन्होंने ‘गांधीवाद का नाश हो’ और ‘गांधी वापस जाओ’ के नारे लगाए और इसे मैं उनके क्रोध का सही प्रदर्शन मानता हूं.’
लेकिन इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने आगे कहा था- ‘आत्म-दमन और कायरता से भरे दब्बूपने वाले इस देश में हमें इतना अधिक साहस और बलिदान नहीं मिल सकता. भगत सिंह के साहस और बलिदान के सामने मस्तक नत हो जाता है. लेकिन यदि मैं अपने नौजवान भाइयों को नाराज किए बिना कह सकूं तो मुझे इससे भी बड़े साहस को देखने की इच्छा है. मैं एक ऐसा नम्र, सभ्य और अहिंसक साहस चाहता हूं जो किसी को चोट पहुंचाए बिना या मन में किसी को चोट पहुंचाने का तनिक भी विचार रखे बिना फांसी पर झूल जाए.’ भगत सिंह को फांसी से बचाने में गांधी के विफल रहने के बारे में प्रचलित धारणाओं को इस नजरिए से भी देखा जाना चाहिए. अहिंसा के साधक गांधी किसी भी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की सजा देने के विरोधी रहे थे. भगत सिंह से पहले उन्होंने अन्य मामलों में भी किसी को भी मृत्युदंड दिए जाने का विरोध किया था. उच्च कोटि के आस्तिक गांधी यह मानते थे कि किसी की जान लेने का हक केवल उसे ही है जिसने वह प्राण दिया है. यानी प्रकृति का नियम या ईश्वर ही किसी की जान ले सकता है, न कि कोई मनुष्य, सरकार या मनुष्य द्वारा बनाई कोई व्यवस्था. 26 मार्च, 1931 को कराची अधिवेशन में भगत सिंह के संदर्भ में ही बोलते हुए उन्होंने कहा था- ‘आपको जानना चाहिए कि खूनी को, चोर को, डाकू को भी सजा देना मेरे धर्म के विरुद्ध है. इसलिए इस शक की तो कोई वजह ही नहीं हो सकती कि मैं भगत सिंह को बचाना नहीं चाहता था.’ इस सभा में नौजवान भारत सभा के सदस्य भी बड़ी संख्या में मौजूद थे. दीवान चमनलाल जो नौजवान भारत सभा के सचिव थे, वे तो गांधी के अन्यतम सहयोगियों में से ही थे और वहां भी उनके साथ ही थे. इतने संवेदनशील और भावुक माहौल में भी गांधी पूरे होश में और पूरी करुणा से अपनी बात रख रहे थे.
तभी किसी ने चिल्लाकर पूछा- ‘आपने भगत सिंह को बचाने के लिए किया क्या?’
इस पर गांधी ने जवाब दिया- ‘मैं यहां अपना बचाव करने के लिए नहीं बैठा था, इसलिए मैंने आपको विस्तार से यह नहीं बताया कि भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने के लिए मैंने क्या-क्या किया. मैं वाइसराय को जिस तरह समझा सकता था, उस तरह से मैंने समझाया. समझाने की जितनी शक्ति मुझमें थी, सब मैंने उन पर आजमा देखी. भगत सिंह की परिवारवालों के साथ निश्चित आखिरी मुलाकात के दिन यानी 23 मार्च को सवेरे मैंने वाइसराय को एक खानगी (अनौपचारिक) खत लिखा. उसमें मैंने अपनी सारी आत्मा उड़ेल दी थी. पर सब बेकार हुआ.’ भगत सिंह को बचाने के लिए वाइसराय को लिखी उस अनौपचारिक चिट्ठी में गांधीजी ने उन्हें जनमत का वास्ता देते हुए लिखा था- ‘जनमत चाहे सही हो या गलत, सजा में रियायत चाहता है. जब कोई सिद्धांत दांव पर न हो तो लोकमत का मान रखना हमारा कर्तव्य हो जाता है. ...