Saturday, December 19, 2015

यूपी में लोकायुक्त पर युद्ध

इस समय देश के सभी राज्यों में लोकायुक्त के कानून और उसकी नियुक्ति को लेकर काफी राजनीतिक संघर्ष देखने को मिल रहा है। ऐसे में यूपी कैसे पीछे रह सकता है? मुझे तो यहां मुम्बई में भी यूपी की राजनीति देखे बिना चैन नहीं मिलता है। हाल ही में लोकायुक्त की सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्ति से एक बार फिर से संवैधानिक संकट खडा हो गया है। यूपी के लोकायुक्त कानून के तहत मुख्यमंत्री, नेता विपक्ष तथा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की समिति द्वारा लोकायुक्त के नाम पर फैसला होने पर राज्यपाल द्वारा नियुक्ति के आदेश जारी होने चाहिए।
सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की सरकार द्वारा उ.प्र. राज्य उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष एवं पूर्व न्यायाधीश वीरेन्द्र सिंह को लोकायुक्त बनाने की मांग सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिसम्बर को मानते हुए 20 दिसम्बर तक क्रियान्वयन का निर्देश दिया। नियुक्ति हेतु राज्य सरकार द्वारा भेजी गई फाइल को राज्यपाल राम नाइक ने लौटाते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की प्रति प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
दूसरी ओर, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश चन्द्रचूड़ ने राज्य सरकार को 50 पेज का पत्र लिखकर यह पूछा है कि उनकी आपत्ति के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पांच नामों के पैनल में वीरेन्द्र सिंह का नाम कैसे शामिल किया गया ? उन्होंने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से मुलाक़ात का समय भी मांगा है। यहां से अब मुख्य सवाल एक और यह उठता है कि आखिर मुख्य न्यायाधीश को वीवीरेंद्र सिंह के नाम पर आपत्ति क्यों है? दरअसल वीरेन्द्र सिंह न सिर्फ सपा नेता शिवपाल सिंह यादव के रिश्तेदार हैं, वरन उनका पुत्र सपा का नेता भी है। जातीय तथा राजनीतिक संलिप्तता के अलावा वीरेन्द्र सिंह के विरुद्ध कई संगठनों द्वारा कदाचार तथा भ्रष्टाचार की शिकायतें दर्ज कराई गई हैं। इसके बावजूद राज्य सरकार द्वारा उनके नाम पर जोर दिये जाने से भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई की मंशा में संदेह होना स्वाभाविक है।

इसके पहले उ.प्र. लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष अनिल यादव द्वारा नियुक्तियों में जातीय आधार पर गड़बडियों के आरोप के बाद उच्च न्यायालय ने उनकी नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया था। अब राजनीतिक दलों को भ्रष्टाचार पर एक होहोते देखना और भी मजेदार है। पहले नोएडा के माफिया इंजीनियर यादव सिंह को बचाने के लिए सपा सरकार ने बसपा पर आरोप लगाया फिर मामले को ढीला छोड दिया। जांच देखकर तो मुझे यही लगता है कि केंद्र की भाजपा सरकार भी सीबीआई तथा ईडी के माध्यम से सहयोग दे रही है। अब लोकायुक्त की नियुक्ति में बसपा के  नेता विपक्ष ने वीरेन्द्र सिंह की लोकायुक्त पद पर नियुक्ति हेतु सहमति जता दी जिसे सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने वकालत करते हुए अंजाम तक पहुंचा दिया।
मैं काफी रिसर्च के बाद भी भी इसके कानूनी सवालों का जवाब नहीं ढूंढ पाया। क्या अनुच्छेद 142 के तहत लोकायुक्त की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट वर्तमान आदेश विधि सम्मत है ? मुझे यह पक्का नहीं पता। मुझे एक और बात नहीं समझ में आ रही है। क्या राज्यपाल इस मामले में सपा सरकार को दरकिनार कर सीधे सुप्रीम कोर्ट के सम्मुख पुर्नविचार याचिका दायर कर सकते हैं? संवैधानिक रूप से देखा जाए तो उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम द्वारा नियुक्त की जाती है पर उनकी ईमानदारी की जांच सरकार द्वारा आई0 बी0 से कराई जाती है। लोकायुक्त के मामले में भी  सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए वीरेन्द्र सिंह के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में ही यदि हाईकोर्ट के न्यायाधीश या राज्यपाल द्वारा नियुक्ति के विरुद्ध सबूत पेश किए गए तो क्या सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में पुर्नविचार नहीं करना पड़ेगा ? यदि ऐसा नहीं हुआ तो फिर मुश्किल होगी। पुनर्विचार याचिका पर विचार के दौरान यदि सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपने आदेश को स्टे नहीं किया गया तो क्या राज्यपाल के विरुद्ध अवमानना का मामला बन सकता है ?
मुझे इस बारे में जानकारी कम है इसलिए एक सीनियर वकील साहब से बात की तो उन्होंने कहा कि राजनीतिक मामलों में ज्यादा जानकारी नहीं रखते हैं। मैं खुद इसको सुप्रीम कोर्ट से लेकर विधानसभा तक पूरा कवर कर रहा हूं इसलिए अब जो भी होहोगा मेरे लिए बहुत अहम और मजेदार होगा।

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