काम में व्यस्त
होने के कारण
मैं बहुत ही
कम घूम फिर
पाता हूँ। इसबार
भी साल की
समाप्ति में 25-26 दिसंबर को
जल्दबाज़ी में अपने
दोस्त अश्विन के
साथ उसके गाँव
चल दिया। रातभर
बस के सफ़र
के बाद काफ़ी
थका हुआ था,
और एक भी
पल नहीं सोया
था। इसलिए काफ़ी
बोरिंग महसूस कर रहा
था। सुबह सुबह
ठंड में नहाने
के बाद तो
कहीं और जाने
का मन ही
नहीं हो रहा
था। लेकिन जब
दोस्त ने अपने
गाँव के दोस्तों
को इकट्ठा कर
लिया वहाँ जाने
के लिए तो
फिर थका थका
सा चल दिया।
लेकिन जैसे ही
रायगढ़ किले पर
पहुँचा वैसे ही
ऊपर चढ़ने के
लिए जोश आया
और चल दिए।
फिर लगभग 2700 फिट
ऊपर का सफ़र
तय करने में
मैं भी सब
बच्चों और मित्रों
के साथ खुद
को भूलकर उनके
जैसे ही मजाकिया
और बच्चा बन
गया। उसमें सबसे
पहली बात तो
यह थी क़ि
सब मराठी भाषी
थे, मैं अकेला
हिन्दी वाला। लेकिन वो
सब हिन्दी बोल
और समझ लेते
थे। मैं मराठी
समझ तो 90% लेता
था लेकिन बोल
50% ही पाता था।
लेकिन वो मराठी
और मैं हिन्दी
में बोल रहा
था। बहुत ज़्यादा
इन्जोय हो गया।
जब गया था
तब शिवाजी महाराज
के बारे में
उतना अधिक नहीं
पता था जितना
क़ि ब्लॉग लिखते
समय पता होना
चाहिए। फिर गूगल,
विकिपीडिया, लाइब्रेरी से एक
किताब पढ़ने के
बाद आज लिखने
के बारे में
सोचा। अब अगर
मैं इसके इतिहास
के बारे में
बात करूँ तो
सबको पता है
क़ि यह महान
धरती वीर शिवाजी
महाराज की वीरता
की कहानियों की
गवाह है। प्राकृतिक
नज़रिए से रायगढ़
चारों तरफ से
पहाड़ी जंगलों से घिरा
हुआ प्रदेश है।
महान मराठा राजा
शिवाजी ने 1674 ईस्वी में
इसे अपनी राजधानी
बनाया था और
यहीं उन्होंने 1680 में
अपने प्राण त्याग
दिए थे। पहले
इसका नाम रायरी
था जिसे शिवाजी
ने बदल कर
रायगढ़ कर दिया। 1656 ईस्वी
में चंद्रराव मोरे
से शिवाजी ने
कब्जा कर लिया
था। इससे पहले
भी इस शहर
पर कई शासकों
ने सत्ता संभाली।
अबाजी सोनदेव और
हिरोजी इन्डूल्कर ने यहां
बहुत सारा निर्माण
कार्य कराया। रायगढ़
में करीब 300 घर
बनाए गए। शिवाजी
के बाद 1689 ईस्वी
तक किले पर
संभाजी का शासन
रहा। इसके बाद
इस पर मुगलों
ने कब्जा कर
लिया। 1818 ईस्वी में रायगढ़
में अंग्रेजों ने
कब्जा कर लिया।
रायगढ़ पश्चिमी भारत का
ऐतिहासिक क्षेत्र है। यह
मुंबई के ठीक
दक्षिण में स्थित
है। महाड से
25-30 किलोमीटर दूर उत्तर
की ओर और
मुंबई से 210 किलोमीटर
दूर रायगढ़ स्थित
है। यहां स्थित
है रायगढ़ का
किला जो 5।12
वर्ग किलोमीटर में
फैला है। यह
कोंकण समुद्रतटीय मैदान
का हिस्सा है,
इसका क्षेत्र लहरदार
और आड़ी-तिरछी
पहाड़ियों वाला है।
रायगढ़ सह्याद्रि पहाड़ियों की
खड़ी ढलुआ कगारों
से अरब सागर
के ऊंचे किनारों
तक पहुंचता है।
इसके तीन प्रमुख
बिंदु हैं- पश्चिम
में हिराकनी, उत्तर
में तकामक और
पूर्व में भिवानी।रायगढ़
पहुंचने का एक
ही रास्ता है।
शायद शिवाजी का
एक ही रास्ता
बनाने के पीछे
ये उद्देश्य रहा
होगा कि उनके
अपने पराये तो
यहां आसानी से
पहुंच सकें लेकिन
दुश्म
नों के लिए
किले के अंदर
पहुंचना आसान ना
हो सके। रायगढ़
का यह किला
समुद्र तल से
1350 मीटर ऊंचा है।
इस किले पर
जानेके लिए पहले
1400-1450 सीढि़यां चढ़नी पड़ती थी।
लेकिन अब इस
किले पर जाने
के लिए रोपवे
की व्यवस्था है।
रायगढ़ के इसी
किले में शिवाजी
ने अपना राज्याभिषेक
करवाया था और
छत्रपति की उपाधि
धारण की थी।
यह किला शिवाजी
के जीवनकाल तक
अविजित बना रहा।
इस किले में
प्रवेश के लिए
कई दरवाजें थे।
एक नगरखाना दरवाजा
था जिससे आम
लोग किले में
प्रवेश करते थे।
मीना दरवाजे से