मौत की सजा पर अमल हो जाने के बाद तो वह कदम वापस नहीं लिया जा सकता. यदि आप यह सोचते हैं कि फैसले में थोड़ी सी भी गुंजाइश है, तो मैं आपसे यह प्रार्थना करूंगा कि इस सजा को, जिसे फिर वापस नहीं लिया जा सकता, आगे और विचार करने के लिए स्थगित कर दें. ...दया कभी निष्फल नहीं जाती.’ भगत सिंह के बचपन के एक साथी जयदेव गुप्ता जो उस सभा में मौजूद थे, उन्होंने बाद में लिखा कि ‘उस सभा का वातावरण मिश्रित प्रकार का था. लोग दो धड़ों में बंट गए थे. एक धड़ा गांधी के पक्ष में था और दूसरा विरोध में. लेकिन महात्मा गांधी इतने अद्भुत वक्ता थे कि उन्होंने अपनी तार्किक बातों, मीठी आवाज, शांत और मृदुल अंदाज से सबको यह भरोसा दिला दिया कि भगत सिंह को बचाने की जितनी कोशिश की जा सकती थी वह की गई.’ लेकिन तब भी और आज भी एक ऐसा वर्ग है जो मानता है कि संयोगवश उसी दौरान एक अन्य संदर्भ में हो रहे गांधी-इरविन समझौते में भगत सिंह की रिहाई भी एक शर्त के रूप में डाली जा सकती थी. गांधी ने इसका जवाब देते हुए इसी सभा में कहा था- ‘आप कहेंगे कि मुझे एक बात और करनी चाहिए थी— सजा को घटाने के लिए समझौते में एक शर्त रखनी चाहिए थी. ऐसा नहीं हो सकता था. और समझौता वापस ले लेने की धमकी को तो विश्वासघात कहा जाता. कार्यसमिति इस बात में मेरे साथ थी कि सजा को घटाने की शर्त समझौते की शर्त नहीं हो सकती थी. इसलिए मैं इसकी चर्चा तो समझौते की बातों से अलग ही कर सकता था. मैंने उदारता की आशा की थी. मेरी वह आशा सफल होने वाली नहीं थी, पर इस कारण समझौता तो कभी नहीं तोड़ा जा सकता.’ इससे करीब दो महीने पहले 31 जनवरी, 1931 को भी इलाहाबाद में गांधी कह चुके थे- ‘जिन कैदियों को फांसी की सजा मिली है, उन कैदियों को फांसी नहीं मिलनी चाहिए. पर यह तो मेरी निजी राय है. इसे समझौते की शर्त बना सकते हैं या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता.’
ऐसा नहीं था कि भगत सिंह के क्रांतिकारी आदर्शों को गांधी समझते न थे. किसानों और मजदूरों के प्रति भगत सिंह और उनके साथियों की प्रतिबद्धताओं से गांधी बखूबी वाकिफ थे. लेकिन इस बारे में वे एकदम स्पष्ट और सख्त थे कि उसका साधन केवल और केवल अहिंसा ही होनी चाहिए. विशेषकर नौजवान भारत सभा के सदस्यों की ओर इशारा करते हुए गांधी ने कराची अधिवेशन में कहा था- ‘उन नौजवानों से मैं यह जरूर कहूंगा कि उनके पैदा होने के बहुत पहले से मैं किसानों और मजदूरों की सेवा करता आया हूं. मैं उनके साथ रहा हूं. उनके सुख-दुःख में भाग लिया है. जबसे मैंने सेवा का व्रत लिया है, तभी से मैं अपना सिर मानवजाति को अर्पण कर चुका हूं.’ वहीं जब भगत सिंह को फांसी के बाद कानपुर में भयंकर दंगे छिड़ गए, तो इस संदर्भ में गांधीजी ने कहा- ‘अखबारों से पता चलता है कि भगत सिंह की शहादत से कानपुर के हिन्दू पागल हो गए, और भगत सिंह के सम्मान में दुकान न बंद करनेवालों को धमकाने लगे. नतीजा आपको मालूम ही है. मेरा विश्वास है कि अगर भगत सिंह की आत्मा कानपुर के इस कांड को देख रही है, तो वह अवश्य गहरी वेदना और शरम अनुभव करती होगी. मैं यह इसलिए कहता हूं कि मैंने सुना है कि वह अपनी टेक का पक्का था.’
