Wednesday, December 16, 2015

राजनीति में शिक्षा कितनी महत्वपूर्ण?

किसी भी समाज में शिक्षा का अपना अलग ही महत्व होता है। शिक्षा के भी बिना प्रगतिशील समाज की सोंच ही नहीं आ सकती है। लेकिन भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एकदम से कोई सरकार अपना एक क़ानून लेकर आ जाए तो कितना सही फ़ैसला होगा यह बहुत ही चिंतनीय बात है।  पंचायत चुनाव देश के सभी चुनावों से ज्यादा संवेदनशील चुनाव हैं। यह इसलिए कि यहां एक—एक वोट की कीमत विधानसभा—लोकसभा से ज्यादा भारी है। एक—एक वोट से यहां जीत और हार की लड़ाईयां देखी जाती हैं। जमीनी अनुभव भी यह है कि पंचायत चुनाव में कांटे की टसल होती है,  कौन किस करवट बैठेगा उस पर भी बारीक नजर रखी जाती है। इसलिए पंचायत चुनाव बेहद अहम हो जाते हैं। हरियाणा सरकार ने पंचायत चुनाव अधिनियम में कुछ संशोधन किए हैं जिन पर अब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी रजामंदी दी है। संशोधनों के हिसाब से सामान्य वर्ग के लिए दसवीं पास, दलित और महिला वर्ग के लिए आठवीं पास होना जरूरी किया गया है। इसके अलावा बिजली बिल का कोई भी बिल बकाया नहीं होना चाहिए। बैंक का लोन न चुकाने वाले और गंभीर अपराधों में चार्जशीट होने वाले लोग भी चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। चुनाव लड़ने वाले के घर में शौचालय होना भी अनिवार्य किया गया है। 
सरकार के इस फैसले के खिलाफ जनहित याचिका लगाई गई। तर्क यह दिया गया कि इससे एक बड़ा वर्ग चुनावी प्रक्रिया में हिस्सेदार बनने से महरूम हो जाएगा। हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि उसके नए नियमों के मुताबिक 43 फीसदी लोग पंचायत चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। हालांकि याचिकाकर्ता ने इस आकंड़े को सही नहीं  बताया है। उनका अनुमान इस आंकड़े से कहीं ज्यादा का है। आंकड़े चाहे जो भी कहते हों पर अदद तो यह है कि कोई एक भी व्यक्ति शिक्षा के आधार पर चुनाव लड़ने से क्यों वंचित हो ? यदि उसकी इस संवैधानिक और ज्यादा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेनी की इच्छा हो तो वह क्या केवल इसलिए इसे पूरी नहीं कर पाए कि उसके पास स्कूली शिक्षा का एक ‘औपचारिक कागज’ नहीं है। 
जहाँ तक रही बात शिक्षित होने और नहीं होने की तो मेरा मानना है क़ि हमें साक्षर होने और शिक्षित हो जाने के बारीक, लेकिन बेहद जरूरी अंतर को समझना पड़ेगा। हर साक्षर व्यक्ति शिक्षित हो ही यह जरूरी नहीं और हर शिक्षित व्यक्ति साक्षर हो यह भी कतई जरूरी नहीं। हम जब आजाद हुए तभी यह तय हुआ था कि देश को साक्षर बनाया जाएगा। कमोबेश आजादी के इतने साल बाद भी यदि हमारी साक्षरता की दर शत प्रतिशत तक नहीं पहुंची तो इसमें नाकामयाबी किसकी है? अदद तो यह कि आजादी के पचास से भी ज्यादा साल बाद आप देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू कर पाए। तो हम कैसे उम्मीद कर लें कि हर नागरिक कम से कम आठवी और दसवी दर्जा पास कर लेगा। क्या हम आज केवल अपनी साक्षरता की दर बढ़ाने के लिए इस तरह के निर्णय का सहारा लेंगे? इसके लिए जितने लोग जिम्मेदार हैं उतनी ही जिम्मेदार अब तक की व्यवस्था भी रही है। आखिर क्यों हम इतने साल बाद भी निरक्षर हैं? और क्या उन पर ध्यान दिया जा रहा है कि 2015 में भी कितने प्रतिशत बच्चे स्कूली शिक्षा व्यवस्था से बाहर हैं। और यह संशोधन सबसे पहले पंचायत पर ही क्यों। जबकि हमें पता है कि देश में गांव की हालत सबसे खराब है। सबसे कम शिक्षा का स्तर गांव में है। दरअसल यह हमारे समाज की बुनियादी खामियां हैं। इसके लिए जितने जिम्मेदार ‘लोग’ हैं उतनी ही जिम्मेदार ‘व्यवस्था’ भी है। लोगों को अनपढ़ रह जाने में कोई मजा नहीं आता, बैंक का कर्जा करना ही कौन चाहेगा, और अंधेरे में दुनिया का कौन शख्स रहना चाहता है? जरूरत इस बात की है कि देश में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण किया जाए, जिससे यह प्रक्रियाएं स्वत: ही ठीक होने लगें, न कि इसे किसी संवैधानिक हक से महरूम करके जबरदस्ती करवाया जाए।