महिलाएं प्रवेश करती थीं।
यह दरवाजा सीधे
रानी महल को
जाता था। पालकी
दरवाजे से राजा
तथा उनका दल
प्रवेश करता था।
महल का मुख्य
दरवाजा महा दरवाजा
था। पालकी दरवाजे
के एक ओर
तीन अंधेरे कमरे
थे। इतिहासकारों का
मानना है कि
ये कमरे किले
के अन्न भंडार
थे। किले के
भग्नावशेष के सामने
छत्रपति शिवाजी की मूर्ति
स्थापित है। यहां
एक गंगासागर झील
भी है। इस
झील में उस
समय गंगा नदी
का पानी डाला
गया था। गंगा
नदी के जल
को उस समय
शिवाजी के राज्यभिषेक
के लिए लाया
गया था। इस
झील के नजदीक
जीजा माता महल
तथा जगदिश्वर मंदिर
है जिसे जरूर
देखना चाहिए।
मैं यहाँ पर
एक और बात
को साथ में
ही लेकर चलना
चाहता हूँ। क्योंकि
मैं लॉ स्टूडेंन्ट
हूँ इसलिए अंबेडकर
साहब को खूब
पढ़ा हूँ, और
महाड के बारे
में काफ़ी जानकारी
है। महाड शहर
के मध्य में
चौदर तालाब है।
इस तालाब का
इतिहास यह है
क़ि पहले
पिछड़ी जाति के
लोगों को इस
तालाब से पानी
लेने से मनाही
थी। 1927 ईस्वी में भीमराव
अंबेडकर ने इस
तालाब से पानी
लेकर इस परंपरा
को तोड़ डाला।
इस घटना के
समय उनके साथ
दस हजार लोग
थे। यह घटना
बाद में महाड
सत्याग्रह के नाम
से प्रसिद्ध हुई।
चलिए फिर रायगढ़
की ओर लौटते
हैं यहाँ के
ही एक सनबाला
झरना के बारे
में भी एक
बारे मैने कहीं
पर पढ़ा था। माना
जाता है कि
इस झरने के
पानी में रोगनाशक
शक्तियां हैं। स्थानीय
लोगों का मानना
है कि इस
झरने में नहाने
से चर्म रोग
दूर हो जाता
है। यहां
से 55 किलोमीटर दूर
शिवतारगढ़ नामक एक
ऐतिहासिक गुफा है।
लोगों का मानना
है कि शिवाजी
के आध्यात्मिक गुरु
रामदास ने इस
गुफा में 16 सालों
तक निवास किया
था। कुछ लोगों
का यहां तक
मानना है कि
उन्होंने इसी गुफा
में प्रसिद्ध ‘दसबोध’
नामक ग्रंथ की
रचना की थी।
वालान कुंडवालान कुंड
ताजे पानी का
एक कुंड है।
अगर आप इस
कुंड में खाने
की कोई वस्तु
फेंकेगे तो सात
बार मछलियां इसे
खाने के लिए
बाहर आती हैं।
लेकिन हर बार
मछलियों का अलग-अलग झुंड
बाहर आता है
और बाद में
आने वाली मछलियों
का झुंड पहले
वाली मछलियों के
झुंड से बड़ा
होता है। 2-3 दिनों
में जितनी अधिक
जानकारी मैने किताबों
के स्तर से
पाई है वो
सब नहीं लिख
सकता हूँ। हो
सकता है बीच
में मेरा सेकुलर
चश्मा आ जाए।
ब्लॉग की अपनी
सीमाएँ होती हैं,
जिसे पार
नहीं करना चाहता
हूँ ऐसा करने
पर एक दो
बार नोटिस भी
मिल चुका है।
फिर से मैं
अपनी यात्रा पर
वापस आता हूँ।
लगभग 3 बजे तक
हम लोग पूरा
किला घूम चुके
थे, और पूरी
तरह से तक
चुके थे। फिर
हमने नीचे आना
शुरू किया तो
चलते चलते हालत
खराब हो गई।
वहाँ से आते वक्त रास्ते में एक जगह शिवाजी महाराज की माता के आश्रम में गए। फिर कुछ आगे चलकर एक गुफ़ाओं के पहाड़ पर पहुँचे जहाँ पर स्थानीय लोगों के अनुसार महाभारत के पांडव लोग अपने वनवास के दौरान रहे थे।
वहाँ से लौटकर
शाम को मित्रों
ने वहाँ के
गाँवो में मशहूर
देशी तरीके का
"मटका" खिलाया, जिसमें एक
मिट्टी के मटके
के अंदर कच्चे
आलू, अरहर डालकर
फिर भूनकर खाते
हैं। काफ़ी स्वादिष्ट
होता है। यह
फिर थकान से
रातभर लंबी नींद
सोने के बाद
अगली सुबह निकलने
की तैयारी कर
ली। एक बात
की और तारीफ़
अगर मैं ना
करूँ तो सही
नहीं होगा। जिन
दोस्तों के घर
पर रुका था
उनके घरवालों ने
बहुत स्वागत किया।
एकदम घर जैसे
रखा। उनके माता-पिता से
मित्रता जैसा व्यवहार
मिला। दोस्तों और
सबके साथ एक
रिस्ता सा जुड़
जाता है, कभी
किस्मत में होगा
तो फिर मिलेंगे,
अन्यथा जीवनभर दिल में
यादें तो रहेंगी
ही।