भगत सिंह को फांसी मिलने के एक महीने पहले जब गांधी वाइसराय से मिलने गए थे, तब भी उन्होंने भगत सिंह की सजा मुल्तवी करने की मांग की थी. बिड़ला द्वारा इस मुलाकात के बारे में पूछे जाने पर 18 फरवरी, 1931 को गांधी ने कहा था- ‘मैंने उनसे भगत सिंह की बात की. ...मैंने भगत सिंह के बारे में कहा, वह बहादुर तो है ही पर उसका दिमाग ठिकाने नहीं है, इतना जरूर कहूंगा. फिर भी मृत्युदंड बुरी चीज है. क्योंकि वह ऐसे व्यक्ति को सुधरने का अवसर नहीं देती. मैं तो मानवीय दृष्टिकोण से यह बात आपके सामने रख रहा हूं और देश में नाहक तूफान न उठ खड़ा हो, इसलिए सजा मुल्तवी कर देने का इच्छुक हूं. मैं तो उसे छोड़ दूं, लेकिन कोई सरकार उसे छोड़ देगी ऐसी आशा मुझे नहीं है.’ दरअसल भगत सिंह के बारे में ब्रिटिश हुकूमत शुरू से ही गलतफहमियों का शिकार थी. क्रांतिकारियों के तौर-तरीकों के बारे में यह गलतफहमी उस दौरान भारतीयों के एक बड़े वर्ग में भी मौजूद थी. ऊपर-ऊपर से हिंसक दिखनेवाले तौर-तरीकों की वजह से ब्रिटिश हुकूमत इन इन्कलाबियों के प्रति बेहद सख्त रवैया अपनाए हुई थी. गांधी समेत अन्य कई नेता इन युवाओं के जोश से प्रभावित अवश्य थे, लेकिन इनके तौर-तरीकों की वजह से वे इनसे परहेज भी करते थे. इसलिए जेल में भगत सिंह अपने, और साथियों के साथ दुर्व्यवहार के विरुद्ध जब अनशन पर बैठ गए और जवाहरलाल नेहरू ने उनकी पैरवी की थी, तो गांधी ने नेहरू को चिट्ठी लिखकर इसे एक ‘असंगत’ कार्य बताया था. भगत सिंह और उनके साथियों के प्रति ब्रिटिश हुकूमत पैरानोइया की हद तक भयभीत हो चुकी थी. और इसलिए सरकारी गुप्तचर उन सभी के पीछे पड़े हुए थे जिनके बारे में उन्हें थोड़ा सा भी लगता था कि इन्हें भगत सिंह से सहानुभूति हो सकती है. इनमें नेहरू, पटेल और मालवीय से लेकर तेजबहादुर सप्रू तक थे. माना जाता है कि भगत सिंह की फांसी के बाद ब्रिटिश इंटेलिजेंस को यह देखने तक के लिए लगाया गया था कि इस पर गांधी, नेहरू और पटेल इत्यादि की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया क्या थी. लेकिन अंतिम अवस्था तक आते-आते गांधी को भगत सिंह के प्रति बहुत अधिक सहानुभूति हो चली थी. जब भगत सिंह को तय समय से एक दिन पहले ही फांसी दिए जाने की खबर मिली तो गांधी काफी देर के लिए मौन में चले गए थे. 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह की फांसी के संबंध में दिए गए अपने वक्तव्य में गांधी ने कहा था- ‘भगत सिंह और उनके साथी फांसी पाकर शहीद हो गए हैं. ऐसा लगता है मानो उनकी मृत्यु से हजारों लोगों की निजी हानि हुई है. इन नवयुवक देशभक्तों की याद में प्रशंसा के जो शब्द कहे जा सकते हैं, मैं उनके साथ हूं. ...मेरा निश्चित मत है कि सरकार द्वारा की गई इस गंभीर भूल के परिणामस्वरूप स्वतंत्रता प्राप्त करने की हमारी शक्ति में वृद्धि हुई है और उसके लिए भगत सिंह और उनके साथियों ने मृत्यु का वरण किया है.’
भगत सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए गांधी ने 29 मार्च, 1931 को गुजराती नवजीवन में लिखा था- ‘वीर भगत सिंह और उनके दो साथी फांसी पर चढ़ गए. उनकी देह को बचाने के बहुतेरे प्रयत्न किए गए, कुछ आशा भी बंधी, पर वह व्यर्थ हुई. भगत सिंह को जीवित रहने की इच्छा नहीं थी; उन्होंने माफी मांगने से इनकार किया. यदि वे जीते रहने को तैयार होते, तो या तो वह दूसरों के लिए काम करने की दृष्टि से होता या फिर इसलिए होता कि उनकी फांसी से कोई आवेश में आकर व्यर्थ ही किसी का खून न करे. भगत सिंह अहिंसा के पुजारी नहीं थे, लेकिन वे हिंसा को भी धर्म नहीं मानते थे. वे अन्य उपाय न देखकर खून करने को तैयार हुए थे. उनका आखिरी पत्र इस प्रकार था : ‘मैं तो लड़ते हुए गिरफ्तार हुआ हूं. मुझे फांसी नहीं दी जा सकती. मुझे तोप से उड़ा दो, गोली मारो.’ इन वीरों ने मौत के भय को जीता था. इनकी वीरता के लिए इन्हें हजारों नमन हों.’ हालांकि अहिंसा के पुजारी गांधी हमेशा ही चेताते रहे कि तमाम शहादत और नेकनीयती के बावजूद जांबाज क्रांतिकारियों के हिंसामार्ग का अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन न हो. 

