Wednesday, December 23, 2015

जूवेनाइल जस्टिस एक्ट में संशोधन

निर्भया कांड के नाबालिग दोषी की रिहाई से आक्रोशित लोगों की मांग और इंतजार आखिर खत्म हो गई। राज्य सभा में  आज महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी द्वारा रखे गए किशोर न्याय विधेयक आखिरकार पास हो गया। इसके साथ ही जूवेनाइल बिल में बदलाव की औपचारिकता पूरी हो गई और किशोर अपराधों की उम्र सीमा 18 साल से कम कर फिर से 16 साल कर दिया गया। हालांकि सीपीआई के बिल को सिलेक्ट कमिटी में भेजने के प्रस्ताव खारिज होने पर पार्टी सांसदों ने वॉकआउट किया। वोटिंग से पहले सीपीआई के महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि कानून निर्माताओं के तौर पर हमें भावनाओं में आकर फैसला नहीं लेना चाहिए। बिल को पास कराने की जगह इसे सिलेक्ट कमिटी के पास भेजा जाए। हालांकि राज्यसभा के उपसभापति ने उनकी मांग को तत्काल खारिज कर दिया। येचुरी ने कहा कि निर्भया के दोषी नाबालिग को फिर से सजा नहीं दी जा सकती। अगर 14 साल के नाबालिग ने ऐसा कोई घृणित कार्य किया तो क्या हम फिर उम्र सीमा घटाकर 14 कर देंगे। आज राज्यसभा में बिल पर कई सदस्यों ने विचार और अपनी शंकाए रखीं। जिसके बाद महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने उन पर जवाब दिए। जवाब के बाद वोटिंग की गई जिसमें सदस्यों ने बिल के समर्थन और विरोध में मतदान किया। बिल के समर्थन में कांग्रेस, टीएमसी, टीडीपी, सिवसेना जैसी पार्टियां थीं। वहीं बिल के विरोध में इनेलो, जेडीयू, और सीपीएम के नेता थे। इसके साथ ही डीएमके नेता कनिमोझी, राज्यसभा सांसद अनु आगा समेत कुछ और सांसदों ने कानून में बदलाव के स्थान पर दूसरे विकल्पों पर विचार करने की बात कही। बिल के विरोध में यह तर्क दिया कि कड़े कानून बनाने भर से अपराध और गंभीर अपराधों की प्रवृत्ति कम नहीं की जा सकती। सुधार के मानवीय तरीकों को नजरअंदाज कर भावुकता में कानून नहीं बदलना चाहिए। 
16 से 18 वर्ष की उम्र सीमा के दौरान गंभीर अपराध करने वाले किशोर अपराधियों को व्यस्क अपराधियों की तरह माना जा सकता है लेकिन उन्हें सजा 21 साल की उम्र के बाद ही दिया जाएगा। 
बिल में इस बात का प्रावधान किया गया है कि देश के हर जिले में एक जूवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) और चाइल्ड वेलफेयर कमिटी (CWC) का गठन किया जाएगा। जूवेनाइल जस्टिस बोर्ड इस बात का फैसला करेगा कि किशोर अपराधी को सुधार गृह भेजा जाए या फिर उसे बालिग अपराधियों की श्रेणी में रखा जाए। बिल में कहा गया है कि बच्चे को ड्रग्स देने में 7 साल तक की सजा, बच्चे के साथ क्रूरता करने पर 3 साल तक की सजा और बच्चा बेचने पर 5 साल तक की सजा हो सकती है। इस प्रावधान पर भी सवाल उठाया गया है कि क्या ड्रग्स देना ज्यादा बड़ा क्राइम है या बच्चा बेचना। किशोर अपराधियों को बालिग अपराधियों की तरह सजा देने पर विशेषज्ञ दो खेमे में बंटे हैं। कुछ का मानना है कि वर्तमान कानून किशोरों को गंभीर अपराध करने से रोकने के सक्षम नहीं है इसलिए बदलाव जरूरी है। वहीं दूसरी तरफ ऐसे तर्क भी दिए जा रहे हैं कि अपराध की प्रवृत्ति को रोकने के लिए सुधार के मानवीय तरीकों पर विचार करना चाहिए। कुछ लोगों का तर्क है कि गंभीर अपराध करने वाले जूवेनाइल को यदि वयस्कों की तरह सजा दी गई तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) और अनुच्छेद 21 (समान और निष्पक्ष कानून) की मूल भावना के खिलाफ होगा। किशोर अपराधी को दंड देने के लिए 21 साल का होने तक इंतजार करना और उसके बाद सजा देने पर भी कुछ लोगों का कहना है कि जेजेबी की यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 20 (1) की मूल भावना के खिलाफ है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 (1) के अनुसार किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दुबारा दंडित नहीं किया जा सकता।

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