अब मैं इस क़ानून के टेक्निकल पॉइंटस पर कुछ बताना चाहूँगा। जहाँ तक मुझे क़ानून की जानकारी है, उसके अनुसार सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध है। इसके तहत कई ऐसी बातें हैं जो आपस में बहुत ही मतभेद पैदा करती हैं। जैसे कि मैं आपको पहली बात बताता हूँ,  विधायकों और सांसदों की शिक्षा के बारे में संविधान सभा में डॉ। राजेन्द्र प्रसाद, टी।टी।कृष्णामचारी और डॉ। अम्बेडकर ने लम्बी बहस के बाद भी कोई संवैधानिक प्रतिबन्ध नहीं लगाया। हरियाणा या राजस्थान की पंचायतों के चुनाव  पर बगैर संविधान में संशोधन के कोई भी ऐसी शर्तें या प्रतिबन्ध अवैध है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व जज कृष्णा अय्यर ने 1978 में मोहिन्द्र सिंह गिल मामले में यह निर्णय दिया था कि देश के सामान्य व्यक्ति को भी प्रधानमंत्री बनने का हक है। हरियाणा के कानून को अगर सही माना जाये तो अयोग्य व्यक्ति पंच नहीं बन सकता परन्तु विधायक और सांसद बनकर प्रदेश और देश का कानून बना सकता है, जो बहुत ही हास्यास्पद है। 
दूसरी बात हरियाणा में विधायकों की अयोग्यता के लिए ऐसे पैमाने निर्धारित नहीं किये गये तो पंचायतों में ऐसे कानून संविधान के अनुच्छेद 243-एफ (1) तथा जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 के अनुसार गैर-कानूनी हैं।
मुझे अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के बारे में अभी इतनी जानकारी तो नहीं लेकिन जहाँ तक पश्चिमी देशों के रंगभेद क़ानून की बात की जाए तो इसके खिलाफ है यह नियम। 
किसी ने सोचा ही नहीं क़ि इसका क्या फ़र्क पड़ेगा समाज के कमजोर तबकों पर। भारत में 15 लाख से अधिक महिलायें पंचायती राज शासन व्यवस्था का हिस्सा है और ऐसे कानूनों से कमजोर वर्ग की महिलाओं का विकास बाधित होगा। देश में 60या लगभग 70 करोड़ आबादी के पास शौचालय नहीं हैं और इस आर्थिक पिछड़ेपन की जिम्मेदारी सरकार पर है। इस जिम्मेदारी को पूरा करने के बजाय बड़ी आबादी (दलित और आदिवासी) को चुनाव लड़ने से वंचित नहीं किया जा सकता। 
इस क़ानून से भ्रष्टाचार और फरज़ीवाड़ा किस स्तर तक जाएगा इसके लिए राजस्थान का उदाहरण सबसे अच्छा है।  राजस्थान के पंचायत चुनाव में फर्जी स्कूल, सर्टिफिकेट दिलाने वाले गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। दिल्ली में आप के कानून मंत्री तथा मोदी सरकार की शिक्षामंत्री की डिग्री भी सवालों के घेरे में है। इस कानून के बाद हरियाणा की पंचायतों में भी फर्जी सर्टिफिकेट्स का गोरखधन्धा चालू हो जायेगा। चुनावी वादों के अनुरूप हरियाणा की भाजपा सरकार पूर्ववर्ती कांग्रेस के भ्रष्टाचार के विरुद्ध ठोस कार्यवाही करने या विकास की गति बढ़ाने में विफल रही है। अर्जुनसेन कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार, किसानों की मासिक आमदनी 2150 रुपये है जिसकी वजह से लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं जिन्हें काले कानूनों से पंचायत राज में भागीदारी से वंचित किया जा रहा है।

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