क्या अब नरम हिंदुत्व की राह पर कांग्रेस?

इस महीने की शुरुआत में कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी अमेरिका की यात्रा पर गए थे. अमरीका में राहुल गांधी ने कई थिंक टैंकों के सदस्यों से मुलाक़ात की और यूनिवर्सिटी में छात्रों को संबोधित भी किया. इस दौरान राहुल ने कई सवालों के जवाब भी दिए. राहुल ने भारत की वर्तमान स्थिति और राजनीति को भी कटघरे में खड़ा किया. उन्होंने कई पत्रिकाओं और अख़बारों को साक्षात्कार भी दिया. राहुल की यात्रा को मीडिया में अच्छी-ख़ासी जगह भी मिली. राहुल ने इस दौरान जो बातें कहीं उनकी तारीफ़ भी हुई. भारत में पहली बार सत्ताधारी बीजेपी ने महसूस किया कि विदेश में मोदी का जादू कम हो रहा है और राहुल गांधी को लोग गंभीरता से ले रहे हैं. भारत की अर्थव्यवस्था की बिगड़ती सेहत के कारण प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना हो रही है. शुरू में ऐसा लगा था कि मोदी भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यापक पैमाने पर बदलाव लाने जा रहे हैं, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि अभी तक कोई बड़ा सुधार ज़मीन पर नहीं उतर पाया है.
भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 6 फ़ीसदी से भी कम हो गई है. अर्थव्यवस्था में सुस्ती को साफ़ तौर पर महसूस किया जा रहा है. सरकार इस बात का आकलन नहीं कर पाई कि उसकी नीतियों से ग़रीबों को फ़ायदा नहीं हो रहा है. आने वाले महीनों में भारत के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. मोदी सरकार को लेकर जैसी बातें हो रही हैं, उस माहौल में बीजेपी की लिए चुनाव लड़ना आसान नहीं होगा. गुजरात और हिमाचल प्रदेश में नवंबर और दिसंबर महीने में चुनाव हैं. गुजरात चुनाव का ख़ास महत्व है. गुजरात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह राज्य है और वो वहां के मुख्यमंत्री भी रहे हैं. बीजेपी गुजरात में लंबे समय से सत्ता में रही है. गुजरात में अभी जैसा माहौल है उसमें बदलाव के संकेत साफ़ दिख रहे हैं, लेकिन क्या कांग्रेस इसका फ़ायदा उठा पाएगी? राहुल गांधी अमरीका से आने के बाद गुजरात दौरे पर गए. गुजरात में राहुल ने दौरे की शुरुआत एक बड़े मंदिर में पूजा से की. वो गुजरात में कई स्थानों पर गए, लेकिन उनके हर दौरे में किसी न किसी मंदिर में पूजा का कार्यक्रम तय था. राहुल के मंदिर जाने और पूजा-अर्चना को मीडिया में काफ़ी तवज्जो मिली. कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल का मंदिर जाना अनायास नहीं था बल्कि यह कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था. कई विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस सत्ता में लौटने के लिए नरम हिन्दुत्व का सहारा ले रही है. बीजेपी कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता पर हमेशा सवाल उठाती रही है. राहुल गांधी के गुजरात दौरे को सफल बताया जा रहा है. मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी के लिए गुजरात नाक का सवाल है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी गुजरात के ही हैं. दूसरी तरफ़ कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव काफ़ी अहम है. अगर गुजरात विधानसभा चुनाव कांग्रेस जीत लेती है तो भारत की राजनीति में यह तख्तापलट साबित हो सकता है. यह बात 2014 के चुनावों में हार के बाद एके एंटिनी की रिपोर्ट में भी ये आ चुका है क़ि कांग्रेस की छवि हिंदू विरोधी बन गई है. प्रमोद तिवारी जैसे वरिष्ट नेता कई बार राजीव गाँधी वाले नरम हिंदुत्व पर चलने की वकालत करते रहे हैं. शायद इसका अनुमान राहुल गाँधी को भी है. इसलिए ही वो गुजरात चुनावों में मुद्दों के ऊपर तो चुनाव लड़ना चाहते हैं लेकिन बीजेपी को कोई मौका नहीं देना चाहते हैं, क़ि वो असली मुद्दों से बहस भटका कर कांग्रेस या राहुल गाँधी को हिंदू विरोधी कहकर बहस भटका दे. 

