Sunday, December 27, 2015

मोदी जी की पाक नीति

एकदम से हमारे प्रधानमंत्री का पाकिस्तान पहुँच जाना किसी सरप्राइज से कम नहीं था. यहाँ तक की भाजपा प्रवक्ताओं को संभालने का मौका ही नहीं दिया गया. लेकिन  यह काम प्रधानमंत्री का आउट ऑफ द वे था. अक्सर मीडिया में फोटो खिंचवाने को आतुर रहने वाले प्रधानमंत्री ने इस बार ऐसा बिल्कुल भी नहीं किया. इस सनसनीखेज कार्यक्रम की उन्हें भनक तक नहीं लगी। कम से कम 2015 ख़त्म होते होते कुछ तो अच्छा काम हुआ विदेशनीति की नज़र से.
दूसरी तरफ टीआरपी क लिए मर रहे दोनो देशों के टीवी चैनलों में एक नई जान सी आ गई. दोनों देशों के पत्रकारों में अच्छे ख़ासे संबंध बन गए. हमारे देश के चैनल वाले पाकिस्तान के पत्रकारों को एक्सपर्ट बनाकर बैठे थे. उनसे हर पल की खबर ले रहे थे. मुझे ठीक ठीक तो खबर नहीं लगी लेकिन कई मौकों पर प्रोटोकाल नियमों की अनदेखी कर हमारे पी एम कार्यक्रमों में शरीक होते दिखे. बारह घंटे हो गए, लेकिन अब तक रहस्य बना हुआ है कि हमारे प्रधानमंत्री का पाकिस्तान में रुकने का फैसला कब हुआ था? किस मकसद से हुआ? और इसके राजदार कौन कौन थे? हद तो तब हो गई जब अफगानिस्तान से लाहौर के बीच के घंटे भर के सफर के बीच ही भारत में अफरातफरी और अटकलों का ऐसा दौर चल पड़ा कि सुनने वालों का सिर चकरा गया। किसी ने कहा कि यह चकराने वाला कार्यक्रम देश के भीतर की परेशानियों की बातों से ध्यान हटाने के लिए था। किसी ने कहा कि ये सब दुनिया की बड़ी ताकतों के दबाव का नतीजा था। कोई कह रहा था कि पाकिस्तान से बातचीत शुरू करने का यह अच्छा तरीका साबित होगा। राष्ट्राध्यक्षों की सुरक्षा इतना बड़ा मसला है कि बिना तारीख और समय तय किए या गुपचुप तरीके से राष्ट्राध्यक्षों के दौरे तय करने का चलन नई जटिलताएं पैदा कर देगा। दो देशों के बीच संबंधों खासतौर पर पाकिस्तान के मामले में भारत की विदेश नीति कोई आकस्मिक या तात्कालिक रूप से निर्धारित नहीं की जा सकती। पिछली घटनाएं, दुर्घटनाएं, संधियां, समझौते देखने ही पड़ते हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं से भी हम सब बंधे हुए हैं। पाकिस्तान से अपने रिश्तों की मुश्किल से पूरी दुनिया वाकिफ है। किसी भी तरह की बातचीत से पहले आतंकवाद और कश्मीर का पच्चर फंस जाता है। देश के भीतर सांप्रदायिक रंग की बातों और आंतरिक राजनीति में पाकिस्तान की बातों के बिना हम अपना राजनीतिक गुजारा नहीं कर पा रहे हैं। जिस तरह किसी कथा या उपन्यास में खलनायक जरूरी है उसी तरह घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक खलनायक बनाए रखने का चलन है। 

फर्ज कीजिए मनमोहन सिंह ने ऐसा किया होता?
यूपीए सरकार गए अभी दो साल भी नहीं हुए हैं। आतंकवाद के खिलाफ और उस बहाने पाकिस्तान के खिलाफ माहौल बनाए रखने के लिए तब विपक्ष में रही भाजपा के रुख को इतनी जल्दी भुलाया नहीं जा सकता। सोचकर देखें कि अगर मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान से बातचीत का ऐसा रुख दिखाया होता, तो भाजपा का क्या रवैया होता? इस काल्पनिक स्थिति को यह कहते हुए भी खारिज नहीं किया जा सकता कि तब स्थितियां भिन्न थीं। क्योंकि पाकिस्तान की तरफ से हाल फिलहाल कोई भी संकेत नहीं आया है कि हालात बदले हैं। यानी आज प्रधानमंत्री का औचक दौरा माहौल बदलने के मकसद से साबित किया जाए, तो आज से दो साल पहले के माहौल में भी साबित हो सकता था। लेकिन तब विपक्ष में रही भाजपा का रुख पाकिस्तान के प्रति शुक्रवार जैसा उदार नहीं था। यानी वह मनमोहन के दौरे के खिलाफ आसमान सिर पर उठा लेती। 
भारतीय टीवी चैनलों पर देश के दिग्गज विश्लेषक, भाजपा और कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों के नेता इस दौरे के नफे-नुकसान का हिसाब लगाते रहे। बिना एजेंडा और बिना एलान के हुए ऐसे दौरे के नफे-नुकसान का आंकलन आसान नहीं था। जाहिर है पुरानी राजनीतिक गिनती और पहाड़े सुनाए जाने के अलावा कुछ नहीं हुआ। हां, इतना जरूर है कि संसद का सत्र खत्म होने के बाद देश में बढ़ते जेटली विवाद की बजाए अब दो चार दिन प्रधानमंत्री के औचक दौरे पर ही वाद-विवाद चलता रहेगा। तब तक जेटली मुद्दा सुस्त पड़ जाएगा। 

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