कांग्रेस से हारती राहुल की युवा टीम

कांग्रेस पार्टी में सबसे भारी दिक्कत यही है क़ि उनके युवा नेताओं को खुलकर ज़िम्मेदारी नहीं दी जा रही है. सबसे पहले तो राहुल गाँधी को ही कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनाना, वो तो फिर भी ठीक है क़ि ये केवल औपचारिक है. लेकिन मध्यप्रदेश और राजस्थान के चुनाव सिर पर हैं. और उनके युवा नेताओं ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट को ज़िम्मेदारी नहीं मिल पा रही है. दोनों की राह में रोड़े बने हैं उनके दो बुजुर्ग नेता अशोक गहलोत और दिग्विजय सिंह. एमपी में ही सुना है क़ि कमलनाथ तो सिंधिया के नाम पर मान गए हैं लेकिन दिग्विजय सिंह 3300 किलोमीटर की नर्मदा यात्रा अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर निकाल रहे हैं. अशोक गहलोत तो फिर भी अपने पूर्व कार्यकाल के विकास को वसुंधरा राजे सरकार के काम से तुलना कर चुनाव जीत सकते हैं लेकिन दिग्विजय सिंह मानने को नहीं तैयार हैं क़ि वो गुज़रे जमाने के नेता हो चुके हैं, और उनके सामने बीजेपी का जीतना बहुत आसान हो जाता है. छत्तीसगढ़ में तो खैर कांग्रेस की चुनौती ही नहीं है. वहीं हिमाचल प्रदेश भी वीरभद्र पर लगे आरोपों के बाद हाथ से निकलता दिख रहा है. हरियाणा में राहुल गाँधी के युवा मित्र दिपेंदर सिंह हुड्डा हो सकते हैं लेकिन उनके पिता भुपेन्दर सिंह हुड्डा की ही हर हफ्ते बीजेपी में जाने की खबरें आती हैं. यूपी में भी उनके कई साथी आरपीएन सिंह सहित हैं लेकिन किसी में वो ज़िम्मेदारी निभाने की क्षमता ही नहीं दिखती. जबकि किसी भी पार्टी में इतने काबिल युवा नेता नहीं हैं. शायद कांग्रेस पार्टी को अभी भी बहुत होमवर्क करने की ज़रूरत है और राहुल गाँधी को एक राष्ट्रीय चेहरा मान कर राज्यों में अपने नेतृत्व को अपने इन युवा महारथियों के भरोसे छोड़ना पड़ेगा. ये आप बीजेपी में देख सकते हैं. छत्तीसगढ़ में रमनसिंह, एमपी में शिवराज सिंह, कर्नाटक, बिहार, यूपी और राजस्थान. जबकि कांग्रेस के पास इन युवा और काम करने के अनुभवी नेताओं की फौज है. ईमानदार छवि जो युवा और शिक्षित वर्ग में प्रभाव डाल सकते हैं.

Saturday, September 30, 2017

जर्मनी के चुनावों की नतीजे

जर्मनी भी अब अमेरिका जैसे नाटक कर रहा है अपने कट्टरपंथी ना होने का, अब वो भी सड़क पर उतर कर प्रदर्शन कर रहे हैं क़ि जिन 13% लोगों ने एएफडी (पॉप्युलिस्ट राइट विंग पार्टी) को वोट दिया है हम उनसे असहमत हैं. या जर्मनी वैसा नहीं है. लेकिन बात ये भी है क़ि आख़िर एएफडी को वोट देने वाले 13% लोग हैं तो जर्मन ही ना? ठीक वैसे ही जब अमेरिका ट्रम्प को सत्ता में बिठाकर आंदोलन करता है क़ि वो कट्टरपंथी नहीं हैं.
दरअसल वहाँ कट्टरपंथी संगठन को चुनाव में 95 के आसपास सीटें मिलना महज संयोग या संख्या नहीं है. ये एंजेला मार्केल की एक नाकामी के तौर पर देखी जा रही है. सीरिया से आए हुए लोगों के खिलाफ मतलब एंटी माइग्रेट मुद्दे पर एएफडी ने लोगों का समर्थन प्राप्त किया और सीरिया में हो रहे युद्ध में पुतिन की भूमिका महत्वपूर्ण है. इसी कारण आ रहे शरणार्थियों का जर्मनी में आना दक्षिणपंथी दल ने खूब उठाया. इसमें लोग मज़ाक में ही सही पुतिन को एंजेला मार्केल की जीत की तरह देख रहे हैं. असल में पुतिन और एंजेला के बीच के तनातनी वाले संबंध सबको पता हैं. उनकी एक मीटिंग की कुत्ते वाली एक कहानी भी कई बार चर्चा में आती है. इस पार्टी ने यही प्रयोग किया. मार्केल को कुछ हदतक एंटीइनकमबैंसी का भी सामना करना पड़ा. लेकिन पूरे विश्व में हुए चुनावों में एक बात सामने आई है वो है राइटविंग का इस्लाम विरोध के नाम पर जीतना. न जितना तो समर्थन हासिल करना. चाहे आप अमेरिका, भारत, फ्रांस अपवाद हो सकता है. और अब जर्मनी.
वैसे पढ़कर अच्छा लगा कि जर्मनी की चुनाव व्यवस्था काफ़ी अच्छी है. वहाँ जितनी सीटें संसद में हैं उतनी सीटों पर दो दो चुनाव होते हैं. मतलब 299 सीटों पर पहले आप अपने प्रत्याशी को वोट दीजिए, जो मेंबर ऑफ पार्लियामेंट होगा, जो उस एरिया का प्रतिनिधित्व करता है. दूसरा वोट उसी सीट पर आप अपनी पसंद की पार्टी को दे सकते हैं. इसमें आप दूसरी पार्टी को भी पसंद कर सकते हैं.  अर्थात 598 सदस्य संसद में जाते हैं. कई बार जब जब ये डिसबैलेंस हो जाता है तो इसके लिए सीटों की संख्या बढ़ा दी जाती है. अब तक एंजेला मार्केल का बहुमत तो नहीं साबित हुआ लेकिन अंत तक कैसे भी जुगाड़ या गठबंधन करके सरकार उनकी ही बनेगी. यहाँ सीडीयू और सीएसयू के गठबंधन को 246 सीट मिली हैं, इसी गठबंधन की तरफ से चांसलर थी एंजेला मार्केल. कुल 598 सीटों पर चुनाव हुए. एसपीडी (सोसल डेमोक्रेटिक पार्टी) भी इस गठबंधन में शामिल थी जिसे 153 सीट मिली हैं. आल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एफएफडी) अभी एक दो साल पुरानी ही पार्टी है. इस चुनावों के नतीजे इसलिए और चौकाने वाले हैं क्योंकि हिटलर के बाद से इस देश (जर्मनी) ने कसम खा ली थी क़ि कभी राइट विंग या दक्षिण पंथी पार्टी या नेता को सत्ता के करीब जाने का मौका नहीं देंगे. और एएफडी ठीक उसी तरह की राजनीति करता है. वैसे तो वहाँ क़ानून में हिटलर का समर्थन करना क्राइम है इसलिए वो खुलकर उसपर नहीं बोलते हैं लेकिन दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी की सेना के कारनामे पर खूब बाते करते हैं क़ि हमने क्या खोया? क्या पाया? इसमें रेडिकल लेफ्ट हर देश की तरह फिर से फेल हो गई है. सोसलिस्ट पार्टी के नेता ने पहले तो मना किया था एंजेला को समर्थन से लेकिन दोनों पर खूब दबाव है राइटविंग को दूर रखने का. इसलिए हो सकता है जमैका कोलेशन बनाया जाए. ये मजेदार होता है क़ि सभी संभावित गठबंधन वाली पार्टियों के झंडे के रंग (हरा, काला और पीला) को मिलाकर एक किया जाता है और जब उसका रंग जमैका के झंडे की तरह हो जाता है तो इस कोलेशन की सरकार बन जाती है. 

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...